श्रीमध्वाचार्य के द्वैतवेदान्त में मोक्ष की अवधारणा No ratings yet.

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पवित्रा अग्रवाल,

पीएच.डी.

जवाहरलालनेहरुविश्वविद्यालय, नई दिल्ली,

pavitracss@gmail.com

धर्मों की प्रकृति है कि वे ऐहिक और आमुष्मिक सुखों का आश्वासन देते हैं । वैष्णव धर्म इसका अपवाद नहीं है । अन्य धार्मिक सम्प्रदायों की भांति ही विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायों ने अपने सिद्धान्तों के अनुकूल मोक्ष का प्रतिपादन किया है । चूंकि वैष्णव धर्म विष्णु को अन्तिम सत्य के रूप में स्थापित करता है तथा उसे सुख एवं ज्ञान का मूल बताता है अतः वैष्ण्वों ने मोक्ष को विष्णु के साहचर्य के रूप में प्रतिपादित किया । इस स्थान को वैकुण्ठ कहा गया ।

जीव का स्वरूप :-

मध्वदर्शन में जीव परमात्मा से भिन्न है, तथा समस्त जीव परस्पर एक दूसरे से भिन्न है ।[1] परमाणु प्रदेश में रहने वाले जीव अनन्त है ।[2] समस्त जीवो का आधार परमात्मा है । परमात्मा ही जीवों की उन्के पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार कर्म करने के लिए प्रवृत्त करता है।[3] मध्वाचार्य का कहना है कि जीव की स्वप्नकल्पना भी ईश्वर की इच्छा पर ही आधारित है ।[4] जीव अणुपरिमाण होने के कारण सर्वव्यापक ब्रह्म की सत्ता से पृथक् है । यद्यपि जीव पूर्वकृतकर्मानुसार अज्ञान, मोह, दुःख एवं भयादि दोषों से पूर्ण हैं, तथापि उसका स्वभाव आनन्द ही है । मुक्तावस्था में जीव अपने मूलस्वभाव, आनन्दस्वरूप को प्राप्त हो जाता है ।

मध्वाचार्य ईश्वर और जीव के मध्य पूर्णतया भेद मानते हैं उनके अनुसार पांच प्रकार के भेद संसार में अनादि काल से चले आ रहे हैं जो सत्य है और कभी समाप्त होने वाले नहीं है । ये भेद हैं –

  1. जीव और ईश्वर में भेद
  2. जड़ और ईश्वर में भेद
  3. जीवों में परस्पर भेद
  4. जड़ और जीवों में भेद
  5. जडो में परस्पर भेद ।[5]

वैष्णव आचार्यों में मध्वाचार्य एकमात्र ऐसे आचार्य हैं, जो जीव को ईश्वर से पूर्णतया भिन्न मानते हैं, नहीं तो शेष आचार्य विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत तथा द्वैताद्वैत के रूप में कहीं न कहीं अद्वैत को अवश्य स्वीकार करते हैं । मध्वाचार्य जीव और ब्रह्म में भेद मानते हुए भी जीव की सत्ता को ईश्वर (ब्रह्म) से परतन्त्र मानते हैं । उनके अनुसार, तत्त्व के दो रूप होते हैं एक स्वतन्त्र तथा दूसरा परतन्त्र ।[6] ईश्वर ही एकमात्र स्वतन्त्र है, जीवादि अन्य सत्ताएं उन पर आश्रित हैं अर्थात् परतन्त्र हैं ।

