काश्मीर शैवदर्शन में नाद और बिन्दु के सिद्धान्त की अवधारणा 4.29/5 (7)

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PARDEEP (Research Scholar)
Special Centre for Sanskrit Studies
Jawaharlal Nehru University, New Delhi
E.Mail id – pardeepjnu08@gmail.com

Abstract (संक्षिप्तिका) :- भारतीय ज्ञान के अन्तरिक्ष में नाद और बिन्दु का सिद्धान्त विद्वानों को मौन कर देता है यह सिद्धान्त अत्यन्त साधनापरक एवं रहस्यात्मक है। काश्मीर शैवदर्शन में नाद-बिन्दु का सिद्धान्त सभी आचार्यों को नादानुसंधान करने पर बल प्रदान करता है। इस ज्ञानपरम्परा में शिव और शक्ति का प्रथम विकास ही नाद माना गया है। शिव और शक्ति के संयोग से सृष्टि प्रादुर्भाव होता है। यहाँ पर शिव और शक्ति दोनों के पारस्परिक संयोग से नाद उत्पन्न होता है। जब शिव और शक्ति स्थिर शक्ति से क्रियात्मक रूप में रुपान्तरित होने लगते हैं तब नाद का उदय होता है। उसमें विकास की चेतना जाग्रत होती है। अत: नाद को क्रियात्मक रूप माना जाता है। इससे समस्त विश्व का विकास होता है। शिव-शक्ति का नादोद्भव भी तभी होता है जब उसमें विकास की चेतनता जागृत होती है। यह साधना और अनुभूति का विषय है। प्रस्तुत शोधपत्र में काश्मीर शैवदर्शन में वर्णित नाद और बिन्दु के सिद्धान्त की अवधारणा का विविध पक्षों सहित संक्षिप्त वर्णन किया गया है।

Key-Words (संकेतक) :- नाद , बिन्दु, नाद का अनुभव, ध्वनि स्फोट, वाक्चतुष्टय, नाद के अवयव, नाद एवं त्रिकूट मात्रा काल का वर्णन इत्यादि ।

Subject (विषय वस्तु) :- भारतीय ज्ञान परम्परा में नाद और बिन्दु के सिद्धान्त का वर्णन प्रायश: सभी ग्रन्थों में परिलक्षित होता है। वैदिक साहित्य से लेकर आधुनिक संस्कृत ग्रन्थों में इसके संदर्भ में विस्तार से वर्णन मिलता है। भारतीय दर्शन के ज्ञान की अन्यतम विधा काश्मीर शैवदर्शन में नाद और बिन्दु को सृष्टि का मूल कारण माना गया है। अत: सर्वप्रथम इसका विवेचन यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

नाद का आविर्भाव :- काश्मीर शैवदर्शन के मतानुसार प्रकाशबिन्दु के विमर्श बिन्दु में प्रविष्ट होने पर उच्छन होता है। अत: बिन्दु से नाद का आविर्भाव होता है। समस्त तत्त्वसमुदाय इसी नाद में स्थित है। यही नाद व्यक्तावस्था में त्रिकोण का रूप ग्रहण करता है। इस त्रिकोण का एक कोण प्रकाश और एक कोण विमर्श है । इन दोनों के सयोंग से रवि या काम या मिश्रबिन्दु उदित होता है। अग्नि और चन्द्र इसी काम् अकी कलाएँ हैं। अर्थात् स्पष्ट है कि कामकला प्रकाश, विमर्श और काम (रवि) इन त्रिविध अवयवों को द्योतित करता है।

