संस्कृत सनाद्यन्त क्रियापदों की संगणकीय पहचान एवं विश्लेषण : सामान्य अध्ययन 4.6/5 (5)

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सुभाष चन्द्र

शोध निर्देशक, सहायक आचार्य

संगणकीय भाषाविज्ञान, संस्कृत विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

ईमेल: subhash.jnu@gmail.com


भूपेन्द्र कुमार
शोध छात्र
संस्कृत विभाग
 दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

ईमेल: bhupendrakmr87@gmail.com


संक्षेप (Abstract)

संस्कृत भाषा में नूतन शब्द रचने की अद्भुद् क्षमता है जिसके कारण इस भाषा में शब्दों का अकूत भण्डार है इसका मुख्य कारण है व्याकरण । संस्कृत व्याकरण या किसी अन्य भाषा के व्याकरण में क्रियापद की मुख्य भूमिका होती है । संस्कृत भाषा में मुख्य रूप से दो प्रकार की क्रियाएँ प्राप्त होती हैं । प्रथम जिन्हें पाणिनि ने धातुपाठ में उल्लिखित किया है उन्हें प्राथमिक क्रिया (Primary Verb forms) कहते हैं । द्वितीय वे जिन्हें गौण क्रिया (Secondary Verb forms) कहा जाता है जो धातु या सुबन्त से सनादि बारह प्रत्ययों के योग से विभिन्न नये अर्थों में प्रयोग के लिये बनती हैं । प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य इन्हीं गौण क्रियापदों की संगणकीय अभिज्ञान एवं विश्लेषण के लिये एक वेब आधारित सिस्टम का विकास करना है । जिसके माध्यम से संस्कृत भाषा में प्रयुक्त गौण क्रियाओं की पहचान एवं विश्लेषण किया जा सकें । वेदान्त साहित्य में भी इस प्रकार की क्रियापदों के खूब प्रयोग हुये हैं । अतः वेदान्त ग्रन्थों में इस प्रकार के पदों के अर्थ निर्धारण हेतु पाठक के लिये यह सिस्टम सहायक सिद्ध होगा । यह सिस्टम ऑनलाइन होगा जिसका किसी समय कही से भी इंटनेट के माध्यम से प्रयोग किया जा सकेगा  ।

 

खोजशब्द (Key Words)        : सनाद्यन्त पद, Secondary Verb, Sanskrit Verbal Morphology, Rule based and Example Based Approach, सनाद्यन्त पदों का संगणकीय विश्लेषण, व्याकरणिक विश्लेषण आदि ।

 

  1. पृष्ठभूमि (Background)

