साधनमुखेन व्याकरण की लोकोपयोगिता 4.5/5 (6)

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अङ्कुश कुमार

  पी. एच. डी. (शोधच्छात्र)

                                                                        जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

                                                                        नई दिल्ली – ११००६७

 

आमुख –

भाषा मानव-मात्र के भावों और विचारों के पारस्परिक आदान प्रदान का सर्वोत्तम साधन है। भाषा के माध्यम से ही मनुष्य अपने विचारों को एक दूसरे तक पहुँचाता है तथा ग्रहण करता है। यह वाक्शक्ति मनुष्य में ईश्वरीय देन है। इसके द्वारा ही वह संसार के सभी प्राणियों में सर्वोत्तम कहलाता है। इसी भाषा रूपी ज्योति से सारा संसार आलोकित है[1]। वाणी के प्रसाद से ही हम समस्त लोकव्यवहार में समर्थ होते हैं[2]

व्याकरण भाषा का आधारस्तम्भ है। इस शब्दसंहितारूप भाषा के प्रवाह में अनेक नूतन शब्द समाविष्ट हो जाते हैं। इन शब्दों के विश्लेषण व साधुत्व प्रतिपादन के लिए व्याकरणशास्त्र अस्तित्व में आया। इसमें प्रकृति-प्रत्ययादि विभाग द्वारा शब्दों की व्युत्पत्ति व साधुत्व प्रतिपादित किया जाता है[3]। शास्त्रों में इसे वेदों का मुख[4] कहा गया है। मुख स्थानीयता के कारण वेदाङ्गों में इसकी मुख्यता[5] स्वत: सिद्ध है। इस पद-विद्या की निरन्तर साधना से मनुष्य इहलोक व परलोक दोनों को ही सुखमय बना सकता है। महाभाष्यकार के अनुसार यदि मनुष्य एक शब्द का भी विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त कर तदनुकूल आचरण करें तो वह शब्द मात्र भी अत्यन्त उपकारक सिद्ध होता है[6]। जो व्यक्ति व्यवहार काल में शब्दों का यथायोग्य प्रयोग करता है, वह कभी भी पराजित नहीं होता, वरन् जय को ही प्राप्त करता है[7]। एतदर्थ व्याकरण-ज्ञान अत्यावश्यक है। व्याकरण से ही प्रकृति-प्रत्ययादि विभाग पुरस्सर पदसिद्धि होती है। पदसिद्धि से अर्थनिर्णय सम्भव है तथा अर्थज्ञान से तत्त्वज्ञान व तदाधारेण परम-श्रेय की प्राप्ति सम्भव है[8]। शब्दार्थावबोध व्याकरण ज्ञान से ही सम्भव है[9], अतः यत्नपूर्वक समस्त विद्याओं में प्रदीपभूत इस  व्याकरण-शास्त्र का अध्ययन प्रतिदिन करना चाहिए[10]। इस परम पवित्र व्याकरण[11] ज्ञान से मनुष्य इहलोक में स्थित होकर भी देवत्व को प्राप्त कर सकता है[12]

भर्तृहरि ने इस विद्या को ब्रह्म के आसन्नवर्ती माना है[13]। उनके अनुसार इसका यत्नपूर्वक ग्रहणरूपी तप सभी तपों में उत्तम तप है। यह विद्या समस्त वाङ्मलों के वारण में औषधि-समान है[14]।  मुमुक्षु जनों के लिए यह मोक्ष का आञ्जस मार्ग है[15]। अथवा यह कहें कि मोक्षसिद्धि में यह प्रथम सोपान है[16]

प्रस्तुत पत्र में इसी पदविद्या (व्याकरण) के अङ्गभूत साधन (कारक) के माध्यम से व्याकरण की लोकोपयोगिता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।

 कारक लक्षण व भेद

कारक स्वरूप (नामार्थ व क्रिया के सम्बन्ध रूप में) –

यह सर्वस्वीकृत तथ्य है कि सभी कारकों का धात्वर्थ में अन्वय होता है[17]। भू, पच् आदि शब्दों की शास्त्र में धातु संज्ञा प्रोक्त है[18]। सामान्यतया क्रिया को ही धात्वर्थ कहा जाता है[19]। पतञ्जलि ने “क्रियावचनो धातु:” इस वार्तिक के प्रसङ्ग में  क्रिया के बोधक शब्द को धातु कहा है[20]। यह क्रिया पिण्ड-रूप में प्रत्यक्षप्रमाण से निर्दिष्ट नहीं की जा सकती, उसका तो अनुमान ही सम्भव है। इस अनुमानगम्य क्रिया के कारण ही पचति यह प्रयोग सम्भव वा असम्भव होता है। यदि क्रिया न होती तो एक वस्तु का अन्य स्थान पर पाया जाना अनुपपन्न हो जाता[21]

भाषिक विश्लेषण में वाक्य के अवयवों पर विचार करने पर हमें दो प्रकार के तत्त्व प्राप्त होते हैं – नाम (सुबन्त) तथा  क्रिया (तिङन्त)। पाणिनि ने इनकी पद संज्ञा[22] कर इन्हें वाक्यावयव हेतु समर्थ बताया है[23]। वाक्य की संरचना में सुबन्त तथा तिङन्त पदों के परस्पर सम्बन्ध की आवश्यकता होती है। क्रिया (तिङन्त) का नामार्थ (सुबन्त) के साथ सम्बन्ध ही वाक्य का प्रधान उद्देश्य है। इससे ही वक्ता का अभिप्रेतार्थ श्रोता तक पहुँच सकता है। वाक्य में क्रिया के साथ नामार्थ के इस सम्बन्ध को ही व्याकरणशास्त्र में कारक नाम से अभिहित किया जाता है। क्रिया व नामार्थ का यह सम्बन्ध मुख्यरूप से साक्षात् होता है, यदा-कदा उपकार-सामर्थ्यवशाद् परम्परया सम्बद्ध भी होता है। इस प्रकार दोनों प्रकार के सम्बन्धों से नामार्थ को आश्रय बनाकर कारक-तत्व विद्यमान रहता है।

क्रिया साध्य तथा कारक साधन रूप में वाक्य में व्यवस्थित होते हैं। भर्तृहरि भी कारकों को “साधन” नाम से अभिहित कर “साधनसमुद्देश” में विवेचित करते हैं। क्रिया की निष्पत्ति (सिद्धि, पूर्ति वा निर्वृत्ति) में अनेक साधनों की आवश्यकता होती है। यथा पाक क्रिया में ईंधन, अग्नि, पात्र, अन्न, तथा पकाने वाला व्यक्ति। ये सभी तत्त्व क्रिया के साधक हैं। इनकी प्रवृत्तियाँ क्रिया की सिद्धि में भिन्न-भिन्न प्रकार से होती हैं। उदाहरण के लिये ईंधन जिस रूप में पाकक्रिया में साधक है, पकाने वाला व्यक्ति उसी रूप में साधक नहीं है। इसका कारण साधनों का प्रवृत्ति-भेद है और यह प्रवृत्ति ही क्रिया रूप में प्रतिफलित होती है[24]