द्वैतदर्शन में जीवों के तीन वर्ग बतलाये गए हैं – मुक्तियोग्य, नित्यसंसारी एवं तमोयोग्य । ये तीनों प्रकार के जीव सदैव परस्पर तथा परमात्मा से भिन्न है । मुक्तियोग्य जीवों के अन्तर्गत देव, पितृम् चक्रवर्ती एवं उत्तम रूप से पांच प्रकार के जीव आते हैं । नित्यसंसारी वे जीव हैं जो महासुखदुःखादि का भोग करते हुए अपने-अपने कर्मों के अनुसार स्वर्ग, नरक एवं भूलोक में विचरण करते हैं । तमोयोग्य जीवों में दैत्य, राक्षस, पिशाच तथा अन्य अधम कोटि के जीव आते हैं । इन जीवों में परस्पर भेद के अतिरिक्त उनके अज्ञान रागादि दोषों के कारण परस्पर तारतम्य भी होता है । मुक्तजीवों में भी आनन्द का तारतम्य होता है ।[7] द्वैतदर्शन में जीव के कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं अज्ञत्व को पूर्णरूपेण पारमार्थिक एवं वास्तविक माना गया है । जिस प्रकार जीव की सत्ता परतन्त्र है, उसी प्रकार उसका कर्तृत्व भी परतन्त्र है । जीव अपनी सत्ता तथा कर्तृत्व के लिए सदैव ईश्वर पर आश्रित रहता है । इसलिए द्वैतदार्शनिक ईश्वर को ही एकमात्र कर्ता मानते हैं क्योंकि जीव सदैव ईश्वर की स्वतन्त्र सत्ता एवं स्वतन्त्र कर्तृत्व के परतन्त्र है ।

बन्धन का स्वरूप –

द्वैतमत में जीव का अनादिकाल से प्रकृति द्वारा बद्ध तथा संसारी होना एवं अज्ञान, दुःख, भय, मोहादि से युक्त होना लक्षण माना गया है ।[8] द्वैतदर्शन के अनुसार चैतन्य ही जीव का वास्तविक स्वरूप है तथा ज्ञान रूप में यह जीव का स्वाभाविक गुण है । वे आनन्द को भी जीव का स्वरूप मानते हैं, यद्यपि उसका यह स्वरूप ईश्वर की माया से उत्पन्न अविद्या के आवरण से आच्छादित रहता है तथा सांसारिक अवस्था में व्यक्त नहीं होता है । जीव तथा चैतन्य एवं आनन्द की अविद्या का आवरण हटने पर ब्रह्म के चैतन्य एवं आनन्द से समानता तो होती है तथापि जीव के ये गुण सदैव जीव में ही विद्यमान होते हैं । अद्वैत-वेदान्तियों के समान द्वैतदार्शनिक जीव को ब्रह्म से अभिन्न नहीं मानते, अतएव दोनों चैतन्य एवम् आनन्द की एकाकारता का प्रश्न ही नहीं उठता ।[9] उनके अनुसार जीव यदि मुक्त हो जाए तब भी विरुद्धधर्मता यह है कि ईश्वर में स्वतन्त्रता और पूर्णता है, जबकि जीव में अल्पता (अणुता) और परतन्त्रता है ।[10]

द्वैतदर्शन में जीव के साकारता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है । इसके अनुसार, जीव की अपनी एक नित्य देह एवं आकार होता है । चार्वाकों के भौतिकवाद में जीव की देह को चतुर्भूतजन्य एवं विनाशशील स्थापित किया जाता है, जबकि द्वैतदार्शनिक इसे अप्राकृतिक, अतीन्द्रिय, चेतन एवं आनन्दस्वरूप तथा पूर्णरूपेण नित्य और अविनाशी स्वीकार करते हैं।[11]

मध्वाचार्य के अनुसार जीव की उत्पत्ति का तात्पर्य केवल इतना ही है कि जीवगत भेदों एवं गुणों की उपाधि के कारण अभिव्यक्ति होती है । जिसे श्रुतियों में जीव की उत्पत्ति कहकर वर्णन किया गया है । शांकरवेदान्त की तरह द्वैतदार्शनिक भी जीव की उत्पत्ति एवं अशंत्व की व्याख्या उसे उपाधि में ब्रह्म के प्रतिबिम्ब रूप मानकर ही करते हैं । परन्तु उनके उपाधि एवं प्रतिबिम्बवाद का शंकराचार्य से वैषम्य है । द्वैतमत में उपाधि का मुख्य कार्य नवीन रूपों तथा आभासों का सृजन करना नहीं है, उसका कार्य तो केवल सत्य वस्तुओं एवं उनके भेदों को अभिव्यक्त करना है ।[12] वे उत्पत्ति का अर्थ भी मात्र इतना ही मानते हैं कि किसी दूसरी वस्तु के अधीन होकर किसी वस्तु में जो विशेषता प्राप्त होती है, उसे उत्पत्ति कहते हैं ।[13] द्वैतदार्शनिक जीवात्मा की दो प्रकार की उपाधियों का वर्णन करते हैं १. स्वरूपोपाधि और २. बाह्योपाधि । बाह्योपाधि के अन्तर्गत जीव के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर की गणना की जाती है, जो मोक्ष के समय पूर्णतया नष्ट हो जाती है । लेकिन स्वरूपोपाधि का स्वरूप बाह्योपाधि से भिन्न है । इस उपाधि का जीव के साथ सदैव अभेद रहता है तथा वह जीव से कभी वियुक्त नहीं होती ।[14]