वैदिक साहित्य से लेकर लौकिक साहित्य तक सभी ग्रन्थ तत्कालीन वैज्ञानिक अवधारणाओं से ओत-प्रोत हैं । इन सभी गन्थों को समझने के लिये व्याकरण का ज्ञान होना अत्यावश्यक है । संस्कृत के व्याकरणग्रन्थ पाणिनीय अष्टाध्यायी में शब्द निर्माण प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त होता है । पाणिनि ने लगभग 4000 सूत्रों के माध्यम से संस्कृत शब्दों की निर्माण प्रक्रिया को बहुत ही सहज और सरल तरीके से प्रस्तुत किया है, जिसमें समग्र लौकिक संस्कृत साहित्य समाहित हो जाता है (Chandra & Jha, 2011) । पाणिनि के अनुसार पद मूलतः दो प्रकार के होते हैं सुबन्त एवं तिङ्न्त (Chandra & Jha, 2011) । ऐसे प्रातिपदिक शब्द जिनसे सुऔजस् आदि 21 प्रत्यय  लगे होते हैं उन्हें सुबन्त कहा जाता है (Sharma, 2003; Chandra & Jha, 2011; Mishra & Jha, 2004; Chandra, 2006 and Chandra, 2012) । तथा जिनके अन्त में तिङ् आदि 18 प्रत्यय  लगे होते हैं उन्हें तिङन्त कहा जाता है (Sharma, 2003; Chandra & Jha, 2011; Mishra & Jha, 2004; Chandra, 2006 and Chandra, 2012) । पुनः क्रियापदों को दो प्रकार से विभाजित किया गया है । प्रथम लगभग 2000 धातुएं जिन्हें रूप संरचना के अनुसार जो दस गणों में विभाजित हैं तथा जिन्हें पाणिनि ने धातुपाठ में उल्लिखित किया है उन्हें प्राथमिक क्रिया (Primary Verb forms) कहते हैं । ये धातुएं मुख्य रूप से तीन प्रकार की हो सकती हैं आत्मनेपदीय, परस्मैपदीय एवं उभयपदीय (जिनके रूप आत्मनेपद तथा परस्मैपद दोनों में बनतें हैं) । द्वितीय प्रकार के क्रियापद वे हैं जो धातु या सुबन्त से सनादि बारह प्रत्ययों  के योग से विभिन्न नये (धातुपाठ में उल्लिखित धातुओं से भिन्न) अर्थों में प्रयोग के लिये बनतें हैं उन्हें गौण क्रिया (Secondary Verb forms) कहा जाता है (Sharma, 2003; Chandra & Jha, 2011; Mishra & Jha, 2004; Chandra, 2006 and Chandra, 2012) । सनादि बारह प्रत्ययों में से कुछ तो सभी धातुओं के बाद, कुछ चुनिन्दा धातुओं के बाद तथा कुछ सुबन्तों से बाद लगतें हैं (Sharma, 2003) । सनादि प्रत्यय लगने के बाद नई धातु बन जाती है तथा अर्थ पूरी तरह से परिवर्तित हो जाता है । इनकी रूप प्रक्रिया भी ऊपर बताये 18 तिङ् प्रत्ययों के योग से ही निष्पन्न होती है । प्रत्येक धातु के रूप दस लकारों में चलते हैं । बिना इनके विशेष ज्ञान के अर्थ निर्धारण करना भी मुश्किल होता है (Sharma, 2003 and जिज्ञासु, 1998) । सनादि बारह प्रत्यय इस प्रकार हैं– सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यङ्, क्यष्, क्विप्, यङ्, ईयङ्, यक्, आय, णिच्, णिङ् । यहाँ क्विप् प्रत्यय वार्तिक (कात्यायन) द्वारा विहित है और अन्य ग्यारह प्रत्यय सूत्रों (पाणिनि) से विहित है । इन बारह प्रत्ययों में से सन्, यङ्, ईयङ्, यक्, आय, क्विप्, तथा आदि 6 प्रत्यय अलग-अलग अर्थों में धातुओं से लगते हैं तथा णिच् और णिङ् प्रत्यय अलग-अलग अर्थों में धातु और सुबन्त दोनों से लगते हैं । क्यच्, काम्यच्, क्यङ् तथा क्यष् आदि 4 प्रत्यय विभिन्न अर्थों में अन्यान्य सुबन्त से ही लगते हैं । अद्यावधि सनाद्यन्त प्रयोगों पर कोई संतोषजनक कार्य नही हुआ है जहां पर ऐसे रूप प्राप्त हों । वैदिक साहित्य हो अथवा लैकिक साहित्य सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य इस प्रकार के क्रियापदों से परिपूर्ण हैं, वेदान्त ग्रन्थ भी इनसे अछूते नही हैं । वेदान्त ग्रन्थों के अनेक मुख्य ग्रन्थों एवं प्रकरण ग्रन्थों में इन सनाद्यन्त रुपों के प्रयोग प्राप्त होते हैं । वेदान्त ग्रन्थों में इनके प्रयोग यथा ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ ‘जिज्ञासाधिकरणम्’ जिज्ञासितधर्ममीमांसाशास्त्रेण, मुमुक्षुणाsनन्ताचिन्त्यस्वाभाविकस्वरूपगुणाशक्त्यादिभिर्बृहत्तमो ’ इत्यादि शब्द भी सन्प्रत्ययान्त ही हैं ।