सृष्टि के विकास में कामकला अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रकाश , विमर्श और काम इस त्रिकोणात्मक पद्धति के द्वारा सृष्टि का विकास हुआ है। यही कामकला सृष्ट की अवधारणा का अभिप्राय है। इसका तृतीय रूप मन्त्रात्मक है। अत: हंस की त्रिकोणात्मक कामकला है। कामकला ही मन्त्रों का मूल है। शब्दब्रह्म अपनी शक्तियों के साथ जिस स्वरूप को बोधित करता है वही है सर्वोच्य त्रिकोणरूप कामकला। इस कामकला की अभिव्यक्ति में तीन दशाएँ है- १.इच्छा २. ज्ञान ३. क्रिया। इस कामकला के द्वारा सृष्टि प्रक्रिया में बिन्दु अपनी महत्त्वपुर्ण निभाता है। समस्त सृष्टि का मूल बिन्दु है।

इसका विवेचन तन्त्रशास्त्र, योगशास्त्र एवं व्याकरणशास्त्र, नाथ-सम्प्रदाय,सिद्ध साहित्य एवं सन्तसाहित्य तथा बौद्ध दर्शन , जैनदर्शन की समस्त शाखाओं में नाद और बिन्दु का बार बार उल्लेख मिलता है। कामकलाविलास एवं अन्य श्री सम्प्रदायों के ग्रन्थों में बिन्दु ही सर्वस्व है। क्योंकि बिन्दु का विस्तार ही ‘श्रीचक्र’ है।

नाद का उद्भव स्थान :- साधना अवस्था में जब साधक निरन्तर अभ्यास करत है तब उसको शरीर की सभी ग्रन्थियों का भेदन करना पड़ता है। जिसमें सर्वप्रथम वह प्राण के द्वारा हृदयकमल की ग्रन्थि का भेदन करता है। इस ग्रन्थि का भेदन होते ही आकाश के समायोग से साधक के अन्दर अकार आदि कला रूप शब्द उत्पन्न होकर वह साधक के अन्दर ही अन्दर उपांशुरूप में स्पष्ट सुनाई देता है।

नाद का प्रारम्भ एवं अनुभव :- इसका स्वरूप घोष के समान होता है। जैसे कान में ऊँगली ड़ालने पर जलती हुई आग के शब्द के समान धक् धक् शब्द उत्पन्न होता है। वह नाद घोष कहा जाता है। जब वह कण्ठ को प्राप्त करके कण्ठस्थ हो जाता है तब वह शान्त हो जाता है। कण्ठप्रदेश का भेदन करने पर यह धुक् धुक् शब्द का आकार ग्रहण कर लेता है। जब यह प्राण तालु को प्राप्त करता हुआ तालु ग्रन्थि का भेदन कर लेने पर घुम् घुम् का आकार ग्रहण कर लेता है। यहाँ तीन ग्रन्थियों के भेदन से यह शब्द आठ कलाओं को ग्रहण कर लेता है। जिनमें घोष,राव,स्वन,शब्द, स्फोट, ध्वनि,झाङ्कार और ध्वङ्कृत रूपों वाला होता है। जब प्राण जहाँ स्थित होता है, आत्मा उसकी गति को प्राप्त करता है। स्थान विशेष होने के कारण आत्मा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र के द्वारा हृदय , कण्ठ और तालु में सृष्टि, स्थिति और संहाररूपता का अनुभव करता है।

जब यह प्राण साधक की भौहों के मध्य में पहुँचता है तब स्फोट शब्द होता है। जब यह बिन्दु का भेदन करता है तब साधक को आन्तरिक अवस्था में घुम् घुम् शब्द सुनाई पड़ता है। साधक की यह सर्वाधिक सावधानी पूर्वक वाली अवस्था होती है। इसके बाद साधक अर्धचन्द्र का भेदन करता है तब उसको ललाट में झिम् झिम् शब्द सुनाई पड़ता है। आत्मा भी स्थानविशेष होने कारण उस उस गति को प्राप्त करता है। इसके बाद रोधनी का भेदन करने पर विद्वान् नाद भूमि में पहुँचता है। वहाँ उसको बाँसुरी के समान सूक्ष्म शब्द सुनाई पड़ता है और अब साधक ब्रह्मरन्ध्र का भेदन करता है।

