भोजविरचित सरस्वतीकण्ठाभरणस्थ कारक-व्यवस्था : एक विमर्श 3.67/5 (3)

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अङ्कुश कुमार

  पी. एच. डी. (शोधच्छात्र)

                                                जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

                                                                             नई दिल्ली११००६७

 

कूटशब्दाः

    साधन, नामार्थ, तिङन्त, हृदयहारिणी, योगविभाग, अधिकरण, तुल्यबलविरोध, कार्यकाल, यथोद्देश, विवक्षा, भेदाभेदविवक्षा, सत्-विवक्षा, असत्-विवक्षा, व्यत्यय, शिष्ट, अशिष्ट, करण, साधकतमत्व, प्रकृष्टोपकारकत्व, ईप्सिततमत्व, कर्मकर्त्ता, ध्रुव, अवधि, सम्बंध।

 

संस्कृत वाङ्मय में व्याकरणशास्त्र की अक्षुण्ण परम्परा में पाणिनि सर्वाधार सदृश है। उनके द्वारा प्रणीत तन्त्र भाषा रूपी जगत् का प्राणाधार है। समस्त परवर्ती वैयाकरण उनसे नितराम् प्रभावित है, अत: उनके तन्त्र के लिए यह कथन “यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्”[1] अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसी शब्दब्रह्म की समुपासक व्याकरण-परम्परा में पाणिनि-परवर्ती वैय्याकरणों में भोज का अन्यतम स्थान है। भोज-प्रणीत सरस्वतीकण्ठाभरण भाषा के प्रवाह  में समागत नूतन पदों के साधुत्व-विचार में सर्वथा सफल है, अत: परवर्ती व्याकरण परम्परा में यह मुक्तामणिरिव मूर्धाभिषिक्त है।

भोज ने सरस्वतीकण्ठाभरण में अष्टाध्यायी, उणादिकोश आदि समस्त पाणिनीय तन्त्र, वार्तिक, महाभाष्य आदि ग्रन्थ, काशिकादि वृत्तियाँ, तथा चान्द्र, कातन्त्र, जैनेद्र, शाकटायन आदि अन्य तन्त्रों का श्रमपूर्वक अध्ययन कर छात्रों की सुगमता हेतु सरलतापूर्वक सार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। प्रक्रिया के सारल्य हेतु उनका यह प्रयास प्रशंसनीय है, जिसका निदर्शन हमें सरस्वतीकण्ठाभरण में पदे-पदे प्राप्त होता है। प्रकृत शोधपत्र में सरस्वतीकण्ठाभरणस्थ कारक-प्रकरण की समीक्षा करने का प्रयास किया जायेगा। इसमें सरस्वतीकण्ठाभरण से पूर्ववर्ती समस्त व्याकरण परम्परा को आधार बनाकर विचार किया जायेगा। इसमें हृदयहारिणी-व्याख्या मुख्यत्वेन साहायक है।

कारकप्रकरण : स्वरूप विवेचन

व्याकरण शास्त्र में भाषा के विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण किया गया है। वाक्य व तदन्तर्गत विभिन्न तत्त्व यहाँ विवेचित हैं। तद्यथा कारक, विभक्ति, समास, तद्धित, लडादि लकार इत्यादि। कारक वाक्य का मुख्य तत्त्व है। कारक के अभाव में वाक्य ही उपपन्न नहीं हो सकता। यद्यपि “एक तिङ् वाक्यम्” से तिङन्त मात्र को भी वाक्य स्वीकार किया गया है, तथापि वहाँ भी कारक गमम्यान होता ही है।

कारक स्वरूप (नामार्थ क्रिया के सम्बन्ध रूप में) –

यह सर्वस्वीकृत तथ्य है कि सभी कारकों का धात्वर्थ में अन्वय होता है[2]। भू, पच् आदि शब्दों की शास्त्र में धातु संज्ञा प्रोक्त है[3]। सामान्यतया क्रिया को ही धात्वर्थ कहा जाता है[4]। पतञ्जलि ने “क्रियावचनो धातु:” इस वर्तिक के प्रसङ्ग में  क्रिया के बोधक शब्द को धातु कहा है[5]। यह क्रिया पिण्ड-रूप में प्रत्यक्षप्रमाण से निर्दिष्ट नहीं की जा सकती, उसका तो अनुमान ही सम्भव है। इस अनुमानगम्य क्रिया के कारण ही पचति यह प्रयोग सम्भव या असम्भव होता है। यदि क्रिया न होती तो एक वस्तु का अन्य स्थान पर पाया जाना अनुपपन्न हो जाता[6]

