महर्षि मनु, नारद तथा याज्ञवल्क्य के अनुसार ‘ऋणादान-व्यवहार-विमर्श’ 4/5 (4)

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॥ओ३म्॥

॥सच्चिदानन्दाय नमः॥

विषय – महर्षि मनु, नारद तथा याज्ञवल्क्य के अनुसार ‘ऋणादान-व्यवहार-विमर्श”।

                                                                   अङ्कुश कुमार, पी.एच.डी. (शोधच्छात्र)

                                                        विशिष्ट-संस्कृताध्ययन केन्द्र

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

                                                        नई दिल्ली – ११००६७

Vedic Research, ISSN-2278-8131,

Issue 39, September 2015, Page No. 47-64,

Abstract / सारांश – (Download Abstract in PDF)

ऋणादान = ऋण चुका देने की भावना का उदय भारत में वैदिक काल में ही हो चुका था। ऋग्वैदिक काल में देव-ऋण, ऋषि-ऋण तथा पितृ-ऋण को क्रमशः यज्ञाराधना, अध्ययनाध्यापन और सन्तानोत्पत्ति से चुकाने की परिकल्पनाएँ विद्यमान थीं। इस प्रकार के ऋणों के साथ ही कालान्तर में अन्य सार्वभौमिक ऋणों की परम्परा भी प्रचलित हो गई। अतएव महाभारत काल में देव-ऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण, विप्र-ऋण और अतिथि-ऋण इन पाँचों ऋणों की व्यापक चर्चा हुई है। इन्हीं ऋणों के आधार पर लौकिक ऋणों के लेने-देन की परम्पराएँ भी समाज में प्रचलित होने लगी। इसके परिणाम-स्वरूप ऋण शब्द आध्यात्मिक व लौकिक दोनों ही प्रकार के ऋणों के लिए प्रयुक्त होने लग गया। इसी परम्परा में पुत्र अपने पूर्ववर्ती पुरुषों (स्ववंशजों) के ऋण को चुकाने के लिए उत्तरदायी माना जाने लगा। यही कारण विवाद का विषय भी बनने लग गया। अतः धर्मशास्त्रकारों ने इसे व्यवहारपद में परिगणित कर एतद्विषयक सभी पक्षों की विशद विवेचन किया। जिसके अन्तर्गत ऋणादान के सात प्रमुख अंग कहे गये व उनका प्रतिपादन किया गया। प्रस्तुत शोध-पत्र में महर्षि मनु, नारद व याज्ञवल्क्य के अनुसार ऋणादान-व्यवहार का प्रमाण पुरस्सर सविस्तर विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

कूटशब्द  –  १.उत्तमर्ण २.अधमर्ण ३.साक्षी ४.आधि ५.मध्यस्थ ६.रिक्थी ७.प्रतिभू

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प्रस्तावना –

मानव इह जगत् में सर्वोत्कृष्ट प्राणी है। सृष्टि के आदि से ही वह सबसे अधिक बुद्धिमान रहा है। इसीलिए वह सर्वत्र अपना प्रभुत्व स्थापित करता रहा है। इस प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए व परस्पर व्यवहार बनाये रखने के लिए उसे एकता व संगठन की आवश्यकता पड़ी। इस संगठन को भली-भाँति व्यवस्थित करने के लिए किन्हीं नियमों, आचार तथा व्यवहारों की आवश्यकता थी, जिनका प्रतिपादन आद्य ऋषियों ने अपौरूषेय वेदों को आत्मसात् कर उन्हें व्याख्यायित कर किया।

परञ्च समय के साथ समाज की चतुर्मुखी उन्नति के लिए परस्पर सहायता की नितान्त आवश्यकता थी। क्योंकि मानव जीवन में –

“चक्रवत् परिवर्तन्ते सुखानि च दुःखानि च”[1]। अथवा यह कहें कि  

“कस्यैकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा”[2]। “अतोऽपि नैकान्तसुखोऽस्ति कश्चिन्नैकान्तदुःखः पुरुषः पृथिव्याम्”[3]। और भी “भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति”[4]

और यह सहायता दो प्रकार की होती है –

  • निष्काम सहायता।
  • सशर्त सहायता।

इसी में सशर्त सहायता ‘ऋणादान’ नाम से अभिहित की गई है।

धर्मशास्त्रकार महर्षियों ने स्व-प्रतिपादित धर्मशास्त्रों व स्मृतिग्रन्थों में इस ऋणादान नामक व्यवहार का विधिपूर्वक वर्णन किया है।

व्यवहार से तात्पर्य-

व्यवहार शब्द वि तथा अव उपसर्ग पूर्वक हृञ् हरणे धातु से घञ्  प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। व्यवहार का सामान्य अर्थ प्रयोग होता है, परन्तु धर्मशास्त्र में यह एक निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसमें ’वि’ उपसर्ग ‘अनेक’ या ‘बहुत’ इस अर्थ का बोधक है तथा ’अव’ उपसर्ग सन्देह अर्थ का प्रत्याख्यान करता है। तदनुसार जो सन्देहों को हटाता है अथवा दूर करता है, वह व्यवहार कहलाता है[5]। यह व्युत्पत्यर्थ न्यायविधि या न्यायशासन की ओर व्यवहार को ले जाता है। एतदतिरिक्त ‘व्यवहार’ झगड़े या विवाद या मुकदमे से सम्बन्धित भी कहा जाता है। किन्तु याज्ञवल्क्य विवाद को ‘law-sut’ कहते हैं तथा व्यवहार को ‘judicial processer’ कहते हैं। उनके मत में प्रजा का रक्षण करना राजा का सर्वोच्च कर्तव्य है[6] और इस कर्तव्य का बिना अपराधियों को दण्डित किये पूर्ण होना सम्भव नहीं है, अतः राजा को ‘व्यवहार’ अर्थात् न्याय करना चाहिए[7]। मिताक्षराकार को भी यही मन्तव्य अभिप्रेत है[8]। राग, लोभ या भय-वशाद् व्यवहार (न्याय) में स्मृति-धर्मशास्त्रादि के विरुद्ध आचरण करनेवालों को विवाद में पराजय का जितना दण्ड हो उसके दुगुना दण्ड पृथक्-पृथक् सभासदों से भी लेना चाहिए[9]। इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने ‘व्यवहार’ तथा ‘विवाद’ में भेद किया है। वे कहते हैं –