 कारक-व्यवस्था

          कारक तथा क्रिया अविच्छिन्न होकर ही वाक्य में प्रयुक्त होते हैं। क्रिया की अनुपस्थिति में कारकों की सत्ता ही संभाव्य नहीं है, तो दूसरी ओर कारकों के अभाव में क्रिया अनुपपन्न हो जायेगी। यद्यपि महाभाष्यकार क्रियामात्र को वाक्य स्वीकार करते हैं[25] तथापि वहाँ भी सूक्ष्मरूप से साधन गम्यमान होते ही हैं। यथा “गच्छ” यहाँ मध्यम पुरुष एकवचन “त्वम्” यह कर्त्ता कारक गम्यमान है ही। इसी प्रकार अन्य साधनों की भी प्रकरणानुसार प्रतीति होती ही है। यथा “अप्युपाध्यायो गृहान्निर्गतः” के “नहि नहि, अस्ति” इस उत्तर में अस्ति क्रिया में उपाध्याय की कर्त्ता रूप में तथा गृह की अधिकरण रूप में प्रतीति होती है। अस्ति, भवति आदि सत्तार्थक क्रियाओं में भी प्रकरणानुसार “घटः” आदि साधन (कारक) गम्यमान होते ही हैं। अतः सूक्ष्म रूप से ही सही पर क्रिया में कारकों की उपस्थिति अनिवार्य है, अन्यथा वह निष्पन्न ही नहीं हो पायेगी। इसके विपरीत कारकों को मुख्यरूप से स्थूल रूप में ही क्रिया की आवश्यकता होती है, यदा-कदा गम्यमान क्रिया से भी वाक्य पूर्ति हो जाती है। यथा – विवाह प्रसङ्ग में जब कन्या का पिता अपने भावी जामाता के प्रति अर्घ्य, आचमनीय, मधुपर्क आदि ग्रहण कराने हेतु प्रवृत्त होता है, तो आचार्योक्ति है- “मधुपर्कः, मधुपर्कः, मधुपर्कः”। यहाँ “वर्तते” क्रिया गम्यमान है, जिसका कर्त्ता मधुपर्क है[26], अतः वाक्य में यदि क्रिया श्रूयमाण अथवा गम्यमान न हो तो वाक्यस्थ पदों को कारक नहीं कहा जा सकता है।

उपरोक्त विवरण के आधार पर यह प्रश्न समुत्पन्न होता है कि जिस वाक्य में अनेक नामार्थ (सुबन्त) प्रयुक्त हों, उन सभी नामार्थों को कारक क्यों नहीं माना जाता? यथा – “श्रीगणेशाय नमः” में श्रीगणेश, “बालकेन सह धावति” में बालक, “गृहं विना सुखं नास्ति” में गृह तथा “शीघ्रं चलति” में शीघ्र पद को कारक क्यों नहीं माना जाता? वस्तुतः एक नामार्थ के अन्य नामार्थ से सम्बन्ध को कारक नहीं कहा जा सकता है। प्रस्तुत प्रकरण में नामार्थ को व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। यहाँ नामार्थ में – क्रिया से भिन्न अन्य सभी निपात, कर्मप्रवचनीय, उपसर्ग, अव्यय आदि का ग्रहण है। जब तक क्रिया का सम्बन्ध नामार्थ के साथ न हो तब तक कारक की उपपत्ति सम्भव नहीं है। यथा “गुरुं नमस्करोति” में गुरु का सम्बन्ध नमन-क्रिया से है, अतः यहाँ कारकत्व उपपन्न है, परन्तु इसी प्रकार के वाक्य “गुरवे नमः” में क्रियापद के अभाव में कारकत्व का भी अभाव है। इस प्रकार के सम्बन्ध उपपद सम्बन्ध (उपपद विभक्ति) कहलाते हैं।

 कारक तथा विभक्ति का अन्तः सम्बन्ध –

कारक तथा विभक्ति दो भिन्न तत्व हैं। विभक्ति कारक तथा उपपद दोनों प्रकार के सम्बन्धों को व्यक्त करती है, अतः विभक्ति का कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत है। कारक सूक्ष्म तथा अव्यक्त सम्बन्ध के रूप में द्रव्य की वह शक्ति है, जो विभक्ति के द्वारा व्यक्त होती है। इस आधार पर दोनों में व्यङ्ग्य व्यञ्जकभाव (द्योत्य-द्योतकभाव या प्रकाश्य-प्रकाशक भाव) सम्बन्ध होता है। कारक व्यङ्ग्य तो विभक्ति व्यञ्जक। परञ्च यह “यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः” के समान सदैव साथ हो, यह आवश्यक नहीं, क्योंकि विभक्ति ही एकमात्र कारकों को अभिव्यक्त करती हो, अथवा कारक केवल विभक्ति से अभिव्यक्त होते हो, ऐसी स्थिति नहीं है।

व्यङ्ग्य-नियम – “विभक्तिः कारकमेव व्यनक्ति”- व्यङ्ग्यगत नियम।  विभक्ति न केवल कारकों को व्यक्त करती है, अपितु उपपद सम्बन्धों को भी व्यक्त करती है। वार्तिककार के अनुसार विभक्तियाँ कर्मादि-कारक व एकत्वादि संख्याओं को भी व्यक्त करती हैं[27]। भट्टोजिदीक्षित-प्रभृति नव्य वैय्याकरण विभक्तियों के यथायोग्य पाँच अर्थ स्वीकार करते हैं- १.आश्रय, २. अवधि, ३. उद्देश्य, ४. सम्बन्ध, तथा ५. शक्ति[28]। कौण्डभट्ट के अनुसार सामान्यतया आश्रय- द्वितीया, तृतीया व सप्तमी का अर्थ है। अवधि- पञ्चमी का, उद्देश्य- चतुर्थी का, सम्बन्ध- षष्ठी का व शक्ति प्रथमादि सभी विभक्तियों का अर्थ है[29]। इस प्रकार कारक, के अतिरिक्त  उपपद, सम्बन्ध, संख्या भी विभक्ति से व्यक्त होते हैं।

व्यञ्जक-नियम- “विभक्तिरेव कारकं व्यनक्ति” पर यदि विचार करें तो इसका भी व्यभिचार दृष्टिगत होता है। यतोहि यद्यपि प्रामुख्येन विभक्ति ही कारक को अभिव्यक्त करती है, तथापि एतदतिरिक्त अन्य शब्द-तत्त्व भी इसे अभिव्यक्त करते हैं। हेलाराज ने इनका उल्लेख किया है[30]। “ग्रामं गच्छति” में अम्-विभक्ति कर्म को अभिव्यक्त कर रही है, तो शतेन क्रीतः शत्यः अथवा शतिकः में तद्धित-प्रत्यय यत् या ठन्[31] करणत्व का बोध कराता है। इसी प्रकार यत्र, तत्र आदि में त्रल्-प्रत्यय[32] व “अन्तरा त्वां च मां च कमण्डलुः” में अन्तरा यह अव्यय पद अधिकरण के बोधक हैं। “मधु निरीक्षते, दधि समश्नाति” में प्रातिपदिक से ही कर्मत्व शक्ति का बोध हो रहा है, तो “भीमो राक्षस:” में मक् यह कृत्-प्रत्यय[33] अधिकरण का तथा “दानीयो विप्र:” में अनीयर्[34] प्रत्यय सम्प्रदान के बोधक हैं। इस प्रकार कारक के अभिव्यञ्जक अनेक हैं, तथापि विभक्तियों का प्राधान्य स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसी प्रकार विभक्तियों से अभिव्यञ्जित होने वाले अनेक तत्त्व हैं तथापि उनमें कारकों का ही प्राधान्य है।