इच्छा अर्थ द्योतित करने के लिये धातुमात्र से सन् प्रत्यय का योग किया जाता है । सन् के योग के पश्चात् शब्द एक नई धातु बन जाती है और इसके बाद सारी प्रक्रिया धातुरूपों जैसी बनने लगती है । यथा राज्+सन्=रिराजिष, रिराजिष+तिप्= रिराजिषति, जन्+सन्=जिज्ञास, जिज्ञास+अ+आ= जिज्ञासा, मान्+सन्= मीमांस, मीमांस+अ+आ= मीमांसा आदि । कुछ सीमित धातुओं से अन्यार्थ में भी सन् देखा जाता है यथा-जुगुप्सते इत्यादि । सन् प्रत्यय लगने से कुछ विशेष कार्य होते है जैसे सन् प्रत्यय परे रहते धात्वावयव को द्वित्व ‘हा+हा+सन् = जिहिष । तत्पश्चात अभ्यास कार्य यथा-वर्ग परिवर्तन, वर्ण परिवर्तन, धातु के द्वित्व हुए इक अवयव का लोप, स्वर परिवर्तन- दीर्घ को ह्रस्व, ह्रस्व को दीर्घ, अकार को इकार, इडागम, धातुविकार, इत्यादि कार्य होते हैं । ये सभी कार्य पाणिनि के सूत्रों के अनुसार कार्य करते है । यथा- जिजीविषेत्[1] । परन्तु वैदिक ग्रन्थों में ये सूत्र प्रत्येक स्थान पर कार्य नहीं भी करते है जिसके लिये पाणिनि ने अपने सूत्रों में ‘व्यत्यय’ का आश्रय लिया है । यथा- यज् धातु से लोक में ‘यियक्षति’ रूप बनता है तथा नश् धातु से ‘निनक्षति’ रूप बनता है तो ऋग्वेद में ‘इयक्षति, इनक्षत्’ रूप प्राप्त होते हैं । अर्थात् यहा पर क्रमशः यकार तथा नकार का लोप हुआ है जोकि पाणिनि के मतानुसार नही होना चाहिये था । कुछ विद्वानों का मत है कि वैदिक संहिताओं में लगभग 60 धातुओं से बने सन्नतरूप उपलब्ध होते हैं और ब्राह्मणों में 30 धातुओं से बने सन्नतरूप रूप प्राप्त होते हैं (रामगोपाल, 1965; Macdonall, 1910 ) । स्वर दृष्टि से देखें तो सन्नन्त रूप ‘इन॑क्षतः’ आदि अक्षर उदात्त रहता है परन्तु रूपों में अपवाद भी देखने को मिलते हैं यथा-वाजसनेयी संहिता (40/2) में’  जि॒जि॒वि॒षेत्, शतपथ ब्राह्मण में ति॒ष्ठासे॑त् आदि रूप देखने को मिलते हैं इन स्वरपरिवर्तनों के कारण अर्थ परिवर्तन भी देखा जाता है परन्तु पाश्चात्य विद्वान् ह्विटने के अनुसार ‘इन्हे प्रायः भूल माना जा सकता है[2] । वैसे तो संस्कृत भाषा में शब्दों का अथाह समुद्र है यहाँ प्रत्ययान्त शब्दों से पुनः प्रत्यय लगा कर अनेक अर्थविशेष में शब्दान्तरों को देखा जा सकता है । वैदिकभाषा में णिजन्त धातुओं से पुनः सन् भी कुछ उदाहरणों में देखा जा सकता है, यथा- द्रा (=भागना) धातु से ‘दिद्रा॑पयिषति’ (शतपथ ब्राह्मण), धृ(=धारण करना) धातु से ‘दिधारयिषेत्’ आदि सन्नत रूप प्राप्त होते हैं परन्तु इच्छार्थक सन् प्रत्यय से पुनः इच्छार्थक सन् नहीं हो सकता है[3]