“स्मृत्याचारव्यपेतेन मार्गेणाऽधर्षितः परैः।

                  आवदेयति चेद्राज्ञे व्यवहारपदं हि तत्[10]

मिताक्षराकार व्यवहार की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं –

“अन्यविरोधेन स्वात्मसंबन्धितया कथनं व्यवहारः”। अर्थात् किसी अन्य के साथ विरोध पुरस्सर स्व-विषयक कथन को व्यवहार कहा जा सकता है। इसी को और अधिक स्पष्ट करने हेतु उदाहरण पुरस्सर कहते कि जैसे कोई कहता है कि यह पुरोदृश्यमान क्षेत्र मेरा है, इसी अवसर वहीं उपस्थित अन्य व्यक्ति कहता है कि नहीं, यह क्षेत्र मेरा है[11]। इस प्रकार की स्थिति में वह व्यवहार का विषय बन जाता है। अन्यच्च –

        “परस्परं मनुष्याणां स्वार्थविप्रतिपत्तिषु।

                वाक्यन्यायाद्यवस्थानं व्यवहार उदाहृतः”[12]

इस व्यवहार के चार अङ्ग होते हैं- १. भाषापाद २. उत्तरपाद ३. क्रियापाद                    ४. साध्यसिद्धिपाद।

  • भाषापाद – पूर्वोक्त प्रकार से जब व्यवहार की अवस्था समुपस्थित हो, तब धर्माधिकारी प्रत्यर्थी के समक्ष अर्थी से विवाद से सम्बन्धित तथ्य तथा वर्ष, मास, दिन, तिथि, इत्यादि व आवेदक का नाम, जाति आदि सम्पूर्ण विवरण लिखवायें[13]। मितक्षराकार के अनुसार इसी प्रसङ्ग में देश, स्थान, संनिवेश, जाति, संज्ञा, अधिवास, क्षेत्रनाम, पितृ-नाम, पितामह का नाम व पूर्व अन्य विवाद प्रसङ्ग, ये दश तथ्य अवश्य लिखवायें[14]। तथा इस विवरण में यह अवश्य ध्यान दें कि अर्थी किसी अप्रसिद्ध[15], निराबाध[16], निरर्थक[17], निष्प्रयोजन[18], असाध्य[19] तथा विरुद्ध[20] विषय का वर्णन न हो[21]
  • उत्तरपाद – भाषापाद के अनन्तर अर्थी द्वारा लगाये गये सभी आरोपों का उत्तर प्रत्यर्थी से लिखित रूप में लेने की प्रक्रिया को उत्तरपाद कहा जाता है। याज्ञवल्क्य के अनुसार यह उत्तर वादी (अर्थी) के समक्ष ही लिखवाना चाहिये[22]। उत्तर लिखते समय यह ध्यातव्य है कि उसमें वादी द्वारा लगाये गये सभी आरोपों का व्यापक सार हो तथा वह असंदिग्ध हो। इसी प्रकार पूर्वापरविरोध-कथन से युक्त न हो तथा अव्याख्यागम्य अर्थात् अप्रसिद्ध शब्द अथवा क्लिष्ट समास, विभक्ति, अध्याहार तथा अभिधान आदि का प्रयोग न हो[23]। प्रत्यर्थी को इस प्रकार से उत्तर लिखना चाहिए। कात्यायन ने इस ‘उत्तर’ के ४ भेद किए हैं। तद्यथा – १.सत्य २.मिथ्या ३.प्रत्यवस्कन्दन ४.पूर्वन्यायविधि[24]
  • सत्य – इस भेद में वे उत्तर परिगणित होंगे, जिनमें अर्थी द्वारा लगाये गये आरोपों को यथावत् स्वीकार किया गया हो। मिताक्षराकार इसका लक्षण इस प्रकार कहते हैं- “साध्य (वादी द्वारा लगाये गए आरोप) सत्य है[25]” यह कथन सत्योत्तर-भेद के अन्तर्गत परिगणित होगा।
  • मिथ्या – अभियोग में लगाये गये आरोपों को जब अभियुक्त छिपाने का प्रयास करे, तो वह मिथ्या उत्तर कहलाता है[26]। इस मिथ्या उत्तर के भी पुनः चार भेद किये गये हैं । तद्यथा – “मिथ्यैतन्नाभिजानामि तदा तत्र न सन्निधिः।

  अजातश्चास्मि तत्काल इति मिथ्या चतुर्विधम्”[27]

  • प्रत्यवस्कन्दन – इस भेद के अन्तर्गत उनका परिगणन होता है, जिनमें अभियुक्त द्वारा लगाए गये आरोपों को स्वीकृति पूर्वक उनका निराकरण कर दिया जाता है। यथा- अभियुक्त कहें की “यह सत्य है कि मैनें अर्थी से धन लिया था, परन्तु उसके प्रतिग्रह के रूप में अपने घर से धान्य उसे दिया था अथवा पुनः अमुक तिथि को लौटा दिया था”। नारद का भी यह ही मन्तव्य है[28]
  • पूर्वन्यायविधि – इस श्रेणी में उन उत्तरों का परिगणन किया जाता हैं, जिनमें प्रतिवादी यह कहता है कि इससे पहले अभियोग में यह (प्रस्तुत अभियोग का अर्थी) अभियुक्त था तथा वह व्यवहार में पराजित हो गया था, उसी के प्रतिशोध-स्वरूप इसने मुझ पर यह अभियोग लगाया है। इस प्रकार उत्तर के चार भेद किए जाते हैं।
  • क्रियापाद – इसके अन्तर्गत न्यायाधीश व न्याय-समिति से सम्बद्ध जन उस अभियोग को अच्छी प्रकार से समझकर, तद्विषयक प्रमाण संग्रह हेतु दोनों ही पक्ष- अर्थी व प्रत्यर्थी को आदेश देते हैं[29]। अर्थी व प्रत्यर्थी स्वपक्ष-पुष्टि हेतु प्रमाण-संग्रह में सन्नद्ध होकर न्यायालय में न्यायाधीश के समक्ष उन्हें प्रस्तुत करते हैं।
  • साध्यसिद्धिपाद – इस पाद में अर्थी तथा प्रत्यर्थी द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों की परीक्षा होती है। उस साधन की सिद्धि होने पर वादी जय को प्राप्त होता है, इसके विपरीत साधनों के दुष्ट होने पर वही वादी पराजय को प्राप्त होता है[30]।  इस प्रकार से यह व्यवहार ४ पादों से युक्त होता है[31]