 कारक लक्षण –

            “कृ” धातु से “ण्वुँल्तृचौ”[35] सूत्र से ण्वुँल् प्रत्यय के योग से “कारक” पद निष्पन्न होता है। पाणिनि से पूर्व वा पाणिनि के काल में यह कारक शब्द लोक में प्रसिद्ध रहा होगा, अत एव पाणिनि ने कारक-संज्ञा का लक्षण  न कहकर अधिकार रूप में प्रयुक्त किया है। महाभाष्यकार के अनुसार व्याकरण में दो प्रकार के शब्दों द्वारा पदार्थों का संकेत दिया जाता है – १.लोक में अत्यन्त प्रसिद्ध शब्दों से एवं २.कृत्रिम (स्वकल्पित) टि, घु, घ, भ आदि शब्दों से[36]। प्रथम प्रकारक शब्दों के लक्षण आवश्यक नहीं हैं, यावत् उन्हें शास्त्रीय कृत्रिम अर्थ में प्रयोग नहीं किया जाये। द्वितीय प्रकारक शब्दों के लक्षण की नितान्त आवश्यकता होती है। पाणिनि ने इसे लोक-प्रसिद्ध “करोतीति कारकम्”[37] इस अर्थ में प्रयुक्त किया है, अत: इसका लक्षण अष्टाध्यायी में नहीं दिया गया। कारक का सर्वप्रथम लक्षण महाभाष्यकार “कारक इति सञ्ज्ञानिर्देशश्चेत्सञ्ज्ञिनोऽपि निर्देशः”[38] इस वार्तिक के व्याख्यान में प्रस्तुत करते हैं – “साधकं निर्वर्तकं कारकसञ्ज्ञं भवतीति वक्तव्यम्”[39]इसी प्रसङ्ग में महाभाष्यकार शङ्का-समाधानात्मक शैली में लक्षण को व्याख्यायित करते हैं। यदि “कारके” यह सूत्र कारकसंज्ञा निर्देशक है तो संज्ञी का भी निर्देश करना चाहिये[40]। महाभाष्यकार यहाँ कारक लक्षण प्रस्तुत कर “साधकं निर्वर्तकम्” इस संज्ञी का निर्देश करते हैं। यदि संज्ञी का निर्देश नहीं करेंगे तो निम्न असङ्गतियाँ समुपस्थित हो सकती हैं –

  • ग्रामस्य समीपादागच्छति[41] – प्रकृत प्रयोग में ग्राम शब्द के कारक न होने पर भी उसकी अनिष्ट अपादान संज्ञा प्राप्त होने लगेगी, यदि संज्ञी का निर्देशपूर्वक विशेष कथन नहीं करेंगे तो। यथा वृक्ष की शाखा से गिरने वाले को वृक्ष से ही गिरा हुआ माना जाता है, उसी प्रकार ग्राम के समीप से आने वाले को भी आर्थिक सम्बन्ध द्वारा ग्राम से ही आया हुआ माना जाने से ग्राम शब्द में आगमनक्रियाजनकतारूप लाक्षणिक दृष्टि से कारकसंज्ञा प्राप्त होगी व उससे अपाय में ध्रुव होने से अपादानसंज्ञक होने लगेगा। इसके निराकरण में महाभाष्यकार कहते हैं कि उक्त वाक्य में ग्राम नहीं अपितु उसका सामीप्य अपाययुक्त विवक्षित है, अत: सामीप्य ही कारक व अपादान संज्ञक होकर पञ्चम्यन्त प्रयुक्त होगा। जब ग्राम अपाययुक्त विवक्षित होगा तो “ग्रामादागच्छति” यह वाक्य प्रयोग होगा।
  • ब्राह्मणस्य पुत्रं पन्थानं पृच्छति[42] – इस वाक्य में ब्राह्मण तथा पुत्र दोनों ही अकथित है, अत: दोनों को ही कर्मसंज्ञा प्राप्त होने लगेगी। परन्तु अकथित पद के दो अर्थ हैं – (क)अप्रधान (ख)प्रकरण में अकथित (नहीं कहा गया है जो)। यदि अकथित पद का प्रथम अर्थ स्वीकार न करके द्वितीय अर्थ स्वीकार करें तो ब्राह्मण के कर्मसंज्ञा का प्रसङ्ग ही समुपस्थित नहीं होगा। अन्य भी यहाँ पर ब्राह्मण तो विशेषणत्वेन प्रयुक्त है, अत: उसके कारकत्व का प्रश्न ही समुपस्थित नहीं होता।
  • वृक्षस्य पर्णं पतति[43] – यहाँ भी कारक-संज्ञी के निर्देशाभाव में वृक्ष के अपादानत्व का अनिष्ट प्रसङ्ग प्राप्त होने लगेगा। इस पर महाभाष्यकार अपाय की अविवक्षा का आलम्बन लेकर[44] सिद्ध करते हैं कि वृक्ष अपादान नहीं है। एतदर्थ यहाँ कारक-लक्षण की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती, यतोहि कारक यह एक महती (अन्वर्थ) संज्ञा है। लोक में जिस अर्थ में यह प्रसिद्ध है , शास्त्र में भी उसी अर्थ में ग्रहण किया गया है[45]

इस अन्वर्थता पर प्रश्न होता है कि अन्वर्थ होने से कारक-संज्ञा केवल कर्त्ता-कारक की ही सम्भव है, अन्य कारकों की नहीं[46]। इसके निराकरण में कहा जाता है कि अन्य कारकों में भी सूक्ष्मरूप से कर्तृत्व रहता ही है, क्योंकि वे क्रियासिद्धि में विभिन्न अवयवों का सम्पादन करते हैं। यथा पाकक्रिया में स्थाली (अधिकरण) का धारण क्रिया के कारण कर्तृत्व उपपन्न होता है[47]। लकड़ियों (करण) का ज्वलनादि क्रिया में कर्तृत्व है[48]। वस्तुत: सभी कारक क्रियासिद्धि में प्रवृत्त होते हैं। जब वे स्वतन्त्र रूप से प्रवृत्त होते हैं तो उनका कर्तृत्व उपपन्न होता है तथा परतन्त्र रूप से कर्त्ता के अधीन होकर तत्तत् कारकों का रूप ग्रहण करते हैं[49]

 कारक विषयक दार्शनिक लक्षण विमर्श –

भर्तृहरि व तदनुयायी दार्शनिकों ने कारक (साधन) को शक्ति रूप में व्याख्यायित किया है। शक्ति का अर्थ है- कारण में स्थित कार्योत्पत्ति के अनुकूल धर्मविशेष। यह समस्त संसार शक्तियों का संघात है। सभी पदार्थों में किसी-न-किसी क्रिया के निष्पादन की शक्ति अवश्य होती है। यद्यपि परमार्थत: शक्ति एक ही है, तथापि अविद्याकृत उपाधियों के कारण विभिन्न रूपों में प्रवर्तित होती है। शक्ति का इस प्रकार व्यावहारिक तथा पारमार्थिक स्वरूप-भेद स्वीकार करने पर पदार्थों के नित्यानित्य भेद से शक्तियों में भी नित्यानित्य भेद होते हैं। नित्य पदार्थ में स्वाभाविक शक्ति रहती है, जबकि अनित्य पदार्थ में शक्ति की उत्पत्ति होती है[50]। ये शक्तियाँ ही साधन पदेन अभिहित होती हैं, यतोहि दोनों ही कार्योत्पादन में प्रवृत्त होते हैं, अत: भर्तृहरि साधन का लक्षण इस प्रकार करते हैं –

“स्वाश्रये समवेतानां तद्वदेवाश्रयान्तरे।

क्रियाणामभिनिष्पत्तौ सामर्थ्यं साधनं विदुः॥[51]

यहाँ क्रिया के दो रूपों का वर्णन है -१. स्वाश्रय समवेत तथा २. आश्रयान्तर में समवेत। प्रथम स्वाश्रय रूप व्यापार को धारण करने वाला कर्त्ता तथा फलरूप अर्थ का धारण करने वाला कर्म क्रिया की निष्पत्ति में प्रामुख्येन सहायक है। करणादि अन्य कारक धात्वर्थ (व्यापार व फल) की सहायता कर्त्ता या कर्म के माध्यम से करते हैं, अत: गौणत्वाद् वे स्वाश्रय न होकर पराश्रय हैं[52]। इसी कारण कारिका में स्वाश्रय में समवेत क्रिया की निष्पत्ति हो या आश्रयान्तर (करणादि) में समवेत क्रिया की निष्पत्ति हो, दोनों ही अवस्थाओं में क्रिया-निष्पादिका शक्ति (सामर्थ्य) को साधन (कारक)  कहा है। भर्तृहरि के अनुसार द्रव्य कारक नहीं अपितु द्रव्यस्थ शक्ति कारक है। इसे ही व्यवहारार्थ सम्बन्ध भी कहते हैं, परन्तु सम्बन्ध शब्द अतिव्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है, अत: इसे शास्त्र में शक्ति नाम से अभिहित किया जाता है।