पौन: पुन्य (बार-बार करना) और भृशार्थ (अधिक करना) अर्थों को कहने के लिये पाणिनि ने सूत्र[4] से यङ् प्रत्यय का विधान किया है । जैसे पुन: पुनः पचति = पापच्यते। परन्तु गत्यर्थक धातुओं से कुटिलता की अभिव्यक्ति में यङ् प्रत्यय होता है = वाव्रज्यते । यङन्त का व्यवहार गर्हा अर्थ में भी होता है, लोलुप्यते । यङन्त धातुक्रियारूप भी दो प्रकार के होते हैं यङन्त और यङ्लुगन्त । यङन्त जैसे पच्+यङ्=पापच्य, पापच्य+त= पापच्यते । यङ्लुगन्त जैसे पच्+यङ्=पापच्य, पापच्य+तिप्= पापचीति । यङन्त के क्रियारूप ङित होने के कारण से आत्मनेपद में चलते है और यङ्लुगन्त के क्रियारूप सदैव परस्मैपद में ही चलते हैं । पाणिनि ने हेतु के प्रेषणादि व्यापार के वाच्य होने पर धातुमात्र से णिच् प्रत्यय का विधान किया है । क्रिया के करने में जो स्वतन्त्र होता है वह कर्ता कहलाता है । उस कर्ता का जो प्रयोजक है वह हेतु कहलाता है । जब उस हेतु का प्रेषणादि-प्रेरणादि व्यापार वाच्य हो तो उसके लिये पाणिनि ने धातु से णिच् प्रत्यय का विधान किया है । यथा- देवदत्तः कटं करोति, यज्ञदत्त: तं प्रेरयति= कटं कारयति देवदत्तेन यज्ञदत्त: । कृ+णिच्=कारि, कारि+तिप्= कारयति । सोsकामयत, कमु+णिच्= कामि +त= कामयत । पाणिनि ने आत्मसम्बन्धी सुबन्त कर्म से इच्छा अर्थ में क्यच् प्रत्यय का विधान किया है “आत्मन: पुत्रम् इच्छति =पुत्रीयति । अपने पुत्र को चाहता है” इतने बडे वाक्य को मात्र “पुत्रीयति” क्रिया शब्द के द्वारा कहा जा सकता है । पुत्र+क्यच्=पुत्रीय, पुत्रीय+तिप्= पुत्रीयति । क्यच् प्रत्यय के समान ही प्रत्ययान्तर के रूप मे काम्यच् प्रत्यय भी होता है । आत्मनः पुत्रम् इच्छति= पुत्रकाम्यति । पुत्र+ काम्यच्= पुत्रकाम्य, पुत्रकाम्य+तिप्= पुत्रकाम्यति । उपमानवाची कर्ता से व्यवहार (आचारे) अर्थ में और भृशादि प्रातिपदिकों से क्यङ् प्रत्यय होता है और सकारान्त सुबन्त के सकार का लोप भी होता है यथा- पयायते, पयस्यते । पण्डित+क्यङ्= पण्डिताय, पण्डिताय+तिप्= पण्डितायते । लोहितादि शब्दों और डाच्प्रत्ययान्त शब्दों से “होना” (भवत्यर्थे) अर्थ में क्यष् प्रत्यय होता है । लोहितायति, लोहितायते । पटपटायति, पटपटायते । लोहित+क्यष्=लोहिताय, लोहिताय+तिप्= लोहितायति । लोहित+क्यष्=लोहिताय, लोहिताय+ते= लोहितायते । कण्ड्वादि के २ प्रकार है वो कभी तो धातु के रूप में व्यवहृत होते हैं और कभी प्रातिपदिक के रूप में जब वे धातु के रूप में व्यवहॄत होते हैं तो उस समय उनसे यक् प्रत्यय होता है । कण्डूञ्- कण्डूयते, कण्डूयति । कण्डू+यक् =कण्डूय, कण्डूय+तिप्= कण्डूयति । कण्डू+यक् =कण्डूय, कण्डूय+ते= कण्डूयते । गुपादि धातुओं से सामान्यतया आय प्रत्यय कहा है किन्तु आर्धधातुक विषय हो तो विकल्प से होगा, गोपायति, गोप्ता । गुप्+आय=गोपाय, गोपाय+तिप्= गोपायति । ऋति धातु से ईयङ् प्रत्यय होता है । यह धातु धातुपाठ में पठित नहीं है अपितु सौत्र धातु है और यह घृणार्थ को द्योतित करती है, ऋतीयते । ऋति+ईयङ्= ऋतीय, ऋतीय+त= ऋतीयते । णिङ् प्रत्यय कमु कान्तौ धातु से होता है कामयते, आर्धधातुक विषय हो तो विकल्प से णिङ् प्रत्यय होता है, प्रत्ययों में ङित् के कारण से आत्मनेपद होता है कमु+णिङ्= कामि, कामि+त= कामयते ।