बन्धन से मोक्ष के साधन

द्वैतदर्शन के अनुसार, न तो ज्ञान और न कर्म ही मोक्षावस्था की प्राप्ति में अन्तिम साधन है । उनके मतानुसार एकमात्र ईश्वर प्रसाद अथवा परमेश्वर की कृपा मोक्ष का अन्तिम साधन है । चूंकि इस दर्शन के अनुसार जीव का बन्ध सत्य है, अतएव इस सत्य बन्ध की केवल ज्ञान के द्वारा निवृत्ति नहीं हो सकती । ज्ञान तो किसी मिथ्या आभास अथवा विपर्यय की ही निवृत्ति करने में सक्षम हो सकता है, सत्यस्थिति का निवारण करना उसकी योग्यता के परे है ।[15] यद्यपि इस सिद्धान्त में ज्ञान को मोक्ष के अन्तिम साधन के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है, तथापि मोक्ष की सम्प्राप्ति कराने वाले विभिन्न साधनों के अन्तर्गत ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है । द्वैतमतानुसार जब ईश्वर विषयक ज्ञान एवं भक्ति के द्वारा भक्त इस स्थिति को प्राप्त कर लेता है कि उसे ईश्वर प्रसाद उपलब्ध हो सके तब वह ईश्वर की अपार करुणा के फलस्वरूप उनकी कृपा को प्राप्त करके उनकी वैष्णवी मायाजन्य बन्धन से मुक्त हो जाता है । मध्वाचार्य ने मोक्ष के साधन के रूप में भक्ति को सर्वोत्कृष्ट स्थान प्रदान किया है । उनका मानना है कि विष्णु की कृपा के बिना मोक्ष नहीं मिलता है । मोक्षश्च विष्णुप्रसादमन्तरेण लभ्यते ।[16] इसी प्रकार मध्वदर्शन की यह विशेष मान्यता है कि स्वर्गलोक, जनलोक एवं मुक्ति की प्राप्ति ज्ञानियों को कराने में ईश्वर के अधम, मध्यम, एवं उच्च कोटि के प्रसाद ही एकमात्र अन्तिम साधन हैं । मोक्ष की प्राप्ति में ईश्वर प्रसाद ही एकमात्र अन्तिम कारण माना जाता है ।[17] अन्य साधनों के रूप में द्वैतदार्शनिकों ने निम्नलिखित बीस तत्त्वों का उल्लेख किया है – इहामुत्रफलभोगविरागः, शमदमसम्पत्तिः, अध्ययनम्, शरणागतिः, गुरुकुलवासः, श्रवणम्, मननम्, परमात्मभक्तिः, स्वाधमेषु सत्सुदया, स्वसमयेषु स्वात्मवत्स्नेहः, उत्तमेषु भक्तिः, निवृत्तिकर्मानुष्ठानम्, निषिद्धसंत्यागः, सर्वसमर्पणम्, तारतम्यपरिज्ञानम्, प्रकृतिपुरुषविवेकज्ञानम्, अयोग्यनिन्दा, पञ्चभेदः, उपासनाः, गुरुभक्तिः ।[18]