 कारक विषयक अन्य लक्षण विमर्श –

कारक विषयक अन्य लक्षण भी यत्र-तत्र उल्लिखित हैं। यहाँ प्रचलित लक्षणों पर विचार प्रस्तुत है। प्रायः सभी लक्षण कारक व क्रिया के सम्बन्ध को द्योतित करते हैं, परन्तु सभी में कोई न कोई दोष शेष रह जाता है तथापि इनमें कारक के बाह्यपक्ष के सम्यक् निरुपण का प्रयत्न सर्वथा श्लाघ्य है।

क्रियानिमित्तत्वं कारकत्वम् – कारक का यह प्रकृत लक्षण न्यायवार्तिककार उद्योतकर[53], कलाप-व्याकरण के वृत्तिकार दुर्गसिंग[54], वाचस्पति मिश्र[55], सरस्वतीकण्ठाभरण व श्रृङ्गारप्रकाशकार भोज[56] तथा कारक-चक्रकार भवानन्द को स्वीकार्य है। इनके अनुसार जो वस्तु क्रिया की सिद्धि में प्रयोजक या कारण बने, वह कारक कहलाती है। लक्षण में स्थित “क्रिया” पद का अर्थ है – धातु से उपस्थाप्य अर्थ[57]। धात्वर्थ के सम्बन्ध में वैय्याकरणों में दो प्रकार के मत प्रचलित हैं। प्रथम अखण्डशक्तिवादियों के अनुसार कर्तृवाच्य के प्रयोगों में धातु का अर्थ फलावच्छिन्न व्यापार (फलानुकूल व्यापार) होता है। यह नागेश को स्वीकार्य है[58]। अखण्डवादियों के अनुसार प्रकृत लक्षण यहाँ इस प्रकार घटित होगा- “गम्” धातु का अर्थ संयोगावच्छिन्न क्रिया (संयोगजनक व्यापार) है। यह ग्राम में नहीं होती, अत: उसमें कारकत्व के अनुपपत्ति की आशङ्का सम्भव है, परञ्च गम् धात्वर्थावच्छेदक उत्तरदेशसंयोग में ग्राम कारण तो होता ही है, जिससे प्रकृत लक्षण की ग्राम में सङ्गति हो जाती है[59]

धात्वर्थ विषयक द्वितीय मत भट्टोजिदीक्षित, कौण्डभट्ट[60] आदि खण्डशक्तिवादियों का है, जिनके अनुसार फल तथा व्यापार – ये धातु के पृथक् – पृथक् अर्थ हैं। यहाँ गम् धातु का एक अर्थ उत्तरदेशसंयोग रूप फल तथा द्वितीय चलना (पाद-विक्षेप) रूप व्यापार है। “ग्रामं गच्छति” में ग्राम उत्तरदेशसंयोग (फल) रूप धात्वर्थ की सिद्धि में कारण है, अत: प्रकृत लक्षण यहाँ घटित होता है[61]

क्रियान्वयित्वं कारकत्वम् – क्रिया से अन्वय रखनेवाला कारक कहलाता है। इस लक्षण में दोष यह है कि “शीघ्रं धावति” जैसे वाक्यों में क्रियाविशेषण को जो कि क्रिया से साक्षात् अन्वित है, कारक मानना पड़ेगा, जबकि सिद्धान्तत: क्रियाविशेषण कभी कारक नहीं च्हो सकता।

धात्वर्थांशे प्रकारो यः सुबर्थ: सोऽत्र कारकम्[62] धातु से उपस्थाप्य अर्थ के अन्वय में जो प्रकारीभूय (विशेषणतया) प्रतीत होने वाला सुबर्थ, वह ही कारक है। “वृक्षात्पतति” में जो पत्-धातु का पतन अर्थ है, उसमें पञ्चमी से उपस्थाप्य विभागरूप अर्थ पतन क्रिया का प्रकार(विशेषण) रूप है तथा कारक है, अत: यहाँ पञ्चमी कारक विभक्ति कहलाती है[63]। विभक्ति कारक नहीं है, वरन् वह कारक के अभिव्यक्ति का साधनमात्र है। गिरिधर भट्टाचार्य ने विभक्त्यर्थ-निर्णय में इस लक्षण की आलोचना की है[64]

अपादानाद्यन्यतमत्वं कारकत्वम् – इस लक्षण को गिरिधर ने पूर्वपक्ष के रूप में उद्धृत कर खण्डन किया है। प्रथम तो अपादानादि भी कभी-कभी षष्ठी के अर्थ में होते हैं। वहाँ इनका कारकत्व समाप्त हो जायेगा। अन्य अपादानत्वादि के भी अनेक भेद हैं। यथा –ध्रुवत्व, असोढत्व, ईप्सितत्व इत्यादि। इनमें से किसी एक को ही कारक कैसे कहा जा सकेगा?

यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाये तो कारक का कोई भी लक्षण निर्दुष्ट प्रतीत नहीं होता, तथापि क्रिया के जनक, निर्वर्तक, सम्पादक, उत्पादक इत्यादि रूप में जो कारक के लक्षण किये गये हैं, उनमें कारक के बाह्य पक्ष के निरूपण का उत्तम प्रयास किया गया है। यदि भाषा-प्रयोग में वक्ता की उदारता तथा यदृच्छा पर ध्यान दें तो कोई न कोई उदाहरण मिल ही जायेगा, जिसमें लक्षण अतिव्याप्त या अव्याप्त होगा। इन समस्याओं के निवारणार्थ भर्तृहरि के दार्शनिक सिद्धान्त “शक्ति: साधनम्” को आदर्श माना जा सकता है, तथापि भाषा के लौकिक स्वरूप को व्याख्यायित करने के लिए इन लक्षणों की आवश्यकता है।

 

कारक भेद –

संस्कृत व्याकरणशास्त्र में यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि द्रव्यों की उपर्युक्त प्रकार से क्रियाजनक शक्तियाँ ६ हैं[65]। तदनुसार कारक भी ६ हैं। यद्यपि कारक-शब्द का व्युत्पत्ति निमित्त केवल कर्त्ता ही है, तथापि शास्त्रदृशा व्यापक अर्थ में यह ६ कारकों का बोधक होता है – कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण[66]। प्रत्येक कारक में दो प्रकार की शक्ति होती है- सामान्य तथा विशेष। सामान्य शक्ति सभी में एक-सी रहती है, अत: यह विवक्षित होने पर उनकी अव्यक्त कर्तृशक्ति व्यक्त हो जाती है। यथा – स्थाली पचति, एधा: पचन्ति, असिश्छिनत्ति। दूसरी विशेष शक्ति से उनके परस्पर व्यावृत्ति का बोध होता है। एक ही पाकक्रिया में काष्ठ, स्थाली, तण्डुल, अग्नि व पाचक का सामान्य व्यापार एक होने पर भी विशेष व्यापार एक नहीं है। जिस प्रकार से स्थाली उपकारक है, उसी प्रकार से काष्ठ का व्यापार नहीं। व्यापार विशेष की यह अभिव्यक्ति ही कारकों को वैयक्तिक स्वरूप प्रदान करती है, जिससे वे कर्त्ता, कर्म, करण आदि नाम से अभिहित होते हैं[67]

कारकों के विकास क्रम को हम निम्नलिखित रूप से ४ स्तरों में समझ सकते हैं।

प्रथम स्तर – सभी कारकों में कर्तृत्व शक्ति निहित होने के कारण कर्त्ता का प्रामुख्य है[68]

द्वितीय स्तर – क्रिया के व्यापार तथा फल रूप अर्थ से कर्त्ता व कर्म साक्षात् सम्बद्ध हैं, क्योंकि व्यापार कर्त्ता में व फल कर्म में आश्रयी रूप में समवेत होता है, अत: ये दोनों क्रिया की निष्पत्ति में सर्वाधिक उपकारक हैं। इसलिए द्वितीय स्तर पर कर्त्ता व कर्म को स्थान प्राप्त होता है।