कौटिल्य आदि आचार्यों ने ‘व्यवहारपद’ के स्थान पर ‘विवादपद’ का प्रयोग किया हैं। महर्षि मनु से यहाँ पद का अर्थ विषय न करके स्थान किया है। इस प्रकार व्यवहार अथवा विवाद के पद अथवा स्थान सामान्य रूप से धर्मशास्त्रों में १८ कहे गये हैं। परन्तु स्मृतिकारों में व्यवहार-पदों की संख्या तथा संज्ञा के विषय में अनेकविधता दृष्टिगोचर होती है।

मनु ने १८ व्यवहारपदों का इस प्रकार अभिधान किया है – १.ऋणादान २.निक्षेप ३.अस्वामिविक्रय ४.सम्भूय समुत्थान ५.दत्तस्यानपाकर्म ६.वेतनादान ७.संविद्-व्यतिक्रम ८.क्रयविक्रयानशय ९.स्वामिपालविवाद १०.सीमाविवाद ११.वाक्यारुष्य १२.दण्डपारुष्य १३.स्तेय १४.साहस १५.स्त्रीसंग्रहण १६.स्त्रीपुंधर्म १७.विभाग १८.द्यूतसमाह्वय। याज्ञवल्क्य ने २० व्यवहारपद स्वीकार किये हैं। उन्होंने स्त्रीपुंधर्म को आचार में उपन्यस्त किया है तथा अभ्युपेत्याशुश्रूषा एवं प्रकीर्ण ये दो पद अन्य जोड़ दिये हैं। एतदतिरिक्त क्रय-विक्रयानुशय को दो भागों में विभक्त कर उनकी पृथक्-पृथक् व्यवहार-पद के रूप में गणना की हैं। इन्हीं व्यवहार-पदों को नामान्तर से कौटिल्य ने १६, नारद ने १८ तथा बृहस्पति ने १९ संख्यक स्वीकार किया हैं।

प्रस्तुत विवेचन में धर्मशास्त्रों में अन्यतम १. महर्षि याज्ञवल्क्य-कृत याज्ञवल्क्यस्मृति २. महर्षि मनु-प्रणीत मनुस्मृति तथा ३. महर्षि नारद-प्रणीत नारदस्मृति के अनुसार ‘ऋणादान’ नामक व्यवहार का विवेचन किया जा रहा है।

ऋणादान का अर्थ

जब व्यक्ति अपनी किसी आवश्यकता की पूर्ति अपने स्वामित्ववाले समुपस्थित साधनों से करने में असमर्थ होता है और वह आवश्यकता इस प्रकार से अपरिहार्य- अनिवार्य हो कि उसे टाला नहीं जा सके। ऐसी स्थिति में जब किसी दूसरे व्यक्ति से प्रत्यावर्तनीय सहायता ली जाती है, तो वह सहायता ‘ऋण’ कहलाती है। ऐसी सहायता मौखिक, लिखित, अनुबन्धित तथा प्रतिबन्धित रूप से ब्याज पर अथवा बिना ब्याज के एक निश्चित अवधि तक के लिए ली जाती है।

ऋणादान की प्राचीनता

यूँ तो मनुष्य ने जब भी परस्पर संगठित होकर समुन्नति के लिए प्रयत्न किया होगा, तभी से ऋणादान का भी प्रचलन रहा होगा, तथापि हमारे पास ऋणादान विषयक सर्वप्रथम लिखित साक्ष्य ऋग्वेद में उल्लिखित हैं।

ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर ऋण की चर्चा की गई है तथा इसकी ग्रहण-विधि का भी अनेकत्र वर्णन प्राप्त होता है। ऋग्वेद में मरुत् सूक्त का ये मन्त्र इसका ज्वलन्त उदाहरण है-

“ये मर्त्यं पृतनायन्तमूमैर्ऋणावानं न पतयन्त सर्गैः”[32]

अन्यत्र भी यथा –

“जाया तप्यते कितवस्य हीना माता पुत्रस्य चरतः क्व स्वित्।

            ऋणा वा बिभ्यद्धनमिच्छमानोऽन्येषामस्तमुपनक्तमेति”[33]

ऋणादान के अंश –

मिताक्षरा कार ने ऋणादान के सात अंश स्वीकार किये हैं। तदनुसार पाँच अधमर्ण सम्बन्धित तथा दो उत्तमर्ण सम्बन्धित है।

  • किस प्रकार का ऋण लौटाने योग्य है।
  • किस प्रकार का ऋण लौटाने योग्य नहीं है।
  • धन किस अधिकारी के द्वारा अदा करने योग्य है।
  • किस समय में अदा करना उचित है।
  • अमुक प्रकार से अदा करना आवश्यक है।
  • दान विधि
  • आदान विधि

महर्षि नारद ने भी इन्हीं सप्ताशों को स्वीकार किया है। तदनुसार –

“ऋणं देयमदेयं च येन यत्र यथा च यत्।

                दानग्रहणधर्माभ्यामृणादानमिति स्मृतम्”[34]

दान-विधि –

ऋणादान के सप्ताशों में सर्वप्रथम दान-विधि का वर्णन किया जा रहा है, क्योंकि अधमर्ण व उत्तमर्ण से सम्बन्धित प्रथम यही अंश है।

दान-विधि के वर्णन प्रसंग में ब्याज निर्धारित करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि बन्धक के साथ दिये गये ऋण में प्रयुक्त धन का अस्सी अंशों में से एक अंश सूद होना चाहिये और यदि ब्याज निर्धारित नहीं किया हो तो धन के प्रयोग में ‘वर्ण’ जो ब्राह्मणादि उनके क्रम से ‘द्वि-त्रि-चतुःपञ्चकं शतं धर्म्यं भवति’ अर्थात यदि ब्राह्मण ऋण ले (अधमर्ण हो), तो प्रति सैकड़ा दो रूपये, क्षत्रिय हो तो तीन रूपये प्रति सैकड़ा सूद लेना धर्मानुकूल है। इसी प्रकार वैश्य यदि ‘अधमर्ण’ हो तो चार रूपये तथा शूद्र हो तो पाँच रूपये ब्याज लेना चाहिए।

ब्याजवृद्धि

आचार्य नारद उपरोक्त ब्याज की वृद्धि को चार प्रकार का मानते हैं। तदनुसार –

“कायिका कालिका चैव कारिता च तथा परा।

                चक्रवृद्धिश्च शास्त्रेषु तस्य वृद्धिश्चतुर्विधा”[35]