द्वैतसम्प्रदाय में जीवात्माएं सजीव शरीर की चेतना की केन्द्र हैं, अर्थात् शरीरों में जो चेतना दिखाई देती है वह इन चैतन्य आत्माओं के कारण ही दिखाई देती है । इन जीवों की मध्वदर्शन में अनगिनत संख्या मानी गयी है तथा ये जीव अज्ञान, दुःख, भय, मोहादि से युक्त होते हैं ।[19] प्रत्येक जीव का यहां तक कि ब्रह्मा का भी अपना एक पाञ्चभौतिक शरीर होता है । अपने इस शरीर तथा अविद्या, मोह, इच्छादि दोषों के कारण जीव को सांसारिक सुख-दुःख का भोग होता है । मध्वदर्शन में तीन प्रकार के जीवों का वर्णन है । प्रथम प्रकार के मुक्तियोग्य जीव जिसके अन्तर्गत समस्त देवता, ऋषिगण, चक्रवर्ती राजागण एवं आध्यात्मिक रूप से उन्नत मनुष्यों की गणना होती है, जो अपने सुकर्मों के परिणामस्वरूप वर्तमान शरीर में ही मुक्त होने की योग्यता रखते हैं । दूसरे नित्यसंसारी जीव वे हैं, जिनका नित्यरूप से संसार में परिभ्रमण अर्थात् आवागमन होता रहता है । इस परिभ्रमण के फलस्वरूप वे सदैव संसार के सुख-दुःख से प्रभावित होते रहते हैं ।[20] वे अज्ञान-कामादि दोषों से युक्त होने के कारण अपने कर्मों के फलस्वरूप बार-बार पृथ्वी पर जन्म लेते रहते हैं, परन्तु ये नित्यसंसारी जीव भी भगवदुपासना करके मुक्तियोग्य जीवों की कोटि को प्राप्त कर सकते हैं और तदुपरान्त भगवत्कृपा से उनकी भी मुक्ति हो सकती है । तीसरे वर्ग के जीव अनादिकाल से निबिड़ अन्धकार अथवा अज्ञान में डूबे हुए हैं । यद्यपि इनके तमस् की निवृत्ति अत्यन्त कठिन है, फिर भी ये श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उच्च योनियों को प्राप्त कर सकते हैं ।

मध्वदर्शन में जीवात्मा अपने कर्मों के द्वारा अपने आगामी जीवन का निर्धारक स्वयं माना गया है । मध्वदर्शन कर्म की कल्पना नैतिक स्तर पर करता है, जिससे प्रत्येक कर्म किसी पाप अथवा पुण्य फल की उत्पत्ति करता है । कर्म के अभाव में पुण्य अथवा पाप किसी प्रकार के भी फल की प्राप्ति नहीं हो सकती । इसीलिए पदार्थसंग्रह में कर्म का सामान्य लक्षण बतलाते हुए कहा गया है कि कर्म साक्षात् अथवा परम्परा रूप से पाप-पुण्य का असाधारण कारण है ।[21] मध्वों के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं १. विहित कर्म, २. निषिद्ध कर्म, ३. उदासीन कर्म । इनमें से विहित कर्म वे हैं जिनको करने की आज्ञा शास्त्रों में प्रदान की गई है । ये कर्म दो प्रकार के हैं- काम्य तथा अकाम्य । काम्य कर्मों के द्वारा जीव पुण्य अर्जित कर लौकिक भोग एवं श्रेष्ठ योनियों में पुनर्जन्म प्राप्त करता है, जबकि अकाम्य कर्मफल की इच्छारहित केवल ईश्वर की शरणागति के लिए किये जाते है, जिससे जीव को मुक्तिलाभ प्राप्त होता है । मध्वों के अनुसार ये समस्त काम्य एवं अकाम्य कर्म ब्रह्मादि सभी जीवों के होते हैं ।[22] विहित कर्मों के विपरीत निषिद्ध क्र्म वे होते हैं जिनको न करने की आज्ञा शास्त्रों में दी गई है । शास्त्रनिषिद्ध होने के कारण ये कर्म यदि किये गये तो उनसे निश्चय ही पापरूप फल की प्राप्ति होगी ।[23] उदासीन कर्मों की कोटि में उन सभी कर्मों की गणना है, जो न तो विहित हैं और न ही निषिद्ध हैं । इस प्रकार मध्वदर्शन में कर्म को ही जीव के भाग्य एवं पुनर्जन्म का निर्धारक माना गया है ।