उपर्युक्त सनाद्यन्त प्रक्रिया पाणिनि के द्वारा विहित है जिसका अनुप्रयोग इस शोध के माध्यम से संगणक में किया गया है, जिससे संगणक सनाद्यन्त शब्दों की पहचान और विश्लेषण करने में सक्षम है ।

  1. सर्वेक्षण (Review)

सूचना एवं संचार के इस युग में ऑनलाइन शिक्षण टूल्स की महत्ता तेजी से बढ़ रही है । तेजी से बढ़ते हुए एलेक्ट्रॉनिक्स डेवाइसेस् जैसे मोबाइल, कम्प्यूटर, टेबलेट के प्रयोग तथा बहुत सारे सरकारी, निजी, शैक्षिक, व्यापारिक आदि कार्यों को आसान करने तथा जन सामान्य तक सभी सुविधाओं को पहुंचाने के लिये भारत सरकार द्वारा भारत को ‘डिजिटल इंडिया’ बनाने का संकल्प लिया गया है । जिसके तहत देश के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक संचार एवं प्रौद्योगिकी को बढावा दिया जा रहा है । जिसमें संगणकीय भाषाविज्ञान की अहम् भूमिका हो सकती है । संस्कृत भाषा को जनसाधारण तक पहुचाने हेतु व इसके विकास के लिए आईटी क्षेत्र के विद्वानों ने पिछले कुछ वर्षों से कम्प्यूटर की सहायता से इस क्षेत्र में काफी कार्य किया है । इस क्षेत्र को शोध के माध्यम से आगे बढाने में आई.आई.टी.मुम्बई, आई.आई.आई.टी.हैदराबाद, सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आँफ हैदराबाद, जे.एन.यू. दिल्ली आदि प्रमुख संस्थान हैं । भारतीय भाषाओं विशेष रूप से संस्कृत भाषा से सम्बन्धित कार्यों के लिये जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र ने संस्कृत भाषा से सम्बन्धित अनेक कार्य किये हैं जिनमें से पाणिनीय संस्कृत व्याकरण के विभिन्न प्रकरण मुख्य हैं । प्राथमिक क्रियारूपों के लिये भ्वादिगण पर आधारित क्रिया विश्लेषक तन्त्र जिसके माध्यम से भ्वादिगण में पठित धातुओं के सभी रूपों को आसानी से विश्लेषित किया जा सकता है । यह सिस्टम उदाहरण आधारित है (Agrawal, 2007 and Bhadra et al, 2009) । सुबन्त विश्लेषक सिस्टम बहुत ही उपयोगी सिस्टम है जो किसी वाक्य में सुबन्त की पहचान नियम एवं डेटा के आधार पर करता है अन्तिम पदों जैसे अव्यय एवं क्रिया पद को भी टैग करने के साथ पहचान करके इसका विश्लेषण (प्रकृति प्रत्यय का विभाग) करता है (Chandra, 2006; Jha et al, 2006; Bhadra et al, 2009; Jha et al, 2009; Chandra & Jha, 2011 and Chandra, 2012) । अन्य कार्य जैसे सन्धि विच्छेदक (Kumar, 2007), कृदन्त विश्लेषक (Singh, 2008 and Murali et al, 2014), कारक विश्लेषक (Mishra, 2007), स्त्रीप्रत्ययान्त विश्लेषक (Bhadra, 2007) तथा सुबन्त निर्मापक सन्धि निर्मापक (Kumar, 2008), तिङन्त निर्मापक (Mishra & Jha, 2007) भी उल्लेखनीय हैं । संस्कृत के लिये स्कूल स्तर पर ऑनलाइन शिक्षण हेतु मल्टीमीडिया आधारित कार्य भी उल्लेखनीय है (Bhaumik, 2009) । संस्कृत व्याकरण के अतिरिक्त भी इस विभाग ने अन्य कार्यों पर बल दिया है जिसमें संस्कृत ग्रन्थों की ऑनलाइन अनुक्रमणिका (Tiwari, 2011) तथा अमरकोश एवं महाभारत (Tripathi, 2008) सर्च आदि मुख्य हैं । 2006 में इस केन्द्र द्वारा संस्कृत भाषा के लिये एक टैगर विकसित किया गया (Chadrashekar, 2006) । इस केन्द्र का मुख्य उद्देश्य संस्कृत से भारतीय भाषाओं में मशीनी अनुवाद करना है ।