  • कलिका – जिस सूद (ब्याज) को मास के हिसाब से अदा किया जाए उसको ‘कालिकी’ वृद्धिकहते है।
  • कायिकी – कालिकी नामक मासिक ब्याज ही जब मास के दिनों को गिनकर उसके हिसाब अर्थात् प्रतिदिन के हिसाब से अदा किया जाए तो वह ‘कायिकी वृद्धि’ कहलाती है।
  • कारिता – अधमर्ण और उत्तमर्ण दोनों की इच्छा के अनुसार दोनों की अनुमति से जो वृद्धि निर्धारित हो, उसको कारिता वृद्धि कहते है।
  • चक्रवृद्धि – वृद्धि स्वरूप मूलधन से पुनः जो वृद्धि उत्पन्न हो उसे चक्रवृद्धि कहते है।

वृद्धि के विशेष प्रकार –

  • जो अधमर्ण ब्याज पर धन देकर लाभ के लिए अति गहन वन में (ऐसा वन जिसमें विचरण से मरने की शंका हो) प्रवेश करें, वे दश प्रतिशत प्रतिमाह वृद्धि प्रदान करें।
  • जो अधमर्ण ब्याज पर धन देकर लाभ के लिए समुद्र में जाए, वह बीस प्रतिशत प्रतिमाह वृद्धि प्रदान करे।
  • अनाकारित वृद्धिवाला धन भी यदि आधे वर्ष तक अदा न हो तो वह धन भी वृद्धि को प्राप्त करता है। नारद के अनुसार –

“न वृद्धिः प्रीतिदत्तानां स्यादनाकारिता क्वचित्।

अनकारितमप्यूर्ध्वं वत्सरार्धाद्विवर्धते”[36]

  • जो पुरुष उधार दिये हुए धन को माँगने पर भी न दे और अन्यत्र चला जाए, उस धन पर तीस माह के बाद कारिता वृद्धि प्रारम्भ होती है।
  • अपने देश में रहता हुआ भी अधमर्ण उधार धन को अदा न करें तो पहले स्वीकृत न रहने पर भी उस पर ग्रहण-तिथि से ही ‘अकारिता’ वृद्धि लागू होती है।

अनाकारित वृद्धि के अपवाद –

१.पण्यमूल २.वेतन ३.न्यास ४.वृथादान ५.आक्षिक (जुआँ सम्बन्धी धन) ६.पण (शर्त) इन सभी धनों  पर अकारित वृद्धि नहीं होती।

द्रव्यों (वस्तुओं) से सम्बन्धित वृद्धि –

  • यदि मादा पशुओं को उधार धन स्वरूप दिया जाए तो उस मादा के बच्चे ही वृद्धि-स्वरूप होंगे (अर्थात् उत्तमर्ण प्राप्त करेगा, अन्य दूध, खाद आदि नहीं)।
  • तेल घृत आदि पदार्थों पर लागू वृद्धि यदि मूल धन से अधिक हो तो वह वृद्धि केवल आठ-गुना ही हो सकती है।
  • वस्त्र-सम्बन्धी वृद्धि चौगुना, धान्य-सम्बन्धी वृद्धि-तीन गुना तथा हिरण्य सम्बन्धी वृद्धि दुगनी ही ग्राह्य है। अर्थात् एक मास केव् लिए जितनी वृद्धि स्वीकृत हो, अदा न होने पर यदि वह मूलधन के साथ संयुक्त होने पर मूलधन से उपरोक्त क्रम तक ही होती है। आगे ग्राह्य नहीं है।
  • मनु के अनुसार – ‘धान्ये शदे लवे वाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम्’[37]

ऋण ग्रहण (वापसी) विधि –

आचार्य मनु ऋण-ग्रहण विधि के विषय में कहते हैं –

“धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च।

                प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चमेन बलेन च[38]

  • धर्म – प्रीति से युक्त सत्य वचन से।
  • व्यवहार – साक्षी लेखादि प्रमाण से ।
  • छल – ‘मुझे एक उत्सव में जाना है तब तक के लिए अमुक भूषण या वस्त्र दे दो’ उत्सव के इस बहाने से भूषणादि लेकर धनाहरण तक न लौटाना।
  • आचरित – अनशन कर अधमर्ण के द्वार पर बैठकर।
  • उपाय (बल) – जंजीर आदि से बांधकर।

ग्रहण-विधि का क्रम –

  • यदि समान जाति के अनेक उतमर्ण हो तो जिस क्रम से अधमर्ण ने धन लिया हो उसी क्रम से राजा को दिलाना चाहिए।
  • यदि उत्तमर्ण अनेक जातियों के हो तो वर्णक्रम से भुगतान राजा को दिलाना चाहिए। अर्थात् पहले ब्राह्मण को, तदनन्तर क्षत्रिय को, तदनन्तर वैश्य को, तत्पश्वात शूद्र अधमर्ण को धन दिलाना चाहिए। भले ही कालक्रम के अनुसार उत्तरवर्णी (उत्तरवर्ती वर्णों)का ही प्राधान्य (प्राथम्य) हो।

असमर्थ अधमर्ण से ग्रहण-विधि –

ब्राह्मणादि उच्चवर्ग के उत्तमर्णों को चाहिए कि ’हीन-जाति’ के अपने से न्यून क्षत्रियादि जातियों के ’परिक्षीण’ अर्थात् निर्धन अधमर्णों के ’ऋणार्थ’ अर्थात् ऋण से मुक्त कराने के लिए ’स्वकर्म’ अर्थात् अधमर्ण के जात्यनुकूल कार्य करा ले। किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि काम ऐसा हो जिस से उस निर्धन अधमर्ण को परिवार चलाने में असुविधा न हो। किंतु ब्राह्मण जाति का अधमर्ण यदि ’परिक्षीण’ हो जाए, अर्थात् निर्धन हो जाए तो शनैः शनैः ’यथोदय’ यथा सम्भव ऋण दिलाना चाहिए। यहाँ हीन-जाति शब्द से समान जाति भी गृहीत है।