भाषिक विश्लेषण में वाक्य के अवयवों पर विचार करने पर हमें दो प्रकार के तत्त्व प्राप्त होते हैं – नाम (सुबन्त) तथा  क्रिया (तिङन्त)। पाणिनि इनकी पद संज्ञा[7] कर इन्हें वाक्यावयव हेतु समर्थ बताया है[8]। वाक्य की संरचना में सुबन्त तथा तिङन्त पदों के परस्पर सम्बन्ध की आवश्यकता होती है। क्रिया (तिङन्त) का नामार्थ (सुबन्त) के साथ सम्बन्ध ही वाक्य का प्रधान उद्देश्य है। इससे ही वक्ता का अभिप्रेतार्थ श्रोता तक पहुँच सकता है। वाक्य में क्रिया के साथ नामार्थ के इस सम्बन्ध को ही व्याकरणशास्त्र में कारक नाम से अभिहित किया जाया है। क्रिया व नामार्थ का यह सम्बन्ध मुख्यरूप से साक्षात् होता है, यदा कदा उपकार-सामर्थ्यवशाद् परम्परया सम्बद्ध भी होता है। इस प्रकार दोनों प्रकार के सम्बन्धों से नामार्थ को आश्रय बनाकर कारक-तत्व विद्यमान रहता है।

क्रिया साध्य तथा कारक साधन रूप में वाक्य में व्यवस्थित होते हैं। भर्तृहरि भी कारकों  “साधन” नाम से अभिहित कर “साधनसमुद्देश” में विवेचित करते है। क्रिया की निष्पत्ति (सिद्धि, पूर्ति वा निर्वृत्ति) में अनेक साधनों की आवश्यकता होती है। यथा पाक क्रिया में ईंधन, अग्नि, पात्र, अन्न, तथा पकाने वाला व्यक्ति। ये सभी तत्त्व क्रिया के साधक हैं। इनकी प्रवृत्तियाँ क्रिया की सिद्धि में भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। उदाहरण के लिये ईंधन जिस रूप में पाकक्रिया में साधक है, पकाने वाला व्यक्ति उसी रूप में साधक नहीं है। इसका कारण साधनों का प्रवृत्ति-भेद है और यह प्रवृत्ति ही क्रिया रूप में प्रतिफलित होती है[9]

कारकव्यवस्था

        कारक तथा क्रिया अविच्छिन्न होकर ही वाक्य में प्रयुक्त होते हैं। क्रिया की अनुपस्थिति में कारकों की सत्ता ही संभाव्य नहीं है, तो दूसरी ओर कारकों के अभाव में क्रिया अनुपपन्न हो जायेगी। यद्यपि महाभाष्यकार क्रियामात्र को वाक्य स्वीकार करते है[10] तथापि वहाँ भी सूक्ष्मरूप से साधन गम्यमान होते ही हैं। यथा “गच्छ” यहाँ मध्यम पुरुष एकवचन “त्वम्” यह कर्त्ता कारक गम्यमान है ही। इसी प्रकार अन्य साधनों की भी प्रकरणानुसार प्रतीति होती ही है। यथा “अप्युपाध्यायो गृहान्निर्गत:” के “नहि नहि, अस्ति” इस उत्तर में अस्ति क्रिया में उपाध्याय की कर्त्ता रूप में तथा गृह की अधिकरण रूप में प्रतीति होती है। अस्ति, भवति आदि सत्तार्थक क्रियाओं में भी प्ररकणानुसार “घट:” आदि साधन (कारक) गम्यमान होते ही हैं। अत: सूक्ष्म रूप से ही सही पर क्रिया में कारकों की उपस्थिति अनिवार्य है, अन्यथा वह निष्पन्न ही नहीं हो पायेगी। इसके विपरीत कारकों को मुख्यरूप से स्थूल रूप में ही क्रिया की आवश्यकता होती है, यदा कदा गम्यमान क्रिया से भी वाक्य पूर्ति हो जाती है। यथा – विवाह प्रसङ्ग में जब कन्या का पिता अपने भावी जामाता के प्रति अर्घ्य, आचमनीय, मधुपर्क आदि ग्रहण कराने हेतु प्रवृत्त होता है, तो आचार्योक्ति है- “मधुपर्क:, मधुपर्क:, मधुपर्क:”। यहाँ “वर्तते” क्रिया गम्यमान है, जिसका कर्त्ता मधुपर्क है[11]। अत: वाक्य में यदि क्रिया श्रूयमाण अथवा गम्यमान न हो तो वाक्यस्थ पदों का कारक नहीं कहा जा सकता है।

