डॉ० रामकुमार वर्मा जी के काव्य में शिल्प विधान का प्रयोग 4.5/5 (2)

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 डॉ० रामकुमार वर्मा जी के काव्य में शिल्प विधान का प्रयोग

डॉ० नरेश कुमार

दूरभाष क्रमांक : 09991996636

Research Reformer, ISSN – 2319-6904,

Issue 40, Jan. 2016, Page No. 1-6

संक्षिप्तिका (Abstract) :  (Download Abstract in PDF)

हिन्दी साहित्य में शिल्पविधान को उत्तम कला माना जाता है। यह कलात्मक सृष्टि होती है। प्रत्येक साहित्यक कृति या रचना वस्तु अथवा विचार तत्व की वाहिका होते हुए भी कलात्मक इकाई भी होते हैं। मूलत: वह एक कलात्मक सृष्टि ही है, जो साहित्यकार की अपनी संवेदनाओं, अनुमतियों और चिन्तन को इस रूप में पाठक या श्रोता तक सम्प्रेषित करती है। कि पाठक या श्रोता सहज से उससे तादात्मय का अनुभव करने लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि “शिल्प” के आवरण मे प्रस्तुत की गयी संवेदनाएँ अथवा विचार ही साहित्यक को साहित्य बनाते है और उसे स्थायित्व प्रदान करते हैं। जिस प्रकार कोरे शिल्प के बल श्रेष्ट साहित्य की रचना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार कोरा अनुभव का विचार “शिल्प” के अभाव मे श्रेष्ट साहितय की संज्ञा प्राप्त नही कर सकता । आशय यह है कि साहित्य में वस्तु के साथ शिल्प की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। एक सच्चा और ईमानदार साहित्यकार रचना के क्षणों मे कथ्य और शिल्प दोनों के प्रति पूर्ण सजग रहता है। वस्तु और शिल्प दोनों का औचित्यपूर्ण सन्तुलन प्रस्तुत करने वाली कृति ही सच्चे अर्थों में श्रेष्ठ कृति होने का गौरव प्राप्त कर पाती है। शिल्प की सार्थकता विष्य के अधिक से अधिक अनुकूल होकर उसके प्रभावपूर्ण सम्प्रेषण में ही है।इसलिए प्रत्येक महान और श्रेष्ठ रचानाकार विषय वस्तु के अनुकूल ही भाषा,वाक्य, शब्द, बिम्ब, प्रतीक,अप्रस्तुत छन्द, क्षय, पात्र आदि का चयन करता है। प्रस्तुत शोधपत्र में वर्मा जी के शिल्प विधान के विविध  प्रयोगों का वर्णन किया गया है।

विशेष बिन्दु (Key-Words) :  शिल्पविधान, भाषा शैली, गेयात्मक पद्य आदि।

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विषयवस्तु (Subject) :  “शिल्प” शब्द के तात्पर्य निर्माण या सर्जना से है। चाहे वह वस्तु से सम्बन्धित हो या कृति से।  वस्तु या कृति के निर्माण के निमित्त जो उपादान उसका ढांचा तैयार करने में काम आते हैं अथवा जो विधिया या प्रविधिया अपनायीं जाती हैं, उसके समुच्च्य को शिल्प के नाम से जाना जाता है। शिल्प शब्द अंग्रेजी के क्राफ्ट शब्द का समानार्थक है तथा टेकनीक का वैज्ञानिक एवं सही अर्थ है- प्रविधि न शिल्प। टेकनीक का सृजन से केवल इतना ही सम्बन्ध है कि वह निर्माण की विधी का ज्ञान कराती है। सृजन कैसे और किस प्रकार किया जाता है , इसका सम्बन्ध है शिल्पविधान से।[1]