मध्यस्थ के पास रखे हुए धन की वृद्धि –

अधमर्ण के पास बढ़ते हुए धन को यदि अधमर्ण, उत्तमर्ण को अदा करना चाहे, किन्तु वृद्धि के लोभ से उत्तमर्ण न लेना चाहे तो अधमर्ण को देय धन मध्यस्थ के पास जमा कर देना चाहिए। फिर भी यदि वृद्धि के लोभ से उत्तमर्ण न ले तो मध्यस्थ के हाथ में स्थापन के दिन से उस धन की वृद्धि नहीं होगी। यदि मध्यस्थ के हाथ स्थापित धन को उत्तमर्ण के माँगने पर भी मध्यस्थ न दे तो फिर उस धन की वृद्धि पहले के समान चलती रहेगी।

ऋण किसके द्वारा देय हो –

  • अविभक्त कुटुम्ब के उपकार के लिए किसी एक व्यक्ति के द्वारा लिया गया हो अथवा परिवार के अनेक व्यक्तियों के द्वारा लिया गया हो – वह ऋण पूरा कुटुम्बी दे। उनमें से यदि कोई व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो अथवा विदेश चला जाए, तो उसके धन को ग्रहण करने वाले रिक्थी (उत्तरधिकारी) उस धन के अपने अंश को अदा करें”।
  • पिता यदि स्वकृत ऋण को बिना अदा किए ही मृत्यु को प्राप्त करें, दूर देश को प्राप्त करें अथवा उन व्याधियों से पीड़ित हो जाए, जो औषधि से बाहर हो – इस प्रकार का पिता यदि अपनी ऋण की बात न भी कह जाए, तथापि उसके पुत्र को एवं पौत्र को उसका धन प्राप्त न होने पर भी केवल पुत्र अथवा पौत्र होने के नाते ही अपने पिता अथवा पितामह के ऋण को अदा करना चाहिए। क्योंकि –

“इच्छन्ति पितरः पुत्रान् स्वार्थहेतोर्यतस्ततः।

उत्तमर्णाधमर्णेभ्यो मामयं मोचयिष्यति”॥

अतः पुत्रेण जातेन स्वार्थमुत्सृज्य यत्नतः।

ऋणात्पिता मोचनीयो यथा नौ नरकं व्रजेत्”[39]

अदेय ऋण –

  • यदि कुटुम्ब के हित में न लेकर मात्र स्वयं के हित के लिए लिया गया ऋण यदि स्वामी ले तो उसकी भार्या उस ऋण को न चुकाये।
  • इसी प्रकार यदि पुत्र अपने प्रयोजन के लिए ऋण लेता है, तो माता उस ऋण को न दें।
  • इसी प्रकार पुत्रकृत् ऋण पिता न दें।
  • भार्या का लिया हुआ ऋण पति न दें।
  • मद्यपान के लिए किया गया ऋण, कामकृत् अर्थात् स्त्री व्यसनजनित ऋण, जूए में हारने के निमित्त किया गया ऋण, दण्ड और शुल्क इन दोनों के चुकायें जाने से बचा हुआ धन-स्वरूप ऋण, वृथा-दान अर्थात् धूर्त, बन्दी, मल्ल, कुवैद्य, बेईमान, ठग, भाट और चोर आदि को देने के लिए प्रतिज्ञात द्रव्य-रूप ऋण, ये सभी ऋण यदि पिता के द्वारा किए गये हो तो उसके ग्राहक शौण्डिक आदि को ऋण काढ़ने वाले का पुत्र अदा न करें।

अदेय ऋण का अपवाद –

  • गोपालक, मद्य बनाने वाला, नट, व्याध, इनकी स्त्रियों द्वारा किए गये ऋणों को उनके स्वामी द्वारा भुगतान करना चाहिए। क्योंकि इनकी (पुरुषों की) वृत्ति उन लोगों के पत्नियों के अधीन होती है।
  • मुमूर्षु, अथवा प्रवास पर जाते हुए पति के द्वारा ऋण अदा करने के लिए आदिष्ट पत्नी पतिकृत उस ऋण को अदा करें जो प्रमाण से निष्पन्न हो एवं पत्नी ने पति के साथ जो ऋण लिया हो उस ऋण को भी पति के न रहने पर पुत्र रहिता पत्नी अदा करे। जो पत्नी का स्वयंकृत ऋण हो उसको भी वह अदा करें।

ऋणी की मृत्यु के बाद देनदार –

  • पिता यदि स्वकृत ऋण को अदा किए बिना ही मृत्यु को प्राप्त करे, दूर देश को चला जाए अथवा उन व्याधियों से पीड़ित हो, जो औषधि से उपचार योग्य न हो – इस प्रकार का पिता यदि अपनी ऋण की बात न भी कह जाए, तथापि उसके पुत्र को एवं पौत्र को उसका धन प्राप्त न होने पर भी केवल पुत्र अथवा पौत्र होने के कारण ही अपने पिता अथवा पितामह के ऋण को अदा करना चाहिए।
  • ’रिक्थ’ स्वरूप् धन के ग्रहण करने वाले जो धनग्राही उसी को रिक्थ देने वाले के ऋण को अदा करना चाहिए।
  • योषिद्ग्राह्य को भी योषिता के प्रकृत स्वामी के ऋण को अदा करना चाहिए।

अयोग्य ’रिक्थी’ –

यद्यपि पिता के सम्पूर्ण सम्पत्ति का रिक्थी पुत्र ही होता है तथापि यदि पुत्र निम्न गुणोपेत हो तो वह रिक्थी नहीं बन सकता।

  • नपुंसक, बधिर, अंधे पुत्रों को रिक्थग्राही नहीं माना जा सकता।
  • सवर्णा स्त्री से उत्पन्न होने पर भी पुत्र यदि अन्याय्यपथगामी हो तो वह भी अयोग्य रिक्थी कहलाता है।

अयोग्य प्रतिभू –

स्वामी और पत्नी में एवं पिता पुत्र में धन विभाग से पूर्व उनमें से किसी को प्रतिभाव्य अर्थात् किसी का प्रतिभू होने का (जामिन होना) ऋण लेने और साक्षी देने को मन्वादि ऋषियों ने विधान नहीं किया है। उन्होंने इनका निषेध भी किया है, क्योंकि इन सभी का धन साधारण है।