इसी क्षेत्र में हैदराबाद विश्वविद्यालय (http://sanskrit.uohyd.ernet.in/) ने भी कार्य करना आरम्भ किया जिन्होनें लिंक्स आधारित कुछ टूल्स निर्मित किये हैं । प्रगत संगणन विकास केन्द्र (cdac.in) में भी कार्य निरन्तर प्रगति पर है जिसमें मुख्य कार्य पाणिनीय धातुओं का अन्य आचार्यों के द्वारा पठित धातुओं से तुलना, जो कि प्राथमिक धातुओं तक ही सीमित है (Shailaja, 2014) । असमस्तपदों को समस्तपद बनाने की सङ्गणकीय प्रक्रिया का निर्माण किया गया है , जो कि समास का कार्य (अनेक समर्थ पदों को एक करना है ) करता है (Satuluri, 2015) ।

दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग ने इस क्षेत्र में कार्य शुरू किया जिनमें से ई-शिक्षण हेतु सुबन्त-रूपसिद्धि, तद्धितान्त विश्लेषक, छन्द विश्लेषक आदि प्रमुख हैं (Department of Sanskrit, DU) । इस विभाग का मुख्य उद्देश्य संस्कृत भाषा के ऑनलाइन शिक्षण हेतु टूल्स बनाना है । भारतीय भाषा प्रसारण एवं विस्तारण केन्द्र, भारतीय भाषाओं के अनेक टूल्स के लिये वित्तपोषण प्रदान करता है ।