तृतीय स्तर – अन्य कारक इन दोनों में से किसी एक के माध्यम से क्रियोपकारक होने से गौण रूप से कारकत्व प्राप्त करते हैं। यथा “स्थाल्यां पचति” में स्थाली-निष्ठ अधिकरणत्व शक्ति इसलिए क्रियोपकारक है क्योंकि स्थाली क्रिया के फल के धारक ओदन (कर्म) को धारण करती है, अत: वह क्रिया से परोक्षतया सम्बद्ध है। एवमेव “असिना छिनत्ति” में असि-निष्ठ करणत्व शक्ति छेदन-क्रिया में कर्त्ता की सहायक होने से छेदन क्रिया से परोक्षत: सम्बद्ध है। तृतीय स्तर पर कर्त्ता, कर्म, करण, अधिकरण इन चारों को स्थान प्राप्त होता है।

चतुर्थ स्तर – अपादान व सम्प्रदान में क्रियोपकारकत्व न हो ऐसी स्थिति नहीं है, अपितु उपकार के तारतम्य के कारण किञ्चिद् अन्तर अवश्य है। कर्त्ता (अपादान की स्थिति में) या कर्म (सम्प्रदान की स्थिति में) के माध्यम से ये क्रियोपकारक हैं, अत: ये चतुर्थ स्तर पर कारकों में समाहित होते हैं।

सम्प्रदान एवं अपादान का कारकत्व

सम्प्रदान – सम्प्रदान क्रिया को परोक्षतया उपकृत करता है। यथा – “ब्राह्मणाय घटं देहि” में दान-क्रिया का फलाश्रय है, साथ ही यह ब्राह्मण को प्राप्त होनेवाले फल का साधन है। दान का कर्म घट है तथा घट का दान ब्राह्मण के फलप्राप्ति हेतु हो रहा है। इस प्रकार ब्राह्मण घट-कर्म के द्वारा दान-क्रिया के फल-सम्पादन में उपकारक है, अत: यह कारकों में स्थान प्राप्त करता है। यह सभी क्रियाओं से सम्बद्ध नहीं होता। वैय्याकरण निकाय इसे दानार्थक क्रियाओं तक ही सीमित मानता है। कतिपय विद्वान् अन्य धातुओं के साथ भी इसकी स्थिति को स्वीकार करते हैं, तथापि ऐसे धातुओं की सङ्ख्या सीमित ही है।

अपादान – यह भी परोक्षतया क्रियोपकारक है। प्रथमस्तु इसके स्वरूप को समझते हैं, तभी इसके कारकत्व को समझ पायेंगे। कर्त्ता में स्थित गति दो प्रकार की हैं – अन्तर्गत एवं बहिर्गत। बहिर्गत गति की स्थिति में विभाग तो होता ही है, जिसमें दो अनिवार्य तत्त्व होते हैं – १. गति का धारणकर्त्ता, २. वह पदार्थ जहाँ से गत्यारम्भ होता है। द्वितीय अवधि नाम से अभिहित होता है। इसके भी दो प्रकार हैं – १. कर्त्ता की गति में क्रियाशील, २. कर्त्ता की गति के प्रति उदासीन। क्रियाशील अवस्था में यह स्वयं भी कर्तृत्व प्राप्त करती है। यथा-“मेषावपसरत:” (दो भेड़े अलग हो रही हैं)[69]। उदासीन अवस्था में यह अवधि अपादान-कारक होती है। यथा – “वृक्षात् पत्रं पतति”। उदासीन अवधिभूत वृक्ष से कर्त्ता (पत्र) की गति प्रारम्भ होती है। इस प्रकार कर्त्ता के द्वारा निष्पन्न गतिक्रिया में अपादान उपकारक है[70]। यह सभी धातुओं के प्रयोग में नहीं होता, अपितु केवल विभागजनक धातुओं के योग में ही होता है। उसमें भी प्रयुक्त धातु का वाच्यार्थ विभाग न हो, यह आवश्यक है। यथा – “वृक्षं त्यजति” में त्यज् धातु का वाच्यार्थ विभाग है, अत: यहाँ अपादान नहीं हो सकता।

यद्यपि सम्प्रदान व अपादान को कारकों में परिगणित किया जाता है तथापि कतिपय स्थलों पर इनकी कारकता शङ्का की जाती है। इसके मुख्य कारण हैं –

  • प्रत्येक कारक में कर्तृत्व शक्ति भी होती है। तत्तत् कारकों की अविवक्षा में द्रव्यान्तर्निहित कर्तृत्व शक्ति अभिव्यक्त होती है। परन्तु सम्प्रदान व अपादान के साथ ऐसा नहीं है। “शृङ्गात् शरो जायते”, “अजाविलोमभ्यो दूर्वा जायते” इत्यादि स्थलों पर अपादान की अविवक्षा में “शृङ्गं शरो जायते” इस प्रकार दिखाया जाता है, वहाँ वस्तुत: अधिकरण कारक ही युक्तियुक्त है, किन्तु यह कहना युक्तिसङ्गत प्रतीत नहीं होता है कि पञ्चमी विधान मात्र के लिए यहाँ कारक की कल्पना की गई है। व्याकरण में अवधिरूप में स्थित रहना ही अपादान का व्यापार माना जाता है, अत: यह कारक है।
  • कर्त्ता, कर्म, करण, अधिकरण में यथा क्रिया सामान्य का बोधक कृ धातु अनुस्यूत है तद्वत् सम्प्रदान व अपादान में नहीं। वस्तुत: सम्प्रदान व अपादान नियत धातुओं के प्रयोग में ही कारक होते हैं। परन्तु इनकी कारकत्व पर आक्षेप हेतु यह कोई प्रबल युक्ति नहीं है, यतोहि कर्म कारक भी मात्र सकर्मक धातुओं तक ही सीमित है।
  • धातु से वाच्य क्रिया की वृत्ति उपर्युक्त चार कारकों में ही होती है,सम्प्रदान व अपादान में नहीं। धातु से अवाच्य होने का यह अर्थ नहीं कि उसमें क्रिया बोध ही नहीं होता हो। सम्प्रदान में अनुमति आदि देने का व्यापार व अपादान में अवधि-स्थित व्यापार तो है ही। व्यापार धातु से वाच्य ही हो, यह आवश्यक नहीं। प्रतीयमान व्यापार भी कारक व्यवहार का प्रयोजक है[71]

वस्तुत: सम्प्रदान व अपादान का कर्तृत्व हो सकता है, परन्तु वह लौकिक व्यवहार में प्रयुक्त नहीं होता है। महाभाष्यकार ने स्थालीपुलाक न्यायेन इसका वर्णन किया है[72]। कारक शब्द के दो खण्ड हैं – प्रकृति (कृ धातु) तथा प्रत्यय (ण्वुँल्-प्रत्यय कर्त्रर्थक)। यदि प्रत्ययार्थ पर बल देंगे तो इनके कारकत्व-उपस्थापन में कठिनता होगी, लेकिन प्रकृति पर ध्यान दें तो क्रिया से सम्बन्ध तो इनका भी है[73]

निष्कर्षत्वेन सम्प्रदान व अपादान भी कारक ही है। इन सभी कारकों का क्रम विभक्ति क्रमानुसार किया जाता है – कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण। पाणिनीय सूत्रपाठ में “विप्रतिषेध-परिभाषा”[74] के कारण अन्य क्रम स्वीकृत है। तदनुसार- अपादान, सम्प्रदान, करण, अधिकरण, कर्म व कर्त्ता। इसमें दो या अधिक कारकों के युगपत्-प्राप्ति वा तुल्यबल-विरोध पर परवर्ती कारक की प्रधानता होती है[75]

विवक्षात: कारकाणि[76]

