डॉ० रामकुमार वर्मा जी परिचय एवं मानवतावादी और सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति 5/5 (3)

0
291 views

डॉ० रामकुमार वर्मा जी परिचय एवं मानवतावादी और  सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति

डॉ० नरेश कुमार

दूरभाष क्रमांक : 09991996636

Grip – The Standard Research, ISSN – 2278-8123,

Issue 41, Nov. 2015, Page No. 1-6,

संक्षिप्तिका (Abstract) :  (Download Abstract in PDF)

भारतीय ज्ञान परम्परा में हिन्दी साहित्य का महत्व पूर्ण स्थान है। हिन्दी साहित्य के नामचीन विद्वानों में ड़ॉ० रामकुमार वर्मा का नाम उल्लेखनीय है। ड़ॉ० रामकुमार वर्मा भारतीय मनीषा के संस्कति पुरुष है। उनके व्यक्तित्त्व के अनेक पहलू हैं। जिन पर उनके साहित्यकार होने का सर्वत्र प्रभुत्व प्राप्त होता है। वे अध्यापक और अनुसन्धाता, कवि और नाटककार समीक्षक और वक्ता एक साथ हैं। इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने यश अर्जित किया और सम्मान प्राप्त किया है।[1] साहित्य के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण और अक्षुण्य है। हिन्दी साहित्य में छायावाद की सुप्रसिद्ध वर्मात्रयी के अन्तर्गत सर्वप्रथम वे स्थापित हुए,  तदन्तर हिन्दी एकांकी के जनक एवं प्रवर्तक के रुप में उनका मूल्यांकन होने लगा, परवर्ती काल मे वे एकलव्य को प्रतिष्ठत करने वाले महाकवि रुप में विख्यात हुए। उन्होनें परम्परा को आधुनिक चेतना से अनुप्रमाणित करने की सांस्कतिक अन्तर्दष्टि को समर्थ अभिव्यक्ति प्रदान की।[2] उनके व्यक्तित्त्व में हिमालय-सी उच्यता, ह्रदय में सागर-सी गम्भीरता तथा चिन्तन धारा में जाह्नवी  जैसा वेग परिलक्षित होता है।

उनके हर क्रिया–कलाप, व्यवहार में आचार्यत्व रहता है, अज्ञान- अधंकार को दूर करने में जिनके विचारों और वाणी मे गुरुत्व रहता है, ज्ञान-प्रज्ञान की खोज में जिनका नीर-क्षीर विवेक प्रमुख रहता है, इससे उनका व्यक्तित्त्व महान् है।

प्रस्तुत शोधपत्र में वर्मा जी के मानवतावादी चिन्तन और सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति पर प्रकाश ड़ाला गया है

विशेष बिन्दु (Key-Words) : डॉ० राजकुमार वर्मा जी का जीवन परिचय, काव्य साधना में मानवतावाद और सामाजिक चेतना, काव्य साधना पर अधिकार आदि ।

Full Paper (Download Full Paper in PDF)

विषयवस्तु (Subject) :  डॉ० राजकुमार वर्मा का जन्म 15 सितम्बर 1905 को सागर (मध्य प्रदेश) के गोपालगंज मौहल्ले मे हुआ था। जिस मौहल्ले में उनका जन्म हुआ, वह संस्कति और कला का उपासक था। बालक राजकुमार के व्यक्तिव को सजाने,सँवारने का श्रेय उनकी माता श्रीमती राजरानी देवी को है। माता राजरानी देवी बड़ी प्रबुद्ध महिला थी,काव्य और संगीत मे उनकी बड़ी अभिरुचि थी। “भोर भयो जागहु रघुनन्दन” प्रभाती के इन मधुर स्वरों से वे बालक राजकुमार को जगाया करती थी।[3] मीरा और कबीर के भजनों तथा गोस्वामी तुलसीदास के  रामचरित मानस के अभ्यास से बालक जीवन में साहित्य और संगीत का समागम होता गया। घर की स्त्रियों के द्वारा ढोलकी की थाप पर गाये जाने वाले बुन्देली लोक गीतों ने अन्जाने ही उनके मन में काव्य और रागात्मकता के बीज अंकुरित हुए। वर्मा जी की अपने जीवन यदि किसी व्यक्ति पर सबसे अधिक आस्था थी,तो अपनी माँप रही। उस समय अंग्रेजी और उर्दू – फ़ारसी का बोलबाला था, पिता की अनिच्छा के बाबजूद उनकी माँ ने उन्हे पढ़ने की प्रेरणा दी। सन् 1921 में राजकुमार वर्मा नरसिंहपुर में नवी कक्षा के विद्यार्थी थे। उस समय गांधी जी का असहयोग आन्दोलन जोरों पर था। वर्मा जी स्वभाव से खेल-प्रिय भी थे। बचपन में उन्हे कंचा खेलने का बड़ा शौक था।