यहाँ ब्रह्मरन्ध्र भेदन करने पर साधक को शुम् शुम् जैसा शब्द सुनाई देता है। जब यह प्राण शक्ति के मध्य चला जात है, तब वंशी के नादान्त के समान ध्वनि का साधक अनुभव करता है। शक्ति के भेदन से यह शुम् शुम् की ध्वनि निरन्तर गतिमान् होती है। यह व्यापिनी का भेदन करने पर सम्पूर्ण शरीर में चींटी के स्पर्श सञ्चरण जैसा अनुभव होता है। इस प्रकार समना में पहुँचने के बाद मन का परित्याग हो जाता है और साधक कैवल्य को प्राप्त कर लेता है।

सभी बन्धनों से मुक्त होकर परम तेज को व्यक्त कर साधक शिवरूप हो जाता है- “तत्रस्थो व्यञ्जयेत्तेज: परम् कारणम्। परस्मिं स्तेजसि व्यक्ते तत्रस्थ शिवतां व्रजेत्”॥ इस प्रकार वह स्वयं अनुभव करता है- “अहमेव परो हंस:, शिव: परमकारणम्”। इस साधना पथ पर सभी समान है। कोई भी शिवभक्त इस साधना को कर सकता है- “ब्राह्मणा: क्षित्रिया वैश्या: शूद्रा वै वीरवन्दिते। आचार्यत्वे नियुक्ता ये ते सर्वे तु शिवा स्मृता:”॥ अर्थात् जो भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आचार्यपद पर नियुक्त होते है वे सब शिव माने गये हैं।

प्रथम स्वरूप का स्पष्टीकरण :- नाद ही घनत्व को प्राप्त करके बिन्दु के रूप में परिवर्तित होता है- “नाद एवघनीभूयक्वचिदभ्येति बिन्दुताम्”। यहाँ पर परबिन्दु शक्ति की घनावस्था है। यह चिद्घन् है। परबिन्दु (पराशक्ति का समवेत बिन्दु) स्वयं को तीन रूपों में विभक्त करता है-१. बिन्दु २. नाद ३. बीज । इनमें बिन्दु शिव का स्वभाव या प्रकृति है, बीज शक्ति का स्वभाव या प्रकृति है तथा नाद शिव-शक्ति दोनों है, शिव शक्ति का समवाय है। अर्थात् स्पष्ट है- बिन्दु शिवात्मक है, बीज शक्त्यात्मक है और नाद इन दोनों का अंतर्सम्बन्ध है। शारदातिलकम् में भी कहा गया है-
“परशक्तिमय: साक्षात् त्रिद्वासौ भिद्यते पुन:।
बिन्दुर्नादो बीजमिति तस्य भेद: समीरित:॥
बिन्दु: शिवात्मको बीजं शक्तिर्नादस्तयोर्मिथ:।
समवाय: समाख्यात: सर्वागम: विशारदै:”॥
यहाँ स्पष्ट कहा गया है- नित्य शिव निर्गुण और सगुण दोनों है। निर्गुण शिव की तीन बिन्दुओं की उत्पत्ति होती है-१.ब्रह्म बिन्दु २.विष्णु बिन्दु ३. रुद्रबिन्दु॥
इसी प्रकार से प्रयोगसार एवं शारदातिलक में अन्य विवेचन में कहा गया है कि- बिन्दु से रौद्री, नाद से ज्येष्ठा एवं बीज से वामा का विकास हुआ है। इनसे ही रुद्र,विष्णु और ब्रह्म का जन्म हुआ है। ये ज्ञान क्रिया और इच्छा एवं चन्द्रमा-सूर्य-अग्नि का समस्वभाव है। तीन बिन्दु निम्न है- १.रवि २.चन्द्र ३.अग्नि । यहाँ पर सूर्य में अग्नि और चन्द्रमा स्थित है। इसे ही मिश्र बिन्दु कहते है। इसे परमशिव से पृथक् नही किया जा सकता है। यही कामकला है।
द्वितीय स्वरूप का स्पष्टीकरण में ध्वनि रूप स्फोट तथा नाद बिन्दु का वर्णन :- शिव की यह शक्ति शिवात्मिका जगत् की कारणभूता एक होते हुए भी अनेकविध स्वरूपों में स्वयं को धारण कर लेती है। शिव शक्ति अभेद हैं। शिव एक है और शाश्वती शक्ति भी एक है। वह शिव में अभिन्न और अद्वैतरूप में स्थित रहने वाली तथा समुदायनी है। इसको परमाशक्ति, वाड्मयरूपा एवं शिवरूपा कही जाती है। साधना के समय यह कुण्ड़नी शक्ति का रूप भी धारण करती है। साधक इसका अनुभव करता है। शिव के द्वारा सृष्टि सृजन होता है। साधक भी उसकी भक्ति में लीन रहता है। वह ध्वनिरूप स्फोट का वेग से अपने शरीर में अनुभव करते हैं। ध्वनिरूप स्फोट जब अदृश्य शिवशरीर से अत्यन्त वेग के साथ ध्वनि के द्वारा संसार को पूर्णतया पूरित करता हुआ प्रसरण करता है तब वह नादरूपी देवाधिदेव सदाशिव कहा जाता है।
यह नाद भट्टारक अहन्ता और इदन्ता के स्वभाविक विमर्श वाले चित् प्रकाश रूप को धारण करता है, तब नाद कलाता है। यहाँ सदाशिव में नादान्त भी अनुप्रविष्ट है। यह ध्वनि अध्वा रहने वाली तथा बिना किसी निरोध के प्रसृत होने वाली शक्ति या भूमिका निरोधनी शक्ति कहलाती है। यह सब देवों की निरोधिका है। जो साधक रोधनी में प्रवेश कर लेते हैं। यहाँ असंख्य करोड़ मन्त्र स्थित होते हैं। यह ध्वनि मात्र से लेकर नादपर्यन्त व्याप्त निरोधिका नामक मान्त्री कला है। यहाँ जो बिन्दु है वह ईश्वर माना गया है।

