अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक सरोकार 4.38/5 (8)

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     सुधीर कुमार गढ़वाल (पीएचडी शोधार्थी),    

                                                                                                                             अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र (स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज),

 जे.एन. यू, नई दिल्ली

यह निर्विवादित सत्य है कि वैचारिक अभिव्यक्ति मानवीय व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करती है। यह उसके व्यक्तित्व में अन्तर्निहित सम्भाव्यता का ही प्रकटित रूप है।

भारत के प्राचीन ग्रन्थों यथा- रामायण, महाभारत एवं स्मृतियों में सत्य, संयमित एवं सुलझे हुए विचारों को एक अच्छे व्यक्ति का आभूषण माना है। Click To Tweet

हमारे प्राचीन महाकाव्य महाभारत में उस समय निर्बाध विचार अभिव्यक्ति का प्रमाण मिलता है जब युवराज के रूप में दुर्योधन की बजाय युधिष्ठिर को चुनने का जनमत बनता है। विदुरनीति, अर्थशास्त्र और शुक्रनीतिसार से भी स्पष्ट होता है कि  अभिव्यक्ति एवं वाक्  स्वातन्त्र्य कैसे राज्य सत्ता को नियन्त्रित एवं मर्यादित करने कुशल साधन था।

मध्यकाल और सामन्ती काल में एक दो अपवादों को छोड़कर आमजन को बोलने की आजादी का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है लेकिन 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध से भारत जैसे ही पाश्चात्य उदारवाद एवं लोकतन्त्र से प्रभावित होता है, वैसे ही बोलने की आजादी राष्टीय आन्दोलन में मुखरित होने लगती है। इसी विरासत को अपने संप्रभु राष्ट्र के संविधान में बुनियादी अधिकार के रूप में अनुच्छेद 19 (1) (अ) के अन्तर्गत शामिल किया गया है । संविधान प्रदत विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुछेद 19 (1) (क), जीवन और दैहिक स्वतंत्रता (अनुछेद 21) के बाद सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है। लोकतंत्र में बोलने की आजादी अपने आप में वजन रखती है क्योंकि सामन्ती शासन के विपरीत इसमें सरकार जनता के प्रति सीधे जबाबदेह होती है और जनमत सरकार की नीतियों, कृत्यों की आलोचना-समालोचना करके उसे मर्यादित रखने का कार्य करता है। रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) के वाद में सर्वोच्च न्यायालय  के न्यायाधीश श्री पतंजलि शास्त्री ने कहा था कि वाक् स्वातंत्र्य लोकतान्त्रिक समाज की आधारशिला है। भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक परम्पराओं को उद्धरित करने वाली यह उक्ति “वादे-वादे जायते” “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” तथा जैन दर्शन का प्रख्यात सिद्धान्त ‘स्याद्-वाद’ भारत की शास्त्रार्थ एवं वाक् स्वतंत्र चिंतन को प्रतिष्ठित करता है।  इस प्रकार वाक् स्वातंत्र्य सत्य की खोज, आत्म लब्धि, निर्णयन की क्षमता, स्थायित्व और सामाजिक परिवर्तन के बीच संतुलन कैसे स्थापित हो, ऐसे ही उद्देश्यों को अपने आप में समाहित किये हुए है।

यह अधिकार न केवल अपने विचारों को दूसरों को सम्प्रेषित करने का आशय लिए हुए है बल्कि दूसरे लोगों के विचारों को प्रकाशित एवं प्रचारित करने का आशय भी समाहित किये हुए है। इस प्रकार “जानने का अधिकार” (Right to Know) भी इससे जुड़ा हुआ है। अनुच्छेद 19 (1) (क) अपनी परिधि में बहुत व्यापक है जिसे समय-समय पर न्यायालय के समक्ष आये विभिन्न मामलों एवं उन पर दिए गए न्यायिक निर्णयों ने विस्तारित किया है। जैसे विरोध करने का अधिकार, असहमति व्यक्त करने, राज्य की नीतियों को चुनौती देना या आलोचना करना इत्यादि। इसमें तो किंचित भी संदेह नहीं है की ‘विरोध प्रदर्शन का अधिकार’ (Right to Protest) अनुच्छेद 19 (1) (क) के साथ घनिष्ट रूप से जुड़ा हुआ है लेकिन विरोध का स्वरूप कैसा होगा? इसकी मोटी-मोटी रुपरेखा तो अनुच्छेद 19 (2) में दिए गए ‘युक्तियुक्त निर्बंधनों’ (यथा–लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, अंतराष्ट्रीय संबंधों में सौहार्द आदि) से खींची जा सकती है लेकिन क्या राज्य नीति का विरोध करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में है की नहीं इसे हम 1954 के राममनोहर लोहिया वाद से समझने का प्रयास करेंगे। बात कुछ यूं है कि ‘प्रजा समाजवादी पार्टी’ के राममनोहर लोहिया ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस नीति का विरोध किया था जिसमें सिचाईं  की दरों में वृद्धि की गयी थी। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘विशेष शक्तियाँ अधिनियम 1942’ (Special Powers Act) के अंतर्गत ये आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया गया था कि वह इन लोगों से कर न चुकाने की अपील कर रहा है लेकिन इलाहबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च्य न्यायालय ने लोहिया के पक्ष में निर्णय देते हुए यह अभिधारित किया था कि राज्य सरकार की यह कार्रवाई अनुच्छेद 19 (1) (क) का उल्लंघन करती है । इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि अनुच्छेद 19 (2) के अन्तर्गत किसी कृत्य को निर्बन्धित (Restricted) करने के लिए किसी विचार अभिव्यक्ति जिसको चुनौती दी जा रही है, उसमें और लोक व्यवस्था के बीच युक्तियुक्त सम्बन्ध होना चाहिए। कहने का अर्थ ये है कि जिस विचार-अभिव्यक्ति को हम चुनौती दे रहे हैं वह अपने आप में लोक व्यवस्था को बाधित करने वाला होना चाहिए। हम संभावित परिणामों और इस प्रकार की कल्पनाओं कि यह कृत्य भविष्य में लोक व्यवस्था को बिगाड़ेगा, इस आधार पर किसी अभिव्यक्ति को अनुच्छेद 19 (2) के तहत निर्बंधित नहीं कर सकते।