मोक्ष का स्वरूप-

मध्वदर्शन में मोक्ष के स्वरूप को केवल दुःख की निवृत्ति रूप न मानते हुए, वैष्णव परम्परा के अनुसार आनन्दमय एवं भावात्मक रूप से चिन्तन किया गया है । विष्णु को सभी गुणों से परिपूर्ण जानकर पुरुष संसार से मुक्त हो जाता है । दुःख से रहित आनन्द का भोग करते हुए नित्य रूप से वह परमात्मा के पास सुख-भोग करता है । ‘विष्णुं सर्वगुणैः पूर्णं ज्ञात्वा संसारवर्जितः । निर्दुःखानन्दभुङनित्य तत्समीपे स मोदते ।’[24] मध्वदर्शन के अनुसार मोक्षावस्था में किसी नये गुण का आविर्भाव नहीं होता है, वरन् आनन्दादि जीव के स्वाभाविक गुण ही प्रकट होते हैं । ब्रह्मसूत्र के पुंस्त्वाधिकरण में उल्लिखित सूत्रों के मध्वभाष्य के आधार पर तथा आनन्दादिरूपत्वा आदि श्रुतियों के अनुसार जयतीर्थ ने यह प्रतिपादित किया है कि आनन्द जीव के वास्तविक स्वरूप की विशेषता है, जिस पर अविद्या के कारण एक प्रकार का आवरण पड़ा रहता है तथा अविद्यारूपी यह आवरण अन्त में मोक्ष के समय ईश्वर प्रसाद से ही निवृत होता है ।

मध्वदर्शन की अन्य वैष्णव सिद्धान्तों के समान यह धारणा है कि मुक्तावस्था में जीवात्मा के आनन्द की पूर्ण अभिव्यक्ति तो होती है, लेकिन उसका यह आनन्द बहुत कुछ परमात्मा के आनन्द के समान होते हुए भी उसके आनन्द से भिन्न होता है ।[25] मध्वों की मोक्ष-स्वरूप व्याख्या की एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस सिद्धान्त में मोक्षावस्था में भी सोपान परम्परा से भिन्न-भिन्न स्तर स्वीकार किये गये हैं । युक्तमल्लिका में स्तर भेद के इस सिद्धान्त का प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है – ‘चूंकि हमें देवताओं, ऋषियों आदि की साधनाओं में भेद की प्रतीति होती है, अत एव हमें उनके फलों में भी भेद की मान्यता स्वीकार करनी चाहिए । जिसका तात्पर्य यह है कि मुक्तजीवों में भी उच्च-नीच अर्थात् तारतम्य के व्यवस्था होती है ।[26] मध्वाचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में लिखा है कि क्रमयोग से ज्ञान के आधिक्य के द्वारा ईश्वर के सामीप्य को प्राप्त करने वाले जीव सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सायुज्य नामक योग को प्राप्त करते हैं ।[27] इस तारत्म्य मुक्ति में मोक्ष की सर्वोच्च अवस्था सायुज्य मुक्ति है । मध्व के अनुसार, सायुज्य मुक्ति की अवस्था में भी ईश्वर और जीव का भेद बना रहता है । इस अवस्था में जीव और ब्रह्म का योग उसी प्रकार होता है, जैसे दूध एवं जल के मिश्रण में दूध और जल का योग होता है । मध्वाचार्य की मोक्षावस्था में इस तारतम्य की मान्यता से यह तथ्य स्पष्ट है कि वे मुक्ति की अवस्था में भी जीव के व्यक्तित्व के अस्तित्व के समर्थक हैं ।

मध्वाचार्य के दर्शन में भी अन्य वैष्णव सिद्धान्तों के समान विष्णु के एक अतीन्द्रिय एवं पारलौकिक स्थान की कल्पना की गई है, जिसे वैकुण्ठ कहते हैं । वे सभी जीव जो परमेश्वर प्रसाद से अपने-अपने कर्मबन्धनों से मुक्त हो गये हैं, इस वैकुण्ठ नामक् ईश्वरलोक में प्रवेश करते हैं जहां से उनकी संसार में पुनरावृति नहीं होती । वहां वे जीव के समान आनन्द का भोग करते हैं, परन्तु भोग की इस धारणा से यह संशय करना कि भोग के उपरान्त जीवों का पुनः संसार में पुनरावर्तन होगा, एक महान् भूल होगी क्योंकि मुक्त जीवों का यह भोग अत्यन्त दिव्य एवं पारलौकिक होता है । मुक्तजीवों के इन भोगों के लिए किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं होती । वे अपनी चिन्मात्रस्वरूपिणी देह के द्वारा केवल संकल्पमात्र से परमात्मभुक्त भोगों का भोग करने में समर्थ होते हैं । अत एव मध्वाचार्य की यह मान्यता है कि जीव के बन्धन का कारण उसका भोग नहीं होता, वरन् उसके भोग्य वस्तु का भौतिकत्व होता है ।[28]