कंचा खेलने का उन्होंने इतना अभ्यास कर लिया था कि मित्रों से ढेरों कंचे जीत लेते थे। गुल्ली- डंडा का खेल में वह इतने मग्न हो जाते कि खाने –पीने की भी उन्हे सुध न रहती थी। पतंग, उडाने की कला में भी उन्हे प्रवीणता हासिल थी। ढेर सारी पतंगे, चर्खियाँ सदैव उनके कमरे में रखी रहती थी। सन् 1929 में 24 वर्ष की आयु में वर्मा जी का विवाह लक्ष्मीदेवी के साथ हुआ।[4] आपके श्वसुर रामबहादुर श्री रामानन्द प्रसाद डिप्टी कलेक्टर थे। सेवनिवृत्ति के पश्चात् वे रामगढ़ और खीरागढ़ के दीवान के पद पर रहे। वर्मा जी की धर्मपत्नी अत्यन्त धार्मिक स्वभाव की महिला थीं। वह रामचरित्रमानस और श्रीमद्भगवद् गीता का वे नित्य प्रति परायण करती थी।

इलाबाद विश्विधालय से आपने सन् 1929 में एम०ए०,हिन्दी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इलाहाबाद विश्विधालय से एम०ए०, हिन्दी की परीक्षा प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण करने वाले आप प्रथम विधार्थी थे। आपका व्यक्तित्त्व अत्यधिक प्रेरणाप्रदायक और गम्भीर है।

हिन्दी साहित्य के लेखन कार्य में पूर्ण अधिकार था। अपनी काव्य साधना के पथ वे सदा अग्रसर रहते थे। उनके काव्यों में मावतावादी चिन्तन और सामाजिक चेतना चित्रण स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। मानवतावादी चिन्तन के नवीन आयामों को समाज में उजागर करने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। मूलत: यदि उनको मानवतावादी कवि जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही है। बचपन और यौवकाल में वे मानवीय कार्यों में संलग्न रहे।अपने अध्यापकों , साथियों , मित्रों तथा परिवार वालों के साथ उनका सदा प्रेम बना रहता था।

सामाजिक कार्यों में खुश होकर भाग लेते थे। घर पर आने वालों का दिल से स्वागत करते थे। सामाजिक कार्यों, परम्पराओं में हिस्सा लेना उनकी आदत बन गई थी। मानवता के कल्याण और समृद्धि के लिये सदा वे तत्त्पर रहते थे। राष्ट्रप्रेम उनमें पूर्णत: भरा हुआ था। गांधी और नेहरू जी से जुड़ाव करने के लिये वे अपने परिवार की आज्ञा की अवहेलना की।

“अछुतो उद्धार आन्दोलन” ने उनको सर्वाधिक प्रभावित किया। उससे प्रभावित होकर उन्होंने एकलव्य ग्रन्थ की रचना कर ड़ाली। स्वाधीनता के लिये स्कूली पढ़ाई त्यागकर समाजिक कार्यों मे जाना और समाज को प्रेरणा देने हेतु गीत आदि गाने लगे।

भारतीय सनातन एवं ज्ञानसंस्कृति में उनको अत्यधिक सम्मान मिला। इनके काव्यों पदे पदे मानवीय तथ्यों का स्पष्ट वर्णन मिलता है। छायावाद के काव्यों में वर्मा जी की मानवतावादी चेतना का नवीन आयाम रूपायित हुआ है। वर्मा जी मूलत: मानवतावादी कवि हैं। बाल्यकाल से लेकर युवावस्था तक वे सामाजिक कार्यों में संयुक्त रहे हैं। वे अपने मित्रों, नातेदारों व रिस्तेदारों में सदा प्रेमभाव से रहते थे।

उनके द्वारा रचित “एकलव्य” महाकाव्य मानवीय मूल्यों की नूतन स्थापना की स्थापना करता है। इस महाकाव्य में उन्होंने दलित चेतना पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा है- गुरु द्रोणचार्य जब तेजस्वी और वीर बालक का एकलव्य के शौर्य का प्रदर्शन देखते हैं तो अभिभूत हो जाते हैं।[5]