सैद्धान्तिक कार्यों के रूप में धातुपाठ पर आधारित माधवीय धातुवृत्ति में सनाद्यन्त क्रियापदों के कुछ रूप उदाहरण स्वरूप प्राप्त होते हैं (विद्यावारिधि, 1997) जहाँ पर सिद्धि प्रक्रिया का ज्ञान भी सरलता से हो जाता है । धातुरत्नाकर में प्रायशः सभी रूप प्राप्त हो जाते हैं (बिमली, 2010) परन्तु वहाँ पर सिद्धि प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त नही हो पाता है । नामधातुओं का संरचनात्मक एवं अर्थमूलक अध्ययन (शर्मा, 1999) जिसमें कतिपय नामधातुओं का ज्ञान प्राप्त होता है । पाणिनीय धातुपाठ में प्रतिपादित गत्यर्थक धातुओं की अर्थवैज्ञानिक समीक्षा (आर्य, 1999 ) जिसमें गत्यर्थक धातुओं के प्राथमिक रूप की विवेचना की गई है ।

उपर्युक्त कार्यों के अवलोकन से स्पष्ट है कि सनाद्यन्त क्रियापदों की पहचान एवं विश्लेषण हेतु अद्यावधि इस प्रकार का कोई भी तन्त्र प्राप्त नहीं होता है । पाणिनीय तिङन्तों पर अद्यावधि अत्यल्प कार्य हुआ है, साथ ही संगणकीय भाषाविज्ञान के क्षेत्र में सनाद्यन्त क्रियापदों पर कोई कार्य नही हुआ है । संस्कृत भाषा के विश्लेषण के लिये यह कार्य अत्यन्त उपादेय है जिसका प्रयोग संस्कृत भाषा के विश्लेषक तंत्र के रूप में किया जा सकता है ।

 

  1. सामग्री एवं शोध प्रविधि (Materials and Methods)

सनाद्यन्त पदों की संगणकीय पहचान एवं विश्लेषण के लिये मुख्य रूप से पाणिनि द्वारा प्रतिपादित सनाद्यन्त नियमों को आधार बनाकर संगणकीय नियमों का निर्माण किया गया है । अतः सनादि प्रत्ययों से सम्बन्धित पाणिनि नियम ही इसके मुख्य सामग्री के रूप में प्रयोग किये गये हैं । सनाद्यन्त उदाहरण देखने हेतु संस्कृत साहित्य के विभिन्न ग्रन्थ जैसे अभिज्ञानशाकुन्तलम् (द्विवेदी, 2005), नैषधीयचरितम् (रेग्मी, 2012), शिशुपालवधम् (शास्त्री, 2013) इत्यादि भी इस अध्ययन में शामिल किये गये हैं । संस्कृत सनाद्यन्त अभिज्ञान एवं विश्लेषण तंत्र के लिये संगणकीय भाषाविज्ञान एवं सॉफ्टवेयर अभियान्त्रिकी की विधि (Jurafsky and Martin, 2008) के साथ-साथ पाणिनि नियम एवं उदाहरण आधारित विधि का प्रयोग किया गया है । वेब आधारित सिस्टम बनाने के लिये निम्नलिखित चरण अनुसरित गये हैं-

  1. माधवीयधातुवृत्ति, सिद्धान्तकौमुदी और अष्टाध्यायी आधारित सनाद्यन्तों की पहचान के लिये सनादि प्रत्ययों तथा नियमों के लिए एक डेटाबेस का निर्माण ।
  2. माधवीयधातुवृत्ति, पाणिनि अष्टाध्यायी व धातुपाठ की सहायता से सनादि प्रत्ययों से निर्मित क्रियापदों के लिए एक डेटाबेस का निर्माण ।
  3. अष्टाध्यायी, सिद्धान्तकौमुदी और माधवीयधातुवृत्ति के आधार पर सनाद्यन्त प्रक्रिया के लिये संगणकीय नियमों का एक डेटाबेस बनाना जिसमें प्रक्रिया संबन्धी सभी नियम, अनुक्रम आदि शामिल हैं ।

 

शोध-विधि को चित्र सं. 1 के माध्यम से समझा जा सकता है ।

Figure 1: शोध-विधि

 

 

  1. परिणाम एवं परिचर्चा (Results and Discussion)