यह एक ऐसा विषय है जो, यह स्वीकार करवाता है कि भाषा का प्रयोग लोक के अधीन है। कारकों का व्यवहार प्राय: वक्ता की विवक्षा पर निर्भर होता है, द्रव्य की स्थिति पर नहीं। व्याकरण के प्रायश: नियम उसके सामने विनत हैं।

विवक्षा एक लौकिक तत्त्व है। दृष्टार्थ अथवा लोकत: प्राप्त होने के कारण यह शास्त्र में विहित नहीं है। यतोहि विधान अदृष्टार्थ या अत्यन्त अप्राप्त विषय का होता है[77]। आचार्यों ने इस  लोक-विवक्षा के महत्त्व को ध्यान में रखकर ही भाषा-प्रयोगों का विश्लेषण किया हैं। शास्त्रों में यत्र-तत्र “विवक्षा भवति” “विवक्षा दृश्यते” आदि वाक्यों से इसका महत्त्व दृष्टिगोचर होता है।

महाभाष्यकार विवक्षा के विषय में कहते हैं कि कभी-कभी सत् पदार्थ की भी अविवक्षा होती है। यथा- अलोमिका एडका, अनुदरा कन्या। इसी प्रकार कभी-कभी असत् पदार्थ की भी विवक्षा होती है। यथा- समुद्र: कुण्डिका, विन्ध्यो वर्धितकम्[78]। भर्तृहरि ने वाक्यपदीयस्थ साधनसमुद्देशस्थ में विवक्षा का विस्तृत विवेचन किया है। उनके अनुसार अनेक धर्मों से युक्त यह विश्व समस्त शक्तियों का समूह है। ये शक्तियाँ सर्वत्र सर्वदा सर्वथा समुपलब्ध हैं, अत: एक समय में एक ही शक्ति विवक्षित होती है, जिसके कालभेद से भिन्न-भिन्न शक्तियों की विवक्षा सम्भव होती है[79]। कारक का व्यवहार बुद्धि की अवस्था पर निर्भर है। बुद्धि स्वकल्पना से विभिन्न रूप में पदार्थ को ग्रहण कर सकती है। यथा- घटोऽस्ति, घटमानय, घटेन सिञ्चति, घटात् जलं पतति, घटे जलं वर्तते[80] और उसी रूप में विवक्षित करती है। बुद्धि के द्वारा एक पदार्थ का भी भिन्नत्व सम्भव है तथा अनेक पदार्थों का भी एकत्व सम्भव है[81]

सभी कारक क्रिया-निष्पत्ति मात्र में कर्तृत्व-शक्ति धारण करते हैं, परन्तु उनके व्यापारों के भेद की विवक्षा होने पर करणत्वादि शक्तियों से सम्बद्ध होते हैं[82]। यथा- पुत्रोत्पत्ति में माता-पिता दोनों ही कर्त्ता हैं, परन्तु भेद-विवक्षा में कहा जाता है-(क) अयमस्यां पुत्रं जनयति व (ख) इयमस्माज्जनयति पुत्रं। अभेद विवक्षा में कहते हैं- “पितरौ जनयत:”[83]। इस प्रकार सभी कारक विवक्षा से (जो बुद्धि की अवस्था कही जा सकती है) प्रवृत्त होते हैं।

यह सत्य है कि विवक्षाधीन होने से कारकों में व्यत्यय देखा जाता है, तथापि इसके लिए प्रयोक्ता निरङ्कुश नहीं हो सकता। हृदयहारिणीकार के अनुसार विवक्षा में सर्वथा स्वेच्छाचार स्वीकार्य नहीं है। विवक्षा एक कुलवधू के समान होती है, जो कि स्वतन्त्र होने पर भी कभी-भी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करती। यथा अपादान की “धनुषा विध्यति” के रूप में विवक्षा स्वीकार्य है, परन्तु “धनुषो विध्यति” स्वीकार्य नहीं हो सकता[84]। विवक्षा के लिए तीन तथ्य सदैव स्मरणीय हैं-

  • शास्त्रोक्त कारक-विभक्ति के परिवर्तित करने पर भी अर्थ-परिवर्तन नहीं होना चाहिए। यथा- “ग्रामादागच्छति” की विवक्षा “ग्राममागच्छति” नहीं हो सकती।
  • पदों की प्रकृति में परिवर्तन नहीं होना चाहिए। यथा- “ग्रामादागच्छति” की विवक्षा “ग्रामं त्यजति” नहीं हो सकती, यतोहि दोनों की प्रकृतियाँ भिन्न हैं। समानार्थक प्रकृतियों के प्रयोग में कोई आपत्ति नहीं है।
  • यह केवल शिष्ट प्रयोगों पर ही आश्रित है। प्रमत्तों वा अवैय्याकरणों के अशिष्ट प्रयोगों को विवक्षित कहकर ग्रहण नहीं किया जा सकता।

विवक्षा का शास्त्रत्व व भेद –

पाणिनि तथा कात्यायन ने स्वपूर्ववर्ती विवक्षाओं को सूत्रों तथा वार्तिकों में समाहित कर लिया था, परन्तु परवर्ती काल के विवक्षा-आधारित कई नूतन प्रयोग इसमें समाविष्ट नहीं हो सके। भट्टोजिदीक्षित ने कई अशास्त्रीय-प्रयोग प्रौढमनोरमा तथा शब्दकौस्तुभ में चिन्त्य बतलाये हैं।

“ग्रामे वसति” में ग्राम अधिकरण है, परन्तु “ग्राममुपवसति” में उसी ग्राम की कर्मत्वेन विवक्षा शास्त्रीय रूप धारण कर लेती है[85]। इसी प्रकार “अकथितञ्च”[86] सूत्र में अनेक विवक्षाधीन प्रयोगों को शास्त्रीय रूप प्राप्त हुआ है। विवक्षा की स्थिति में उसका मूल प्रयोग व विवक्षित प्रयोग दोनों ही स्वीकार्य हो, यह आवश्यक नहीं है। यतोहि प्रायश: विवक्षास्थलों में मूल प्रयोग असाधुत्व को प्राप्त कर चुके हैं। यथा “गो: दोग्धि पय:” यह प्रयोग असाधु है।

कारक की विवक्षा के प्रमुखतया ४ भेद सम्भव हैं।

  • सभी कारकों में कर्तृत्व-विवक्षा- कर्म-ओदन: पच्यते स्वयमेव। करण- असिश्छिनत्ति। अपादान- बलाहको विद्योतते। अधिकरण- स्थाली पचति। सम्प्रदान का कर्तृत्व प्रसिद्ध नहीं है।
  • कर्मत्वेन विवक्षा – अपादानादि से अविवक्षित पदार्थों की कर्मत्वेन विवक्षा। यथा अपादान- गां दोग्धि पय:। सम्प्रदान- माणवकं धर्मं ब्रूते।
  • सम्बन्धत्वेन विवक्षा- मातु: स्मरति।
  • सभी कारकों की व्यत्यय विवक्षा- यथा

“यश्चाप्सरोविभ्रममण्डनानां सम्पादयित्रीं शिखरैर्बिभर्ति”।   -कुमारसम्भव, १-।

“मध्येन सा वेदिविलग्नमध्या वलित्रयं चारु बभार बाला”।  – कुमारसम्भव, १-३९।

“गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम्। – किरातार्जुनीय, १-२१।

इन उदाहरणों में गति या प्रापण अर्थ नहीं है, जो कि करणत्व का अवकाश हो। वस्तुत: यहाँ अधिकरण प्राप्त था, तथापि शिष्टों की विवक्षा के कारण करणत्व विवक्षित है। इस प्रकार विवक्षा का प्रभाव सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।

विवक्षाधीन यह साधन-व्यवस्था व्याकरण की लोकोपयोगिता को ही प्रस्तुत कर रही है, जिससे व्याकरण का लोकोपकारकत्व सर्वथा सिद्ध है।

सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची

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[1] “इदमन्धन्तम: कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम् ……. – काव्यादर्श, १-५।