भाव और शिल्प काव्य के दो महत्त्वपूर्ण पहलू माने जाते हैं। शिल्प विधान करने पर काव्य में रोचकता के साथ साथ विचारों के सम्प्रेषण का भी सही मार्ग बनता है। शिल्प वह पद्धति है जिसके माध्यम से साहित्यकारा अपने भावों और विचारों को सम्प्रेशणीय बनाता है। इस विषय डॉ० सत्यनारायण लिखते हैं कि- विषय को कला द्वारा ढ़ालने की रचना प्रक्रिया और जिसके द्वारा विषयवस्तु ढ़लकर अभिव्यक्त हो पाती है उसे शिल्पकला कहा जाता है।[2]  डॉ० रामकुमार वर्मा जी की काव्य रचनाओं में कथ्य की विविधता के साथ साथ शिल्प विधान का सर्वत्र प्रयोग मिलता है। उनकी रचनाओं में भाव, शिल्प और संगीतात्मका का अद्भुत सामांजस्य  देखने को मिलता है। उनकी भाषा काव्य में सदा भावानुकूल बनी रहती है।

उनकी भाषा मनभावों होती है। जिसमें सहजता और सरलता का परिचय मिलता है।

डॉ० शम्भुनाथ जी ने उनके विचारों को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि- भाषा का यों तो सभी करते हैं, लेकिन सच्चा कवि भाषा अपने वशवर्तिनी बनाकर रखता है। वह शब्द शिल्पी और भाषा की प्रकृति की प्रकृति से पूर्ण परिचित होता है। अत: वह काव्य भाषा में आकर्षण और सौन्दर्य उत्पन्न करके उत्कृष्ट बनाता है।[3]  डॉ० रामकुमार वर्मा जी के काव्यों में भाषा और शिल्प विधान का भरपूर प्रयोग है। उनके द्वारा ताजमहल का शब्द चित्र सहजता से चित्रित किया गया है-

“वह ताज वेदना की विभुति, अंकित हौ भू पर पूर्ण इंदु

यह शाहजहाँ है एक व्यक्ति, जिसने इतना तो काम किया

दे दिया विरह को एक रूप, है ताज उसी व्यक्ति का नाम”॥[4]

समयक्रम के प्रयोग में भी वर्मा जी ने सुन्दर वर्णन किया है-

“प्रात: बेला का भ्रम, मुनि का नियमित क्रम, नारी तन अनुपम।

ये तीनों एक जैसे एक दूसरे के, क्रूर विषय”॥[5]

वर्मा जी लिखते है कि अंधकार की गोद में स्वप्न खिलता है, अश्रु की तरल बिन्दु में न जाने कितनी स्मृतियों को संजोने वाले इन्द्रधनुष बनते हैं, उसी भाति गोद में सुख के शिशु सोते  और सुख का अवसर पाकर किलकारियाँ भरते हैं। इसका भाव इस प्रकार है-

“मत कहो कि भीगी पलकों में संसार डूबता जाता है,

ये कुछ क्षण ही हैं जिसमें फूलों की सुगन्ध से नाता है।

पर हैं सुगन्धि के प्राण अमर, ये  फूल भले ही मुरझाएँ,

सुनसान बन गई मृत्यु की गुंजित जीवन का यह गीत रहे”॥[6]

इसी प्रकार से वर्मा जी ने प्रेम भाव का जीवन्त वर्णन अपने रूपराशि ग्रन्थ में किया है-

“जहाँ प्रेम है वहाँ सदा ही दु:ख की होती जीत”।[7]

शिल्प कला की दृष्टि से उनके काव्यों एवं संग्रह ग्रन्थों में गीतात्मकता का वर्णन मिलता है-

“समय की शीतल सांस, यही तुम्हारे जीवन का पहला दिन पहली रात।

उसी समय तुमने होने दिया जीवन के तरुवर पात”॥[8]

इस प्रकार के शिल्प विधान का प्रयोग अध्ययन करके वर्मा जी संदर्भ में अनेक सुश्रेष्ठ पंक्तियाँ प्रसिद्ध हैं- डॉ० चन्द्रिका प्रसाद शर्मा ने उनके ग्रन्थों  का अध्ययन किया और स्वयं अपने ग्रन्थ में लिखा है कि-  वर्मा जी ने अपने काव्य की प्रेरणा अपनी माटी से ली है, वे सीता पतिव्रत और कृष्ण की प्रेरणा से अभिभूत हैं। वे विवेकानन्द जी के विश्वकल्याण रूपी भावों से प्रभावित हैं। हिमालय को वो साक्षात् भगवान शिव और उमा का निवास स्थान मानते हैं और उनसे निरत साहित्य साधना का आशिर्वाद ग्रहण करते हैं।[9]  वर्मा जी ने विरह की दृष्टि से भी प्रतिपादन किया है-