प्रतिभू के प्रकार- 

विषयभेद से प्रतिभू तीन प्रकार के होते हैं –

  • दर्शन प्रतिभू – यदि किसी अभियुक्त के दर्शन अर्थात् राजा के समक्ष उपस्थित करने की आवश्यकता हो तो “मैं उस पुरुष” को तुम्हें राजा के समक्ष उपस्थित कर दूँगा। इस प्रतिज्ञा को जो ग्रहण करें, वह दर्शन विषयक प्रतिभू कहलाता है।
  • प्रत्यय प्रतिभू – कोई यदि किसी उत्तमर्ण (महाजन) से किसी अधमर्ण के प्रसङ्ग में मेरे प्रत्यय से अर्थात् मेरे कथन पर विश्वास कर, इसको तुम धन (ऋण) दो। यह तुम्हें ठगेगा नहीं, क्योंकि अमुक का पुत्र है, उपजाऊ भूमि एवं अच्छे गाँव इसके पास हैं। ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला “प्रत्यय-प्रतिभू” कहलाता है।
  • दान-प्रतिभू – यदि तुम्हें यह धन नहीं देगा तो मैं तुम्हें यह धन दूँगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा वाला व्यक्ति “दान प्रतिभू” कहलाता है।

व्यवहार प्रसंग में प्रतिभू व्यक्ति की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

प्रतिभू द्वारा देय ऋण

दर्शन-प्रतिभू, प्रत्यय-प्रतिभू एवं दान-प्रतिभू इन तीनों से राजा को चाहिए कि उत्तमर्ण का ऋण दिलाए। यदि दुष्टता अथवा दरिद्रतावश यदि अधमर्ण अपने ऋण का प्रतिकार न करें तो दर्शन-प्रतिभू एवं प्रत्यय प्रतिभू ये दोनों यदि दिवङ्गत हो जाए, तो उनके पुत्रों को प्रतिभू के पुत्र होने के कारण ऋण देय नहीं है। जो दान को निमित्त बनाकर प्रतिभू बना है अर्थात् दान-प्रतिभू यदि परलोकगत हो जाए तो उनके पुत्र अपने पिता के प्रतिभू होने के कारण प्राप्त ऋण को अदा करें। किन्तु पौत्र इस ऋण को अदा न करें। दान-प्रतिभू के पुत्र भी उक्त ऋण के मूलधन को ही अदा करें, वृद्धि को नहीं।

  • एक ही प्रयोग में यदि दो या दो से अधिक प्रतिभू हों तो मूल ऋण को अपने में (प्रतिभूओं) में विभक्त कर अपने अंश में जितना धन देय प्राप्त हो उतना प्रत्येक दे।
  • यदि प्रतिभूओं में सभी उस धन को देना चाहते हैं तो उत्तमर्ण की इच्छा से धन दिलाना चाहिए।
  • धनिक के तकाजे से दुःखी होकर जो प्रतिभू अधमर्ण के ऋण को ’प्रकाश’ में अर्थात् सभी जनों के सामने राजा की आज्ञा से जितना धन दे, उसी धन का द्विगुण अधमर्ण को अदा करना चाहिए। किन्तु जो धन प्रतिभू द्विगुण धन की प्राप्ति के लोभ से स्वयं राजा के पास अधमर्ण के ऋण रूप में जमा करें, उस धन का द्विगुण देना अधमर्ण को आवश्यक नहीं है।
  • प्रतिभू के द्वारा प्रदत्त धन का यह द्विगुण होने के लिए काल-विशेष की आवश्यकता नहीं है।

प्रतिभू द्वारा प्रदत्त धन के द्विगुणता का अपवाद –

स्त्री-पशु की वृद्धि उनकी सन्तति तक, धान्य की वृद्धि मूल के द्विगुण तक ही, वस्त्र स्वरूप ऋण की वृद्धि चार गुणा एवं तैलादिकी वृद्धि आठ गुणा होती है।

असमर्थ प्रतिभू –

“न स्वामी न च वै शत्रुः स्वामिनाधिकृतस्तथा।

                निरुद्धो दण्डितश्चैव सन्दिग्धश्चैव न क्वचित्”[40]

इत्यादि श्लोकों में असमर्थ प्रतिभू का लक्षण तथा उनके नाम आचार्य कात्यायन ने दर्शायें हैं। वे इस प्रकार हैं –

अधमर्ण का स्वामी, अधमर्ण का शत्रु, अधमर्ण के स्वामी के अधिकार में रहनेवाला पुरुष, कारा निरुद्ध, राजा से दण्डित, जो अभिशप्त हो, अधमर्ण का रिक्थी, अधमर्ण का मित्र, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, राजकार्य में नियुक्त पुरुष, संन्यासी, उत्तमर्ण को धन तथा राजा को तत्समधन दण्ड इन दोनों को देने में असमर्थ, जिसका पिता जीवित हो, जो दूसरे की इच्छा के अनुसार चलता हो, उत्तमर्ण आदि का परिचित न हो। ये सभी प्रकार के पुरुष प्रतिभू नहीं हो सकते।

आधि के प्रकार –

धन को ऋण पर लगाने में ऋणिक पर विश्वास के दो हेतु हैं – १. प्रतिभू २. आधि। इन दोनों में प्रतिभू का निरूपण किया जा चुका है। अब आधि का निरूपण किया जा रहा है।

अधमर्ण के द्वारा लिए गये धन पर विश्वास के लिए अधमर्ण के जिस वस्तु को अधिकार में लिया जाता है, उसको ’आधि’ कहते हैं। यह ’आधि’ आधीयते स्थाप्यते इति आधिः इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है।

नारद ने इस आधि के दो प्रकार स्वीकार किए हैं – १. कृतकालोपनेय २. यावद्देयोद्यत। इन दोनों में से प्रत्येक पुनः १. गोप्य व २. भोग्य भेद से दो प्रकार के हैं।

        “आधिक्रियत इत्याधिः स विज्ञेयो द्विलक्षणः।

                कृतकालेऽपनेयश्च यावद्देयोद्यतस्तथा॥

                        स पुनर्द्विविधः प्रोक्तो गोप्यो भोग्यस्तथैव च”[41]

कृतकालोपनेय –

आधान-काल में ही अर्थात् ऋण ग्रहण के समय ही “दीपोत्सवादिरूप” अमुक काल में यह आधि (बन्धक छुड़ा लूँगा) यदि ऐसा न करूँ तो यह आधि तुम्हारा (उत्तमर्ण का) हो जायेगा। इस प्रकार से निरूपित दीपोत्सवादि रूप भविष्य-काल में आधि को ऋणिक के द्वारा ऋण देकर अपने अधीन कर लेना चाहिए। इस प्रकार के आधिक को ही कृतकालोपनेय’ कहते हैं।

यावद्देयोद्यत –

लिए गये धन के लौटाने के पर्यन्त का अनियत काल ’यावद्देयोद्यत’ नामक आधि है। इन आधियों के गौप्य व भोग्य विषय में आगे बताया जा रहा है।