वर्मा जी के काव्य में मानवतावादी चिन्तन का सर्वत्र प्रयोग मिलता है। उनके काव्य में जातिवाद के विरुद्ध आवाज उठाई गई है। एकलव्य दलित होने बावजूद भी अत्यन्त प्रतिभावान , गुण, समर्पण और सामाजिक व्यक्तित्त्व से संयुक्त है।[6]

इस महाकाव्य मानवतावादी चिन्तन के संदर्भ में अधोलिखित बिन्दु ध्यातव्य हैं।

1.सामाजिक चिन्तन का वर्णन किया गया है।

  1. जातिवाद का विरोध किया गया है।
  2. मानवतावादी विषयों का वर्णन किया गया है।
  3. राष्ट्रीय चिन्तन का वर्णन किया गया है।
  4. मानवीय शिक्षा का सर्वत्र वर्णन किया गया है।
  5. गुरु शिष्य के सम्बध का सुन्दर उल्लेख मिलता है।[7]
  6. एकलव्य के चारित्रिक भूमिका का वर्णन किया गया है।

8.संस्कारों का वर्णन किया गया है।[8]

  1. गुरुभक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।[9]
  2. प्रायश्चित भावना का मनोरम वर्णन किया गया है।[10]

इस प्रकार से वर्मा जी काव्यसाधना में मानवतावाद एवं सामाजिक चेतना का पदे पदे वर्णन मिलता है। अत: उनके काव्य को मानवतावाद और समाजिकतावाद  से पूर्णत: प्रभावित कहा जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion) :  वर्मा जी द्वारा विरचित गर्न्थों और उनके हिन्दी साहित्य के योगदान से सुस्पष्ट होता है कि- मानवीय चिन्तन और सामाजिक चेतना के वे पुरोधा आचार्य, विद्वान् थे।  उनका चिन्तन समाज के लिये प्रेरणा प्रदायक है। ऐसे व्यक्तित्त्व से समाज को शिक्षा मिलति है। सभी सामाजिक व्यक्ति उनके कार्यों से प्रेरित होकर समाज में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।

उनकी काव्य साधना पथा का लक्ष्य उन्होंने निश्चय ही प्राप्त किया , इसमें कोई संदेह नही है। अत: उनके साहित्य का अध्ययन करते हुए हमें उनसे प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची (Bibliography) :

1.डॉ० रामकुमार वर्मा का अभिनन्दन ग्रन्थ : प्रधान सम्पादक डॉ० जगदीश गुप्त ।

2.आधुनिक कवि भाग -3    :   डॉ० रामकुमार वर्मा ।

3.डॉ० रामकुमार वर्मा का सामाजिक दर्शन   :  डॉ० कामिनी भटनागर ।

4.साहित्य चिन्तन       :    डॉ० रामकुमार वर्मा ।

  1. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : डॉ० रामकुमार वर्मा ।

6.भारतीय संस्कृति के आयाम और आधिनुकता :  डॉ० गोविन्द चन्द्र पान्डेय ।

  1. साहित्य : समाजशास्त्रीय सन्दर्भ : डॉ० वी० ड़ी गुप्ता ॥

॥इति॥

[1] डॉ० रामकुमार वर्मा का अभिनन्दन ग्रन्थ, आमुख भाग में वर्णित

[2] डॉ० रामकुमार वर्मा का अभिनन्दन ग्रन्थ, आमुख भाग में वर्णित

[3] डॉ० रामकुमार वर्मा का अभिनन्दन ग्रन्थ, आमुख भाग में वर्णित

[4] प्रतिभा(अप्रैल-1955), में प्रकाशित कैलाश कल्पित का लेख ।

[5] डॉ० रामकुमार वर्मा : एकलव्य, पृष्ठ संख्या- 125

[6] डॉ० रामकुमार वर्मा : एकलव्य, पृष्ठ संख्या- 17

[7] डॉ० रामकुमार वर्मा : एकलव्य, पृष्ठ संख्या- 93

[8] डॉ० रामकुमार वर्मा : एकलव्य, आमुख, पृष्ठ संख्या- 125

[9] डॉ० रामकुमार वर्मा : एकलव्य, पृष्ठ संख्या- 222

[10] डॉ० रामकुमार वर्मा : एकलव्य, पृष्ठ संख्या- 297

Please rate this Research Paper

Leave a Reply