“आज मेरी गति, तुम्हारी आरती बन जाय।

आरती घूमे कि खिंचता जाय रंजित क्षितिज घेरा।

धूम सा जलकर भटकता उड़ चले सारा अंधेरा”॥[10]

इनमें समूचे साहित्य का अध्ययन से सुस्पष्ट होता है कि इनके साहित्य साधना पर गहरी पकड़ है।  इनके महत्त्वपूर्ण शिल्पविधान के सारांशरूपी बिन्दुओं का वर्णन इस प्रकार है-

  1. विरहवेदना का सुन्दर प्रयोग किया गया है। जैसे-
  2. “तुम न आओगे कभी, फिर भी प्रतीक्षा है तुम्हारी। बस, तुम्हारी याद है प्रिय, और है ये रात सारी”॥[11]
  3. काव्यसंग्रहों में सफल गेयात्मकता का प्रयोग किया गया है।[12]
  4. हृदय के मार्मिक भावों का वर्णन किया गया है।[13]
  5. काव्यों में संगीतात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।[14]
  6. प्राकृतिक एवं सौन्दर्यात्मक भावों का वर्णन किया गया है- “यह धरा बिखर कर जैसे आती नित नई निखर नदी है”। [15]

6.कल्पनात्मक शैली के शब्दों का वर्णन किया गया है।

  1. शब्दचित्र व्यापरा का सुन्दर प्रयोग किया गया है।

निष्कर्ष (Conclusion) :   

अन्त निष्कर्षरूप में कहा जा सकता है कि वर्मा की साहित्य साधना तपोबल से भरपूर है। उनकी भाषा शैली सरल एवं सहज है। उनके विचारों का सम्बन्ध सीधे पाठक को प्रभावित करता है। जीवन के अनेक पहलुओं को संगीतमय बनाकर प्रस्तुत किया गया है। शिल्पाला रूपी शब्दों का वर्णन काव्य में सौन्दर्यात्मक दृष्टि को स्पष्ट करता है।  अत: उनके काव्यग्रन्थों का अध्ययन करके हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। हिन्दी साहित्य में उनका काव्य रचना को लेकर महत्त्वपूर्ण योगदान है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची (Bibliography) :

1.डॉ० रामकुमार वर्मा का अभिनन्दन ग्रन्थ    : प्रधान सम्पादक डॉ० जगदीश गुप्त

2.प्रेमचन्द के उपन्यासों में शिल्प विधान, डॉ० कमल किशोर गोयनका

3.आंचलिक उपन्यास और रेणू, डॉ० सत्यनारायण उपाध्याय द्वारा विरचित ।

4.आकाशगंगा, डॉ० रामकुमार वर्मा द्वारा रचित ग्रन्थ ।

5.रुपराशि, डॉ० रामकुमार वर्मा द्वारा रचित ग्रन्थ ।

6.अंजलि, डॉ० रामकुमार वर्मा द्वारा रचित ग्रन्थ ।

7.छायावाद युग, डॉ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा विरचित।।        ॥इति॥

[1] प्रेमचन्द के उपन्यासों में शिल्प विधान, पृष्ठसंख्या-16

[2] आंचलिक उपन्यास और रेणू, पृष्ठसंख्या – 15

[3] छायावाद युग, पृष्ठसंख्या-293

[4] रूपराशि, पृष्ठसंख्या-184

[5] आकाशगंगा, पृष्ठसंख्या-82

[6] आकाशगंगा, पृष्ठसंख्या-61

[7] रुपराशि, पृष्ठसंख्या-16

[8] अंजलि, पृष्ठसंख्या-17

[9] डॉ० रामकुमार वर्मा की साहित्य साधना, पृष्ठसंख्या-56

[10] आकाशगंगा, पृष्ठसंख्या-36

[11] आकाशगंगा, पृष्ठसंख्या-54

[12] चित्ररेखा, पृष्ठसंख्या-27

[13] आकाशगंगा, पृष्ठसंख्या-7

[14] संकेत , पृष्ठसंख्या-57

[15] आकाशगंगा, पृष्ठसंख्या-24

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