इस सिस्टम के माध्यम से किसी भी वाक्य में सनाद्यन्त पदों की पहचान एवं उसका विश्लेषण किया जा सकता है । प्रस्तुत सिस्टम नियम एवं उदाहरण आधारित विधि के अनुसार कार्य करता है, परिणामस्वरूप वाक्य में सनाद्यन्त पद का विश्लेषण (प्रकृति प्रत्यय विभाग) करके उसकी सम्पूर्ण सूचना प्रदान करता है । जिससे कोई भी किसी भी समय इसका प्रयोग कर सकता है । वेब आधारित सनाद्यन्त अभिज्ञान एवं विश्लेषण सिस्टम का स्क्रीन-शॉट चित्र सं. 2 में देखा जा सकता है । विश्लेषण के पश्चात अर्थ निर्धारण करना सरल हो जाता है । सिस्टम अभी विकास (Development) एवं परीक्षण (Testing) के अधीन है अतः सटीकता (Accuracy) का सही अनुमान लगाना संभव नही है । प्रस्तुत सिस्टम की कुछ सीमाएं भी हैं जैसे

  1. सन् प्रत्ययान्त धातुओं में सामान्यतया द्वित्व रूप दिखाई देता है परन्तु कुछ विशेष धातुओं में अभ्यास का लोप हो जाने के कारण सनाद्यन्त क्रियारूप की पहचान करना कठिन हो जाता है क्योंकि इस प्रकार के रूप सामान्य धातुरूप जैसे दिखाई पडते हैं यथा-दित्सति, धित्सति, शिक्षति आदि । जिन्हें उदाहरण विधि की सहायता से पहचानने का प्रयास किया गया है ।
  2. विश्लेषण सिस्टम पूर्णरूपेण अभिज्ञान सिस्टम पर आश्रित है । यदि पहचान गलत होगी तो विश्लेषण भी गलत हो सकता है ।
  3. अनेक लकारों, पुरुषो एवं वचनों में एक जैसे ही रूप प्राप्त होतें हैं इस स्थिति में सिस्टम यह निर्णय नही कर पाता कि प्रस्तुत वाक्य में यह पद किस पुरुष तथा वचन में प्रयुक्त हुआ है ,परन्तु सिस्टम सभी की सम्भव सूचना प्रदान करता है । उदाहरण के लिये- पिपठिषाम्बभूव (पठ्+सन्+लिट्+प्रथम पुरुष एकवचन / पठ्+सन्+लिट्+मध्यम पुरुष बहुवचन / पठ्+सन्+लिट्+उत्तम पुरुष एकवचन) ।
  4. इसी प्रकार पिपठिषाञ्चकार, पिपठिषामास अन्य धातुओं के रूप भी बनते हैं ।
  5. कुछ धातुओं के रूप भी एक जैसे बनतें हैं जैसे षिध् एवं सिध् इत्यादि जिनका विस्श्लेषण करना कठिन हो जाता है ।

 

Figure 2: वेब आधरित सनाद्यन्त अभिज्ञान एवं विश्लेषण सिस्टम का स्क्रीन-शॉट

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची (References)

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[1] ईशोपनिषत् 40/2

[2] Skt. Gr, p. 372

[3] सन्नतात् सन्निष्यते ।

[4]  धातोरेकाचोsहलादेः क्रियासमभिहारे यङ् ।

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1 COMMENT

  1. आपने इन जर्नल्स को जिस उत्तमता से साधारण से असाधारण स्तर तक प्राप्त कराया है, वह अकल्पनीय और अतिविशिष्ट परिश्रम और सुनियोजित योग्यता का परिणाम है। बहुत बहुत बधाई। हमें आप पर गर्व है।
    मैं इस उत्कृष्ट जर्नलपरम्परा से स्वयं को जुड़ा हुआ पाकर सौभाग्यशाली मानता हूँ। यद्यपि मेरा योगदान वास्तव में नगण्य ही है। आपका आभार।

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