पराशक्ति इच्छाशक्ति की व्याप्ति के द्वारा समना से लेकर शक्तितत्त्व पर्यन्त पद का उन्मीलन करके ज्ञानशक्ति की व्याप्ति के द्वारा शक्तिप्राधान्य का उन्मीलन करती हुई समस्त वाचकों के अभेद वाले नादामर्शमयता को और केवल ध्वनिरूप नादान्त व्याप्ति की आभासता को निरुद्ध करके समग्र वाच्य के अभेदप्रकाशरूप स्फुट इदन्ता और अहन्ता का ऐक्य विमर्शवाला ईश्वर रूप बिन्दु हो जाती है। इसके उपर शिवामृत से अर्धचन्द्र बन जाता है। सृष्टि का कारणभूत शिवात्मा जब बिन्दु के शिर पर गिरता है और उस अमृत से (वह बिन्दु) आप्यायित होता है तब वह बिन्दु अर्धचन्द्र कहा जाता है।
नाद से नीचे वाले सृष्टि का कारण बनते हैं। यह बिन्दु मकार हो जाता है। यह रुद्र अधिष्ठाता है। यह उत्तम वर्णसंघट्ट है। जब स्वोन्मुखी रूप में स्थित होती है तब वह सृष्टि का कारण बनती है। तब यह प्रतिष्ठा नाम उकार साक्षाद् विष्णु हो जाता है। इसी क्रम में जब सब कुछ रचित हो जाता है तो विभु (परमेश्वर) अकार नामक पर धाम हो जाता है। वहीं कमलासन ब्रह्मा हो जाता है। यही परमात्मा की मन्त्र सृष्टि है। सम्पूर्ण मन्त्र सृष्टि का स्वामी परमेश्वर है। यही प्रणव रूप धारण करके प्राणियों का प्राण बन जाता है।
प्रणव की कलाओं के साथ सभी का ग्रहण होता है। वही शिव की कलना (विमर्श) करता है। इसके बाद छ: कारणपदों में स्थित होकर समस्त महा अध्वा को जुंकार से प्रेरित करके विद्या के द्वारा परमधाम रूपी महा अनल में हवन करता है। सम्यक् संतृप्त वाला, समस्त अमृत पद का आधार और स्वसंवेद्य जो स्वरूप है , वही विसर्ग के साथ होने पर परमशिव हो जाता है।
वह परम शिव पूर्णाहुति के द्वारा पूर्ण विश्व को निरन्तर आभासित करता रहता है। प्रणव ऊँकार में मन्त्र,वर्ण, पद,कला और तत्त्व , भुवन ये छ: अध्वा और ब्रह्मा, विष्णु,रुद्र,ईश्वर, सदाशिव और शिव ये छ: ऊँ में स्थित है।
तृतीय स्वरूप का स्पष्टीकरण (नाद एवं वाक्चतुष्टय) :- इन्होंने मातृका, पश्यन्ती और मध्यमा की व्याख्या करते हुए कहा है- “मातृका-माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या मातृकेत्युच्यते। तस्यां च निर्विकारायामप्यनादि सिद्धप्राण्यदृष्टवशात् स्वान्त: संहृत विश्वसिसृक्षोत्पद्यते। तत: स्रष्टव्यपदार्थानालीचयति तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय”।