[2] “इह शिष्टानुशिष्टानां ………वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते”॥   – वहीं, १-३।

[3] व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति व्याकरणम् ।   -व्या.म., पस्पशाह्निक।

[4] “मुखं व्याकरणं स्मृतम्” । – पाणिनीय शिक्षा ४१-४२।

[5] प्रधानं च षट्स्वङ्गेषु व्याकरणम्” । व्या.म., पस्पशाह्निक।

[6] “एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुष्ठु प्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति”।

[7] “यस्तु प्रयुङ्क्ते कुशलो विशेषे शब्दान् यथावद् व्यवहारकाले।

सोऽन्तमाप्नोति जयं परत्र वाग्योगविद् दुष्यति चापशब्दै:”॥    – व्या.म., पस्पशाह्निक।

[8] “व्याकरणात्पदसिद्धि: पदसिद्धेरर्थनिर्णयो भवति।

अर्थात्तत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानात् परं श्रेय:”॥     – सिद्धहैमशब्दानुशासन, प्रथम अध्याय, पृ. ७।

[9] “तत्त्वावबोध: शब्दानां नास्ति व्याकरणादृते”।    – वा.प. १-१३।

[10] “उपासनीयं यत्नेन शास्त्रं व्याकरणं महत्।

प्रदीपभूतं सर्वासां विद्यानां यदवस्थितम्”॥     – पदमञ्जरी, ‘अथ शब्दानुशासनम्’ की व्याख्या में उद्धृत।

[11] “पवित्रं सर्वविद्यानामधिविद्यं प्रकाशते”।     – वा.प. १-१४।

[12] “रूपान्तरेण ते देवा विचरन्ति महीतले।

ये व्याकरणसंस्कारपवित्रितमुखाः नराः”॥       – पदमञ्जरी, ‘अथ शब्दानुशासनम्’ की व्याख्या में उद्धृत।

[13] “आसन्नं ब्रह्मणस्तस्य तपसामुत्तमं तपः”।       -वा. प.१-११।

[14] “तद्द्वारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम्”।     -वा.प. १-१४।

[15] “यत्तत्पुण्यतमं ज्योतिस्तस्य मार्गोऽयमाञ्जसः।    – वा.प. १-१२।

[16] “इदमाद्यं पदस्थानं सिद्धिसोपानपर्वणाम्।

इयं सा मोक्षमाणानामजिह्मा राजपद्धतिः”॥   -वा.प. १-१६।

[17] (क)“तत्र सर्वकारकाणां धात्वर्थेऽन्वयः”।  – ल. मं., पृ. ५४४ ।

(ख) “सर्वकारकान्वययितावच्छेदकधर्मवती क्रिया”। – प. ल. मं., पृ. १३४ ।

[18] “भूवादयो धातव:”।   – अ., १-३-१ ।

[19]  ल. मं., पृ. ५४४ ।

[20] व्या. म., १-३-१ ।

[21] “इह सर्वेषु साधनेषु सन्निहितेषु कदाचित्पचतीत्येतद् भवति, कदाचिन्न भवति। यस्मिन्सन्निहिते पचतीत्येतद् भवति सा नूनं क्रिया। अथवा, यया देवदत्त इह भूत्वा पाटलिपुत्रे भवति, सा नूनं क्रिया”।   – व्या. म., १-३-१ ।

[22] “सुप्तिङन्तं पदम्” । अ.,१-४-१४ ।

[23] “अपदं न प्रयुञ्जीत”।  – वै. भू. सा., ना. नि., पृ. २६१।

[24] “कारकाणां प्रवृत्तिविशेषः क्रियाः। – व्या.म., पृ. १२३ ।

[25] “एकतिङ् वाक्यम्”।   – व्या. म., पृ. ४४।

[26] “मधुपर्कः मधुपर्कः मधुपर्कः इत्याचार्येणोक्तेः, मधुपर्कः प्रतिगृह्यतामिति पिता ब्रूयात्,

मधुपर्क प्रतिगृह्णामीति वरो ब्रूयात्”।   – आ. गृ., १-२४-७ ।

[27] “सुपां कर्मादयोऽप्यर्थाः संख्य चैव तथा तिङाम्।

प्रसिद्धो नियमस्तत्र नियमः प्रकृतेषु च”॥         – व्या. म., १-४-२१ में उद्धृत।

[28] “आश्रयोऽवधिरुद्देश्यः सम्बन्धः शक्तिरेव वा।

यथायथं विभक्त्यर्थाः सुपां कर्मेति भाष्यतः”॥     – वै. भू., कारिका- २४।

[29] द्र. – वै.भू. सा., सु.नि., पृ. १६८- २३१।

[30] द्र.- “विभक्त्यादिभिरेवासावुपकारः प्रतीयते” – वा. प., सा. स., कारिका-१३ की व्याख्या,

हेलाराज की प्रकाश टीका।

[31] “शताच्च ठन्यतावशते”।      – अ., ५-१-२१।

[32] “सप्तम्यास्त्रल्” ।          – वही, ५-३-१०।

[33] ’भिय: षुग् वा”।       – उ. को., १-१४८।

[34] “तव्यत्तव्यानीयर:”।      -अ., ३-१-९६।

[35] अ., ३-१-१३३।

[36] “इह हि व्याकरणे ये वैते लोके प्रतीतपदार्थकाः शब्दास्तैर्निर्देशाः क्रियन्ते-पशुरपत्यं देवतेति, या वैताः

कृत्रिमाष्टि-घु-घ-भादिसञ्ज्ञास्ताभिः”।  -व्या. म., १-४-२३, पृ. ३४४।

[37]  व्या. म., १-४-२३, पृ. ३४८।

[38] वही., १-४-२३, पृ. ३४४।

[39] वही, १-४-२३, पृ. ३४४।

[40] वही, १-४-२३, पृ. ३४४।

[41] “इतरथा ह्यनिष्टप्रसङ्गों ग्रामस्य समीपादागच्छतीत्यकारकस्य”।  – व्या.म., १-४-२३, पृ. ३४५।

[42] “कर्मसंज्ञाप्रसङ्गोऽकथितस्य ब्राह्मणस्य पुत्रं पन्थानं पृच्छतीति”।     – वही, १-४-२३, पृ. ३४६।

[43] “अपादानं च वृक्षस्य पर्णं पततीति”।  – वही, १-४-२३, पृ.३४६।

[44] “न वाऽपायस्याऽविवक्षितत्त्वात्”।   – वही, १-४-२३, पृ.३४६।

[45] “कारक इति महती संज्ञा क्रियते। संज्ञा च नाम यतो न लघीयः। कुत एतत्? लघ्वर्थं हि संज्ञाकरणम्। तत्र महत्याः करण एतत्प्रयोजनम्- अन्वर्थसंज्ञा यथा विज्ञायेत – “करोतीति कारकमीति।  –  वही, १-४-२३, पृ. ३४७।

[46] “अन्वर्थमिति चेदकर्तरि कर्तृशब्दानुपपत्ति:”।  –   व्या. म., १-४-२३, पृ.३४८।

[47] “द्रोणं पचत्याढकं पचतीति सम्भवनक्रिया धारणक्रिया चाऽधिकरणस्य पाकः”।  –  वही, १-४-२३ ।

[48] “ एधाः पक्ष्यन्त्याऽविक्लित्तेर्ज्वलिष्यन्तीति ज्वलनक्रिया करणस्य पाकः”। –  व्या. म., १-४-२३, पृ. ३४९।

[49] (क) “न वा स्वतन्त्रपरतन्त्रत्वात्तयो: पर्यायेण वचनं वचनश्रया च संज्ञा”।  –  वही, १-४-२३, पृ. ३५०।

(ख) “निष्पत्तिमात्रे कर्तृत्वं सर्वत्रैवास्ति कारके…..।   –   वा. प., सा. स.-१८ ।