इस संदर्भ में अब यक्ष प्रश्न यह है कि बोलने कि आजादी किस सीमा तक या कैसी अभिव्यक्ति की आजादी? और वाक् स्वतंत्र्य पर आरोपित किये जाने वाले निर्बंधनों की युक्तियुक्तता को कौन परखेगा? मर्यादा और “कैसी अभिव्यक्ति की आजादी” पर विचार करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्ति का सामाजिक जीवन सापेक्ष होता है। इस सम्बन्ध में सर्वोच्च्य न्यायालय ने कुछ दिशा-निर्देश तय किये- जैसे कोई कानून युक्तियुक्त है या नहीं इसकी परख न्यायालय करेगा न की विधायका, दूसरा- किसी कानून के तर्क-संगत होने का मतलब है की कानून का मनमानापन या स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिए, तीसरा- लोकहित से परे जाकर कोई निर्बंधन नहीं लगाए जा सकते, चौथा- ऐसे निर्बंधनों की समयावधि असीमित नहीं हो सकती इत्यादि। बहरहाल, तर्कसंगतता का कोई नियत पैमाना नहीं है, यह प्रत्येक मामले या वाद-दर-वाद निर्भर करता है। यधपि यह जरुरी है कि लगाए जाने वाले निर्बंधन तात्विक एवं प्रक्रियात्मक (Substantial and Procedural) लिहाज से तर्क-संगत होने चाहिए। जैसे नीति निदेशक तत्व (Directive Principles) के किर्यान्वयन के लिए लगाए जाने वाले निर्बंधन अपने आप में तर्क-संगत होंगे। तर्कसंगतता की परख इस अर्थ में वस्तुनिष्ट (Objective) होने चाहिए कि एक सामान्य विचारशील व्यक्ति की उस बारे में क्या सोच है। जैसे, पहला- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बनाम भारत कुमार (1998) वाले वाद में सर्वोच्च्य न्यायालय ने निर्णय दिया कि राजनितिक दलों द्वारा ‘बंद ’ का आह्वान करना गैर कानूनी है क्योंकि इससे दूसरों की स्वतंत्रता बाधित होती है, दूसरा- हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ (1960) के वाद में न्यायालय ने निर्णय दिया कि झूठे विज्ञापनों को वाक् स्वातंत्र्य के अधिकार के अंतर्गत संरक्षण नहीं दिया जा सकता। आजादी की निरपेक्षता की हिमायत करने वालों को यह सोचने की दरकार है कि वह किसी निर्वात या प्राकृतिक अवस्था में नहीं रह रहा है जहाँ वह अपने अस्तित्व की क्षणिकता को लेकर भयातंकित था। हाँ, यह स्वीकार्य है कि एक सभ्य समाज बोलने की आजादी पर किसी प्रकार की सीमा नहीं होनी चाहिए लेकिन यह अभिव्यक्ति भी अपने में संयमित और सभ्य होनी चाहिए यह किसी भी सामाजिक जीवन में बोलने की आजादी की एक अनिवार्य कसौटी है और यह ऐसे समाज में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य का सामाजिक, नैतिक दायित्व भी है लेकिन जहाँ तक बात कानून की है तो क्या कानून की परिभाषा में बोलने की आजादी अमर्यादित हो सकती है? इसका उत्तर खोजने से पहले यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा कि स्वयं कानून का सृजन भी समाज के कुशल संचालन, लोकव्यवस्था बनाये रखने तथा लोग एक-दूसरे की आजादी का हनन न करें, इसके लिए किया गया है। कहने का अर्थ है कि कानून अपनी अंतर्वस्तु में मर्यादा को समाये हुए है। यहाँ यह उद्धृत करना आवश्यक होगा कि भारत के संविधान रचनाकरों ने पहले पहल अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत दिये गये अधिकार (अभिव्यक्ति एवं वाक् स्वातन्त्र्य) को अनिर्बन्धित ही रखा था लेकिन अभी तक हमारा समाज इतना सभ्य नहीं हुआ था कि अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के वक्त दूसरों की आजादी और गरिमा का स्वतः ख्याल रख सकें। उदाहरणतः “मैं तुम्हारी हत्या करूंगा” यह कथन क्या किसी व्यक्ति की बोलने की आजादी है या दूसरे व्यक्ति की बुनियादी (जीने का अधिकार) आजादी का हनन। ऐसे ही कई प्रश्नों की पार्श्व भूमि के आधेय में 18 जून, 1951 को संविधान में पहला संशोधन किया जाता है और अनुच्छेद 19 (1) (अ), जो कि अपने मूल रुप में अव्यहारिक है, को 19 (2) जोड़कर इसे व्यवहारिक बनाया जाता है। इसके अनुसार अभिव्यक्ति की आजादी वहाँ तक ही युक्ति-युक्त है। जहाँ तक कि वह भारतीय राज्य की सुरक्षा (भारत का अस्तित्व), विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, भारत की प्रभुता और अखण्डता, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, सदाचार एवं मानवीय गरिमा को पोषित करने वाले हितों को बाधित न करती हो।