पश्यन्ती :- परमात्मा “बहुस्यां प्रजायेय” जो ईक्षण करता है उसी की परणति पश्यन्ती है। यह पश्यन्ती उतीर्णा भी कही जाती है। यह पश्यन्ती व्यष्टि-समष्टि रूप से नौ प्रकार(नव नाद) की है। इसकी समष्टि नाद, ध्वनि आदि कही जाती है। यहाँ पर नव नाद एवं वर्णमाला में भी वैखरी स्वरूप स्पष्ट होता है। नव नाद वर्णमाला की व्युतपत्ति इन्ही नौ नादों (क च ट त प य श ल ख ) से उत्पन्न होती है। इनसे ही वैखरी वाक् उत्पन्न होता है।
वाक् तत्त्व का स्वरूप एवं व्याख्या वर्णन :- स्वयं की मूल प्रकृति में चित्शक्ति मात्र ही वाक् है। यह बिन्दु की शब्दात्मिका वृत्ति चतुष्ट्यात्मिका है- वैखरी, मध्यमा , पश्यन्ती और परा रूप में स्थित है। यह बिन्दुरूपी रत्नाकार से उठती हुई तरगों में बाह्यात्मना नाद एवं ज्योति के रूप में उदित होती है। यहाँ नाद वाक् के रूप में और ज्योति अर्थ के रूप में प्रकट होती है।
वाक् एवं अर्थ संश्लिष्ट रहते हैं। इनमें प्रत्येक अवस्था त्र्यात्मक होता है- परम , सूक्ष्म और स्थूल । इस प्रकार बिन्दु से वाक् की गतियात्रा में चतुर्विध स्वरूप उभरते हैं , जिनको परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी के नाम से जाना जाता है। वाक् तत्त्व के मूल में चिति शक्ति है। यह संविद् ही प्राणों के द्वारा वाग् रूप धारण करती है। संविद् के आरोहण से चतुर्विध वाणियों का उदय होता है। संविद् सर्वमय है और वाक् का भी मूल संविद् है ।
चतुर्थ स्वरूप का स्पष्टीकरण नाद के नौ अवयवों का स्वरूप :- प्रणव के नौ अवयवों में नाद का महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इन सभी का विस्तार वर्णन इस प्रकार है।
1.बिन्दु का स्वरूप :- आज्ञाचक्र के ऊर्ध्व में बिन्दु का स्थान है। बिन्दु ही योगियों का तृतीय नेत्र या आज्ञाचक्षु है। इसी स्थान से ज्ञानभूमि की सूचना प्राप्त होती है। जब तक चित्त को एकाग्र करके उपसंहृत न किया जाय तब बिन्दु में प्रवेश पाना असंभव है क्योंकि विक्षिप्त अवस्था में बिन्दु स्थान में स्थिति संभव नही है। इस भूमि में साधक अहंभाव युक्त होकर और द्रष्टा बनकर निम्नवर्ती संसार को तटस्थ दृष्टि से देख सकता है किन्तु बिन्दु में अहंभाव के पूर्ण समर्पण या विसर्जन के पूर्व महाबिन्दु या शिवभाव की अभिव्यक्ति सम्भव नही है। बिन्दुभाव अधिगत के उपरान्त साधक को समस्त कलाओं का क्षय करते करते विगतकल अवस्था प्राप्त करनी चाहिए। इस बिन्दु को चन्द्रबिन्दु कहा जाता है। सष्टि का मूल उत्स रूप में जो तत्त्व स्थित है वह तत्त्व बिन्दु है। यह माहाबिन्दु के नाम से प्रसिद्ध है। प्रकाश या शिवांश एवं विमर्श या शक्यंश जब समभाव में प्रतिष्ठित रहते है तब उनकी आख्या बिन्दु हो जाती है।