 

आधि विषयक तथ्य –

  • यदि वृद्धि के लिए लगाया गया धन अपनी करार के अनुसार वृद्धि सहित द्विगुण हो जाता है, तो उसके बाद भी यदि अधमर्ण देय द्रव्य को चुकाकर अपनी दी हुई “आधि” को मुक्त नहीं करा लेता है, तो उस आधि के उपर अधमर्ण का स्वत्व नहीं रह जाता। उस धन में प्रयोक्ता उत्तमर्ण का स्वत्व हो जाता है। अर्थात् वह भोग्य हो जाती है।
  • आधि में दिये गये खेत, बाग प्रभृति विवक्षित है। इन बन्धकों पर से ऋणिक के स्वत्व का नाश कभी नहीं होता।

गोप्य आधि –

रक्षणीय (गोप्य) आधि  – ताम्बे के कड़ाह प्रभृति। उनका यदि उत्तमर्ण उपभोग करें तो उस द्रव्य के ऊपर लिए गये धन पर वृद्धि न हो। फलतः भोग यदि अल्प भी हो और वृद्धि अधिक हो तथापि उस वृद्धि से उत्तमर्ण हाथ धो बैठे, क्योंकि ’प्रतिज्ञा’ रूप समय दोनों स्थितियों में समान है।

  • आधि अर्थात् भोग्य और रक्षणीय दोनों ही प्रकार के आधियों के स्वीकरण अर्थात् उपभोग से ही ’आधि-ग्रहण’ अर्थात् धनिक द्वारा बन्धक के ग्रहण की सिद्धि होती है। साक्षी अथवा लेख प्रमाणमात्र से बन्धक लेना सिद्ध नहीं होता। उसके लिए भुक्ति अथवा भोग-रूप प्रमाण भी आवश्यक है एवं ’उद्देश्य’ मात्र से अर्थात् आधीभूत वस्तुओं के नाममात्र कह देने से भी आधि की सिद्धि नहीं हो सकती।
  • स्थावर और जङ्गम भेद से आधि के जो भेद हैं, ये दोनों यदि धनी के भोग में आये तो ये आधि हो सकते हैं, अन्यथा केवल कहने अथवा लिखने से नहीं।
  • उत्तमर्ण अपनी स्वच्छाशयता के कारण ऋण “धन” के अनुरूपन होने पर भी अल्पमूल्यक द्रव्य को भी आधि रूप में ग्रहण करता है। अथवा अधमर्ण ही अपनी स्वच्छाशयता के कारण ऋण के अनुसार आधिक द्रव्य भी आधि के लिए उत्तमर्ण के जिम्मे करता है। ऐसे स्थलों में धन के द्विगुण होने पर आधि नाश नहीं होता है।
  • ऋण चुकाने के लिए उपस्थित होने पर अधमर्ण के आधि को उत्तमर्ण को उसे लौटा देना चाहिए। यदि उत्तमर्ण ऐसा करें तो उसे चोर के प्राप्य दण्ड से दण्डित करना चाहिए।

 भोग्य आधि –

जिस समय ऋण पर दिया गया धन सूद समेत दूना हो जाए तो तदुत्पन्न अर्थात् उस आधि के बाद उक्त द्विगुण-धन का दूना होने पर धनी से उस आधि को मुक्त करा देना चाहिए।

परस्परानुमति के रहने पर उत्कृष्ट बन्धक का भी उपभोग उत्तमर्ण करता रहे एवं परस्परानुमति रहने पर वृद्धि सहित मूलधन की अपेक्षा निकृष्ट मूलधन मात्र अदा करने के बाद भी अधमर्ण बन्धक को प्राप्त करें।

उपसंहार –

इस प्रकार से ऋणादान नामक व्यवहार करणीय है। आचार्य मनु ने यद्यपि स्वल्पतया ऋणादान का वर्णन किया है तथापि नारद व याज्ञवल्क्य ने ऋणादान पर पर्याप्त प्रकाश डाला है।

प्रस्तुत पत्र में ऋणादान के सभी अंशों को सरलतया प्रस्तुत किया गया है। वास्तव में समृद्ध मानव जीवन में ऋणादानादि व्यवहारों की अत्यन्त आवश्यकता होती है अतः शास्त्रों में इसके विषय में विस्तृत विवेचन दिया है। उपरोक्त विवरण व विश्लेषण से हमें ऋणादान व्यवहार विषय में सहायता मिल सकती है।

सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची –

  • मनुस्मृति :- (हिन्दी अनुवाद) स्वामी दर्शनानन्द, (प्रकाशक) मुरादाबाद, प्रथम संस्करण १९८४ ।
  • मनुस्मृति :- (हिन्दी अनुवाद) हरिगोविन्द शास्त्री, (प्रकाशक) चौखम्बा संस्कृत सिरीज ऑफिस, वाराणसी, चतुर्थ संस्करण १९७९ ।
  • मनुस्मृतिः- (हिन्दी व्याख्याकार) गिरिधर गोपाल शर्मा, (प्रकाशक) चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति : मिताक्षरा व्याख्या सहित –(हिन्दी अनुवाद) उमेशचन्द्र पाण्डेय, चौखम्बा संस्कृत सिरीज ऑफिस, वाराणसी, प्रथम संस्करण १९६७ ।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति : मिताक्षरा व्याख्या सहित –(गंगासागर राय, (प्रकाशक) चौखम्बा संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण १९९९ ।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति : मिताक्षरा व्याख्या सहित –(व्याख्याकार) दुर्गाधर झा विद्यावाचस्पति, (सम्पादक) शशिनाथ झा, (प्रकाशक) भारतीय विद्या प्रकाशन, वाराणसी, प्रथम संस्करण २००२ ।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति : मिताक्षरा व्याख्या सहित –(व्याख्याकार) कमलनयन शर्मा, (प्रकाशक) जगदीश संस्कृत पुस्तकालय, जयपुर, प्रथम संस्करण २००९ ।
  • नारदस्मृति :- (सम्पादक) ब्रजकिशोर स्वाईं, (प्रकाशक) चौखम्बा संस्कृत संस्थान , वाराणसी, पुनर्मुद्रण संस्करण, विक्रम सम्वत् २०६५ ।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र (पञ्चटीका सहित) :- (सम्पादक) आचार्य विश्वनाथशास्त्रिदातार, (प्रकाशक) सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, प्रथम संस्करण १९९१ ।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र (श्रीमूलाटीकासहित) :-  (सम्पादक) टी. गणपति शास्त्री,(प्रकाशक) राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान ,नई दिल्ली, २००६ ।
  • धर्मशास्त्र का इतिहास (भाग १-५) :- (सम्पादक) पी.वी.काणे, (अनुवादक) अर्जुन चौबे काश्यप, (प्रकाशक) हिन्दी समिति उतरप्रदेश, लखनऊ, प्रथम संस्करण १९७३-८० ।
  • हिन्दू विधि :- (सम्पादक) आर. के. अग्रवाल, (संशोधक) एस. के. सिंह, (प्रकाशक) सेन्ट्रल लॉ एजेन्सी,३०,डी/१, मोतीलालनेहरु रोड, इलाहाबाद,  प्रथम संस्करण २००४ ।
  • कमेन्ट्री ऑन सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम १८८२ :- (सम्पादक) शैलेन्द्र कुमार अवस्थी एवं सुधा अवस्थी, (प्रकाशक) ओरिएन्टल लॉ पब्लिकेशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण २००७ ।
  • कमेन्ट्री ऑन भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम :- (सम्पादक) शैलेन्द्र कुमार अवस्थी, (प्रकाशक) ओरिएन्टल लॉ पब्लिकेशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण २००८ ।