मुक्तजीव ईश्वर की उपासना स्वेच्छा से बिना किसी कामना के सदैव करते रहते हैं, उपासना मात्र ही उनकी इच्छा होती है । यही सांसारिक जीव एवं मुक्तजीव के उपासना का भेद है ।

[1] परमात्मने सततमेकरूपिणे दशरूपिणे शतसहस्ररूपिणे । अविकारिणे स्फुटमनन्तरूपिणे सुखचित्समस्ततनवे नमो नमः ॥

सुमध्वविजय८/४१ पृ. ३९३

[2] परमाणुप्रदेशेष्वनन्ताः प्राणिराशयः । मध्वाचार्य, तत्त्वनिर्णय ।

[3] मध्वभाष्य, ब्रह्मसूत्र, २/३/४१, २/३/४२

[4] मध्वभाष्य ३/२/३/,५

[5] जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा । जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवाभिदा तथा ॥ मध्वाचार्य, सर्वदर्शन संग्रह ५/१७

[6] स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिश्ःयते । तत्त्वसंख्यान पृ. १,

[7] सर्वेऽपि जीवाः परस्परं परमात्मना च भिन्ना । संसारे मुक्तौ च तारत्म्योपेताः ॥पदार्थसंग्रह पृ. ८५-८६ (उद्धृत मध्वदर्शनपृ९९)

[8] अज्ञानादिदोढयुक्ताः संसारिणो जीवाः असंख्यकाः । पदार्थ संग्रह, जीव-प्रकरण. (उद्धृत मध्वदर्शन पॄ. ९८)

[9] मध्वदर्शन, नारायण. के, पृ १७६

[10] न स्वरूपैकता तस्य युक्तस्यापि विरूपतः । स्वातन्त्र्यपूर्णस्तेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपतः ॥ मध्वाचार्य, सर्वदर्शनसंग्रह ५/३३

[11] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ. १७८

[12] विद्यमानस्य भेदस्य ज्ञापको नैव कारकः । उपाधिर्दृष्टपूर्वो हि ॥उपाधि खण्डन पृ.७ (उद्धृत मध्वदर्शनपृ१९१)

[13] पराधीनविशेषलाभस्योत्पत्तेः । तत्त्वप्रकाशिका पृ. ११५ (उद्धृत मध्वदर्शनपृ१७९)

[14] मध्वदर्शन, नारायण. के. पृ. १८०

[15] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ२१०

[16] माधवाचार्य, सर्वदर्शनसंग्रह. पृ. २३३

[17] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ२११

[18] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ२१२-१३

[19] अज्ञानादि दोषयुक्ताः संसारिणो जीवाः असंख्यकाः । पदार्थसंग्रह, जीव प्रकरण पृ. ७५-७६ , (उद्धृत मध्वदर्शनपृ९८)

[20] नित्यं सुखदुःखमिश्राः नित्यसंसारिणः । पदार्थसंग्रह पृ ८२ (उद्धृत मध्वदर्शनपृ९९)

[21] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ१२०

[22] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ१२१

[23] मध्वदर्शन, नारायण, के. पृ१२१

[24] माध्वाचार्य, सर्वदर्शनसंग्रह. ५/४१ पृ. २३८

[25] के.नारायण, मध्वदर्शन, पृ. २०४

[26] युक्तमल्लिका फल सौरभ २५१-५

[27] ब्रह्मसूत्र ४/४/१९ पर मध्वभाष्य ।

[28] के.नारायण, मध्वदर्शन, पृ. २०८

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