सृष्टि के प्रारम्भ में एक ही बिन्दु तीन रूपों में विभाजित होकर उदित होता है। समष्टिगत बिन्दु व्यष्टिगतरूपात्मना तीन बिन्दुओं में रूपान्तरित हो जाता है। अम्बिका या प्रकाशांश तथा शान्ता या विमर्शांश इन दोनों का मूल स्रोत सृष्टि का मूल स्रोत है। अम्बिका का प्रकाशन – १. वामा २. ज्येष्ठा ३. रौद्री नाम्नी तीन शक्तियाँ एवं शान्ता प्रकाशन १. इच्छा २. ज्ञान ३. क्रिया ।
इन तीन शक्तियों का रूप होता है। जहाँ अम्बिका एवं शान्ता साम्याभाव में स्थित रहती है उसे समष्टि बिन्दु या मूल बिन्दु कहते हैं। यहाँ से वाणियों का उदय होता है। जैसे :-
1.समष्टिबिन्दु = अम्बिका एवं शान्ता में साम्याभाव की भूमि – परावाक् ।
2.व्यष्टिबिन्दु = इसमें तीन वाणियों का उदय होता है। जिसका वर्णन इस प्रकार है ।
क.वाम एवं इच्छा में साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है – पश्यन्तीवाक् ।
ख.ज्येष्ठा एवं ज्ञान के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है –मध्यमा वाक् ।
ग.रौद्री एवं क्रिया शक्ति के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है- वैखरीवाक् ।
यह त्रिकोण ही मूलत्रिकोण है। इसका मध्य बिन्दु परामातृका है। तीन दिशाओं में तीन बिन्दुओं को पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी कहते हैं।
2. अर्द्धचन्द्र :- बिन्दु का अर्धभाग अर्द्धचन्द्र है । जो दीपक के आकार का है – अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभाग:, तथाकारो दीपकार एव। पादमात्र (मात्रकाल का चतुर्थ भाग) ही उच्चारण काल है। ह्रस्व उच्चारण काल मात्र कहलाता है। मात्र का आर्ध उच्चारण काल जिसका हो उसे अर्धमात्र कहते हैं।
3. रोधिनी :- ब्रह्मरन्ध्र के नीचे त्रिकोण में रोधिनी स्थित है। जो कि अर्धचन्द्र के ऊपर अवस्थित है। यह पाँच विश्वस्वामियों को ऊर्ध्वगति से निवृत्त करती है। अत: इसको रोधिनी कहा जाता है। इस तक बिन्दु का आवरण होता है। यह भी शून्य है।
4.नाद :- निरोधिका के ऊर्ध्वदेश में एवं ब्रह्मरन्ध्र के सम्मुख नाद स्थान है। यह मन्त्र महेश्वरी महापुरुषों द्वारा परिवृत है। नाद के अन्तर्गत भुवन पञ्चक के मध्य की शक्ति ऊर्ध्वगा कहलाती है। यहीं से विशुद्ध , चिद्-बोध का सूत्रपात होता है। बिन्दु पद के अधिष्ठाता ईश्वर और नाद पद के अधिष्ठाता सदाशिव हैं।
5.नादान्त :- ब्रह्मरन्ध्र में नादान्त है। यह भी शून्य है। नाद पद्मपराग की कान्ति वाला है। दो अण्ड़ो के मध्य वर्तमान सिरा का भाँति स्थित है। बाई ओर स्थित बिन्दु से युक्त है।, विश्ववत प्रकाशित नादान्त हल की आकृति के समान है।