[1] हितोपदेश- १-१७३

[2] मेघदूत, उत्तरमेघ-४९

[3] बुद्धचरित ११-४३

[4] मृच्छकटिकम् १-१३

[5]  वि नानार्थैऽव सन्देहे हरणं हारमुच्यते।

नानासन्देहहरणाद् व्यवहार इति स्मृतः॥

[6] प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।

विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः॥  मनुस्मृति २-

[7] व्यवहारान्नृपः पश्येद्विद्वद्भिर्ब्राह्मणैः सह।

धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः॥  याज्ञवल्क्यस्मृति, व्यवहाराध्याय-१।

[8] “अभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञः प्रजापालनं परमो धर्मः। तच्च दुष्टनिग्रहमन्तरेण न संभवति। दुष्टपरिज्ञानं च न व्यवहारदर्शनमन्तरेण संभवति। तद्व्यवहारदर्शनमहरहः कर्तव्यम्”। मिताक्षरा- २-१।

[9]  रागाल्लोभाद्भयाद्वाऽपि स्मृत्यपेतादिकारिणः।

सभ्याः पृथक्पृथग्दण्ड्या विवादाद्विगुणं दमम्॥ याज्ञ. व्यव. ४।

[10] याज्ञ. व्यव. – ५ ।

[11] यथा कश्चिदिदं क्षेत्रादि मदीयमिति………..। मिताक्षरा २-१।

[12] मिताक्षरा २-८ में उद्धृत।

[13] “प्रत्यर्थिनोऽग्रतो लेख्यं यथावेदितमर्थिना।

समामासतदर्धाहर्नामजात्यादिचिह्नितम्”॥  याज्ञ. व्यव.-६।

[14] देशश्चैव तथा स्थानं सन्निवेशस्तथैव च।

जातिः सञ्ज्ञाऽधिवासश्च प्रमाणं क्षेत्रनाम च॥

पितृपैतामहं चैव पूर्वराजानुकीर्तनम्………॥  मिताक्षरा २-६

[15] अप्रसिद्धम् – मदीयं शशविषाणं गृहीत्वा न प्रयच्छति, इत्यादि – मिताक्षरा २-६

[16] निराबाधम्- अस्मद्गृहदीपप्रकाशेनायं स्वगृहे व्यवहरतीत्यादि  – मिताक्षरा २-६

[17] निरर्थम् – अभिधेयरहितं कचटतपगजडदबेत्यादि – ,,,,,,

[18] निष्प्रयोजनम् – अयं देवदत्तोऽस्मद्गृहसन्निधौ सुस्वरमधीत इत्यादि – ,,,,

[19] असाध्यम् – अहं देवदत्तेन सभ्रूभङ्गमुपहसित इत्यादि – ,,,,,

[20] विरुद्धम् – मूकेन शप्त इत्यादि – ,,,,,,,

[21]  अप्रसिद्धं निराबाधं निरर्थं निष्प्रयोजनम्।

असाध्यं वा विरुद्धं वा पक्षाभासं विवर्जयेत्॥  मिताक्षरा २-६

[22] श्रुतार्थस्योत्तरं लेख्यं पूर्वावेदकसन्निधौ।   याज्ञ. व्यव. ७।

[23] पक्षस्य व्यापकं सारमसंदिग्धमनाकुलम्।

अव्यख्यागम्यमित्येतदुत्तरं तद्विदो विदुः॥  मिताक्षरा – ७।

[24] सत्यं मिथ्योत्तरं चैव प्रत्यवस्कन्दनं तथा।

पूर्वन्यायविधिश्चैवमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम्॥ मिताक्षरा में उद्धृत-७

[25] “साध्यस्य सत्यवचनं प्रतिपत्तिरुदाहृता” इति।  – वहीं,, ,,

[26] अभियुक्तोऽभियोगस्य यदि कुर्यादपह्नवम्।

मिथ्या तत्तु विजानीयादुत्तरं व्यवहारतः॥   -वहीं ,, ,,

[27] वहीं,,,,,,,,

[28] “अर्थिना लिखितो योऽर्थः प्रत्यर्थी यदि तं तथा।

प्रपद्य कारणं ब्रूयात्प्रत्यवस्कन्दनं स्मृतम्”॥   – वहीं  ,,,,

[29] ततोऽर्थी लेखयेत्सद्यः प्रतिज्ञातार्थ साधनम्॥   याज्ञ. व्यव.- ७।

[30] तत्सिद्धौ सिद्धिमाप्नोति विपरीतमतोऽन्यथा।  – वहीं – ८।

[31] चतुष्पाद्व्यवहारोऽयं विवादेषूपदर्शितः॥ – वहीं ,,,।

[32] ऋग्वेद….

[33] ऋग्वेद, १०-३४-१०।

[34] नारदस्मृति १-१-४ ।

[35] नारदस्मृति १-१०२-४ ।

[36]  नारदस्मृति १-१०८

[37] मनुस्मृति…..

[38] मनस्मृति….

[39]मनस्मृति….

[40]मनस्मृति….

[41] नारदस्मृति १-१२४,१२५।

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