(ग) “करणत्वादिभिर्ज्ञाता: क्रियाभेदानुपातिभि:।

स्वातन्त्रमुत्तरं लब्धा प्रधाने यान्ति कर्तृताम”॥  –  वही, सा.स. – २१।

[50] व्याकरणदर्शनभूमिका, पृ. २१६ ।

[51] वा.प., सा.स. – १।

[52] “तत्र कर्तृकर्मणोः क्रिया समवैतीति स्वाश्रयसमवेतक्रियानिष्पत्तौ तयोः कारकता। करणादीनां तु पराश्रयसमवेतायां क्रियायां साधनभावः। न हि करणादिषु क्रिया समवैति”। – हेलाराज, पृ. २३१।

[53] “सामान्यं च कारकाणां क्रियानिमित्तत्वम्”। – न्यायवार्तिक, २-१-१६, पृ. १८९

[54] “क्रियानिमित्तं कारकं लोकत: सिद्धम्”॥ – वृत्ति, कलाप व्याकरण, २-२-६२, पृ. ६६ ।

[55] “क्रियानिमित्तस्य च कारकत्वात्”। – न्या.वा.ता.टी., २-२६२, पृ. ६६२ ।

[56] (क) क्रियानिमित्तं कारकम्।     – सर.कं. १-१-३२।

(ख) क्रियानिमित्तं कारकम्।   – शृं.प्र., द्वितीय प्रकाश, पृ. ४२।

[57] “क्रिया धात्वर्थ उच्यते”। – कारकोल्लास. का.-२, पृ.१।

[58] “फलावच्छिन्ने व्यापारे …..धातूनां शक्ति:”। – प.ल.मं., धा.नि., पृ.-१२३।

[59] “ग्रामं गच्छतीत्यादौ गमधात्वर्थसंयोगावच्छिन्नक्रियाया: कारणत्वाभावेऽपि धात्वर्थतावच्छेदकीभूतसंयोगकारणत्वमादाय

ग्रामादेः कारकत्वम्”।      – माधवी, का.च., पृ.१।

[60] “फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः।

फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम्।    – वै.भू., कारिका -२।

[61] केचित्तु, संयोगादिः क्रिया च उभयमेव गम्यादिधात्वर्थः। तथा च संयोगरूपधात्वर्थकारणत्वमादाय

यथाश्रुतमेव सम्यगित्याहुः”।    –  माधवी, का.च., पृ.२।

[62] श.श.प्र.,

[63] “यद्धातूपस्थाप्ययादृशार्थेऽन्वयप्रकारीभूय भासते य: सुबर्थ: स तद्धातूपस्थाप्यतादृशक्रियायां कारकम्”।

  • श.श.प्र., पृ. २९४

[64] द्र. – वि.नि., पृ. २-३ ।

[65]  “द्रव्याकारादिभेदेन ताश्चापरिमिता इव।

दृश्यन्ते तत्त्वमासां तु षट् शक्तीर्नातिवर्तते”॥       – वा.प., सा.स., कारिका ३६।

[66] “कर्त्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च।

अपादानाधिकरणे इत्याहु: कारकाणि षट्”॥ – अम्बाकर्त्री, वा.प., सा.स. कारिका -३५।

[67] (क) “निष्पत्तिमात्रे कर्तृत्वं सर्वत्रैवास्ति कारके……।  – वा. प., सा.स., कारिका १८।

(ख) “निमित्तभेदादेकैव….- वही, सा.स., कारिका ३७।

[68] “ गुणक्रियाणां कर्तार: कर्त्रा न्यक्कृतशक्तय:।

………. कर्तृत्वं करणादित्वैरुत्तरं न विरुध्यते”॥   – वही, सा.स., कारिका २०,२१,२२,२३।

[69]  “उभावप्यध्रुवौ मेषौ यद्यप्युभयकर्मजे।

विभागे प्रविभक्ते तु क्रिये तत्र विवक्षिते॥

मेषान्तरक्रियापेक्षमवधित्वं पृथक् पृथक्।

मेषयो: स्वक्रियापेक्षं कर्तृत्वं च पृथक् पृथक्॥  – वा.प., सा.स., कारिका १४०,१४१ ।

[70] R. C. Pandey, problem of Meaning in Indian Philosophy, p. 144

[71] “ शब्दशक्तिस्वाभाव्याच्चापादानसम्प्रदानव्यापारे धातुर्न वर्तते। वस्तुतस्त्वपादानस्यावधिभावेनावस्थानं व्यापारोऽस्ति, सम्प्रदानस्याप्यनुमननादिलक्षण:। प्रतीयमानोऽपि व्यापार: कारकव्यपदेशनिबन्धनम्। यथा – प्रविश पिण्डीमिति।

  • कैय्यटकृत प्रदीप २, पृ. ३४४ ।

[72] “तद्यथा- बलाहकाद्विद्योतते (विद्युत्), बलाहके विद्योतते, बलाहको विद्योतत इति।…………… न ब्रूमोऽपादानादीनां कर्तृत्वस्याऽप्रसिद्धिरिति। पर्याप्तं करणाधिकरणयो: कर्तृत्वं निदर्शितमपादानादीनां कर्तृत्वनिदर्शनाय। पर्याप्तो ह्येक: पुलाक: स्थाल्या निदर्शनाय”।    – व्या. म. १-४-२३। पृ. १०२६।

[73]  नागेशभट्टकृत उद्योत २, पृ. २४४ ।

[74]  “विप्रतिषेधे परं कार्यम्” । अ. १-४-२ ।

[75] “अपादानसम्प्रदानकारकाणाधारकर्मणाम्।

कर्तुश्चोभयसम्प्राप्तौ परमेव प्रवर्तते॥        – शब्दशक्तिप्रकाशिका में पृ. ३४५ पर भर्तृहरि के नाम से उद्धृत।

[76] सर. कं. १-२-६३।

[77](क) द्र.- “अदृष्टार्था त्वधीतिर्विहितत्त्वात्” – सायणकृत ऋग्भाष्यभूमिका, स्वाध्याय प्रकरण, पृ…..

(ख) विधिरत्यन्तमप्राप्ते”।            – अर्थसंग्रह, पृ. १२४।

[78] “ सतोऽप्यविवक्षा भवति, तद्यथा- अलोमिकैडका, अनुदरा कन्येति। असतश्च विवक्षा भवति- “समुद्र: कुण्डिका, विन्ध्यो वर्धितकमिति”।                          – व्या.म., १-४-२४, पृ.३६० ।

[79] “ शक्तिमात्रासमूहस्य विश्वस्यानेकधर्मण:।

सर्वदा सर्वथा भावात् क्वचित् किञ्चिद् विवक्ष्यते”॥                -वा.प., सा.स., कारिका-२।

[80] “साधनं व्यवहारश्च बुद्ध्यवस्थानिबन्धन:।

सन्नसन्वार्थरूपेषु भेदो बुद्ध्या प्रकल्पते॥               – वही, कारिका- ३।

[81] “बुद्ध्यैकं भिद्यते भिन्नमेकत्वं चोपगच्छति”।     – हेलाराज, वही, कारिका- ३।

[82] “निष्पत्तिमात्रे कर्तृत्वं सर्वत्रैवास्ति कारके।

व्यापारभेदापेक्षायां करणत्वादिसम्भव:॥            – वा.प., सा.स., कारिका-१८।

[83] “पुत्रस्य जन्मनि यथा पित्रो: कर्तृत्वमुच्यते।

अयमस्यामियं त्वस्मादिति भेदो विवक्षया॥          – वही, कारिका- १९।

[84] “विवक्षा च कुलवधूरिव, न लौकिकीं प्रयोगमर्यादामतिक्रामति।…….विवक्षायाश्च नियतत्वात् सत्यप्यपाये धनुषा विध्यतीत्येव,

न धनुषो विध्यतीति”।    – हृद.हा,  सर.कं., १-२-६३।

[85] “उपान्वध्याङ्वस:”।     -अ,, १-४-४८।

[86]  अ., १-४-५१।

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