अपने देश में कई बार कुछ लोगों द्वारा वाद-संवादों में “कश्मीर की आजादी” जैसे शब्दों को ‘ आत्मनिर्णय के अधिकार’ (Right to Self Determination) से जोड़ा जाता है लेकिन यहाँ यह स्पष्ट किया जाना जरुरी है कि बन्दूक के दम पर कश्मीर की आजादी ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ की शर्तो को पूरा नहीं करता क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की महासभा के 1974 के प्रस्ताव के अनुसार– (1) यदि कश्मीर के लोग किसी विदेशी शासन के आधिपत्य में हो या किसी नॄजातीय शासन के अधीन होतो ऎसे शासन के विरुद्ध इन लोगो का अपने आत्म निर्णय के अधिकार की रक्षा हेतु सशस्त्र संघर्ष जायज है लेकिन ऎसी कोई भी बात भारत के अभिन्न अंग कश्मीर पर लागू नही होती क्योकि वहाँ की अपनी जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है, अलग सविधान है, भारतीय संविधान के अनुछेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशिष्ट राज्य का दर्जा दिया गया है जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर के लिए भारत की संसद संघ एवम् समवर्ती सूची के अन्तर्गत उन्हीं विषयों पर कानून बना सकती है जिनके लिए राष्ट्रपति वहां की सरकार से परामर्श करके उसकी स्वीकृति प्राप्त करता है अन्यथा कानून नहीं बना सकती। साथ ही साथ जम्मू-कश्मीर का संविधान अपनी उद्देशिका में उद्घोष करता है कि “हम जम्मू एवं कश्मीर के लोग जम्मू-कश्मीर राज्य को भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा स्वीकार करते है”, इसके अतिरिक्त इसी संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार “जम्मू-कश्मीर का राज्य भारतीय संघ का अभिन्न अंग होगा” और यही नहीं अनुच्छेद 147 के अनुसार जम्मू-कश्मीर की विधायिका अनुच्छेद 3 में किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकती । दूसरे शब्दों में स्वयं जम्मू-कश्मीर का संविधान कहता है कि हर परिस्थिति में जम्मु-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा ।

गौरतलब है कि चाहे लोकतंत्र हो या साम्यवाद प्रत्येक शासन प्रणाली अपने मूल में एक बुनियादी उसूल जरूर धारण किये हुए होती है, वह है – ‘राज्य का अस्तित्व’ । एक परिंदे को खुले गगन में उड़ान भरने की असीमित आजादी है लेकिन याद रखियेगा उसके अस्तित्व की कोई गारंटी नही है, यदि कोई दूसरा परिंदा उसकी आजादी को छीनता है तो उसे ‘संवैधानिक उपचारो का अधिकार’ (अनुच्छेद -32) नसीब नही है लेकिन मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के नाते उसे अपने अस्तित्व एवं गरिमा का न केवल अधिकार (अनुच्छेद -21) ही प्राप्त है अपितु उसे अदालती संरक्षण भी दिया गया है। इस अदालती संरक्षण के बदले क्या सरकार युक्ति-युक्त निर्बधंन नही लगायेगी? यदि ऐसा नही करेगी तो क्या हमारी आजादी कायम रह सकती है? असल में इन निर्बधंनो के पीछे भाव यह है कि हम सब की आजादी अक्षुण रहे ताकि हम गरिमामय जीवन जी सके और अपने व्यक्तित्व में अन्तर्निहित संभाव्यताओं को साकार कर सके।

संदर्भ स्रोत:

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