6.शक्ति :- नादान्त के अन्दर ही स्थित चिद्रूपिणी , विश्वगर्भा, विश्वधारा, कलाच्तुष्टयोपेता, व्यापिनीकेन्द्रा इस भूमि का नाम शक्ति है। इसकी मात्रा १/१४ है। इसके मध्य में आनन्दसत्ता की अनुभूति होती रहती है। इसके अनन्तर ब्रह्म की सगुण् शक्ति के आनन्द का आभास होता है। शक्ति से उन्मनी पर्यन्त प्रत्येक भूमि द्वादश आदित्यवत् समुज्जवल एवं प्रदीप्त है। पृथ्वी तक सभी तत्त्व भुवन शक्ति का विस्तार मात्र हैं। इसकी कलाएँ भी कार्य में संलग्न होती हैं। जैसे- सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा,अमृता, अमृतसंभवा और व्यापिनी आदि।
7.व्यापिका :- शक्ति की उत्तरवर्ती भूमि में व्यापिनी स्थित है। यही चतुर्थ शून्य है। यद्यपि शक्ति शून्यात्मक नही है, किन्तु व्यापिनी शून्यरूपा है। पञ्चशून्यों में यही चतुर्थ शून्य है। व्यापिनी की मात्रा १/१२८ होती है। यह शक्ति के केन्द्र में स्थित होती है।
8.समना :- समना व्यापिनी के ऊर्ध्व भूमि में स्थित है। यही पराशक्ति है। यह व्यापिनी में प्रतिष्ठित अनाश्रित भुवन के भी ऊर्ध्व में स्थित है। यह समस्त कारणों का कारण एवं समस्त अण्ड़ों का अधार है। इसी शक्ति पर समासीन होकर शिव समग्र विश्व की सृष्टिरक्षा , संहार, निग्रग और अनुग्रह रूप में पञ्चकार्य करते हैं। इसकी मात्र १/२५६ होती है। समना को कृष्णा चतुर्दशी भी कहते हैं।
9.उन्मनी :- समना की ऊर्ध्ववर्ती भूमि ही उन्मना है। इसकी मात्र १/५१२ होती है। समना और उन्मना में केवल इतना अन्तर होता है ऊपर वाले बिन्दु के बिना समना ही उन्मना है। कहा भी गया है- “सैर्वोध्वबिन्दुहीनोन्मना”। यही शब्दब्रह्मरूपी परम नाद का अन्त है। यही पञ्चम शून्य भी है। नव नादों की नवम भूमि है।
नाद एवं त्रिकूट का मात्रा काल वर्णन :- नाद का काल लुक मिलाकर मात्र काल होता है। जिसमें एव लव न्यून रह जाता है। इसी प्रकार से वाग्-कूट में ग्यारह और कामराज कूट में साढ़े ग्यारह तथा शक्तिकूट् में साढ़े आठ मात्राएँ होती हैं। जिसमें एक लव की न्यूनता सभी में होती है। इस प्रकार से कुल तीन लव कम इकतालीस मात्राएँ होती हैं। लघु अक्षर के उच्चारण में जितना समय लगता है उस समय को मात्रा कहते हैं। नाद का जिस विमर्श शक्ति में प्रपञ्च विलीन रहता है उसके संसर्ग से प्रकाश बिन्दु का रूप धारण करता है। यह बिन्दु ही प्रकाश बिन्दु है। प्रकाशबिन्दु में विमर्श शक्ति का प्रवेश होता है। जिससे तेजोमय बीजरूप नाद निर्गत होता है। इस नाद में समस्त तत्त्व स्थित रहते हैं।

यह नाद निर्गत होकर त्रिकोण का रूप धारण करता है। यही अहं नामक बिन्दुनादत्मक प्रकाश विमर्श का शरीर । इसमें प्रकाश श्वेत बिन्दु और विमर्श लोहित बिन्दु है। इनका पारस्परिक अनुप्रवेशात्मक साम्य मिश्र बिन्दु होता है। इसी साम्य का नाम है- परमात्मा।
Conclusion (उपसंहार) :-
काश्मीर शैवदर्शन के सभी ग्रन्थों में नाद और बिन्दु के सिधान्त का पदे पदे वर्णन मिलता है। परात्रिंशिका में स्पष्ट कहा गया है- एक पहर तक इसके साक्षात्कार की अवस्था में निश्चचल रह सकने वाला साधक यदि किसी अभिलषित देवता का साक्षात् दर्शन करना चाहे , तो वह देवता रुद्रशक्तियों के द्वारा आकृष्ट होकर उसको नि:सन्देह दर्शन देता है।
इसी प्रकार से दो पहर तक समावेशदशा में स्थिर रह सकनेवाला साधक साधक चिदाकाश में निश्चल स्थिति प्राप्त कर लेता है। यही साधक तीन पहर तक की अवस्था में प्रकार के अनुभव करता है। यहाँ वह अनेकविध शक्तियों का अनुभव करता है। यह वीर या वीरेश्वर शिव ऐसे मुक्त शिव हैं, जो साधरण मानव शरीर में प्रच्छन्न रहकर विश्वजनीन कल्याण एवं उद्धार के कामों में निरत है। इस परमत्त्व को भैरवरूपी हृदय भी कहा गया है। यह भैरवरूपी विश्व(नरभाव) का हृदय अमृतबीज है।
इसका तात्पर्य यह है कि ग्रन्थ के पूर्वभाग में जिजी अनुभव , गुरुयुक्ति और शास्त्र-सम्प्रदाय के अनुसार, शक्ति के जिस नररूप में विकसमान रहनेवाले अपरारूप का वर्णन किया गया है , उसका स्वरूप अर्थात् जीवन-तत्त्व शाक्त अर्थात् शक्ति का परापर रूप है। उस परारूप का भी हृदय अर्थात् सारसर्वस्व सब ऐश्वर्यों से भरपूर और श्रीपराभट्टारिका के द्वारा संघट्ट में आलिङ्गित शिवरूप है।
अत: त्रिक पद्धति में शक्ति त्रिकोण रूप में परा,परापरा और अपरा ये तीन शक्तिदेवीयाँ और केन्द्र के परानन्दभैरव की निमर्थनरूपिणी शक्ति अर्चनीय मानी जाती है। साधना की अवस्था में योगी निरन्तर अकार को जपता है।
इस अकार को जपता हुआ वह महान हो जाता है-
“अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान्।
उदेति देवि सहसा ज्ञानौघ: परमेश्वर:”॥
अर्थात् वह बिन्दु, विसर्ग रहित केवल अकार को जपता हुआ योगी महान् ज्ञान धन परमेश्वर का सहसा साक्षात्कर कर लेता है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची
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