उपरोक्त विवरण के आधार पर यह प्रश्न समुत्पन्न होता है कि जिस वाक्य में अनेक नामार्थ (सुबन्त) प्रयुक्त हो, उन सभी नामार्थों को कारक क्यों नहीं माना जाता? यथा – “श्रीगणेशाय नम:” में श्रीगणेश, “बालकेन सह धावति” में बालक, “गृहं विना सुखं नास्ति” में गृह तथा “शीघ्रं चलति” में शीघ्र पद को कारक क्यों नहीं माना जाता? वस्तुत: एक नामार्थ के अन्य नामार्थ से सम्बन्ध को कारक नहीं कहा जा सकता है। प्रस्तुत प्रकरण में नामार्थ को व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। यहाँ नामार्थ में – क्रिया से भिन्न अन्य सभी निपात, कर्मप्रवचनीय, उपसर्ग, अव्यय आदि का ग्रहण है। जब तक क्रिया का सम्बन्ध नामार्थ के साथ न हो तब तक कारक की उपपत्ति सम्भव नहीं है। यथा “गुरुं नमस्करोति” में गुरु का सम्बन्ध नमन-क्रिया से है, अत: यहाँ कारकत्व उपपन्न है, परन्तु इसी प्रकार के वाक्य “गुरवे नम:” में क्रियापद के अभाव में कारकत्व का भी अभाव है। इस प्रकार के सम्बन्ध उपपद सम्बन्ध (उपपद विभक्ति) कहलाते हैं।

सरस्वतीकण्ठाभरण के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद में समस्त संज्ञाओं का विधान किया गया है। इसी पाद में कारक व तद्सम्बद्ध कर्त्ता कर्मादि संज्ञाओं का विधान किया गया है। वाक्य संज्ञा[12] के अनन्तर “क्रियानिमित्तं कारकम्”[13] इस कारक-लक्षण पूर्वक “कर्तृकर्मान्तरितक्रियाधारोऽधिकरणम्”[14] तक समस्त कारकों का विधान किया है। तदनन्तर दो सूत्रों में सम्बोधन का भी विवेचन किया गया है। अत: इस कारक-प्रकरण को ४५ सूत्रात्मक स्वीकार कर विचार किया गया है।

यहाँ पर प्रकरण शब्द केवल सहजग्राह्यता हेतु स्वीकार किया गया है। सरस्वतीकण्ठाभरण में भी पाणिनीय अष्टाध्यायीवत् ही अधिकरणों में विभिन्न विषय उपनिबद्ध हैं। भोज से पूर्व प्रकरण-ग्रन्थों का निर्माण प्रारम्भ हो चुका था, तथापि भोज शास्त्रीय अधिकरण पद्धति[15] में ही अधिक विश्वास करते हैं।

कारकलक्षण विमर्श

कारक-प्रकरण के प्रारम्भ में सर्वप्रथम भोज कारक का सामान्य लक्षण प्रस्तुत करते हैं। तदनुसार “क्रियानिमित्तं कारकम्”[16]। कारक का यह लक्षण प्राय: व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। साधारणतया क्रिया के निष्पत्ति में कारणभूत कर्त्ता, कर्मादि को कारक नाम से अभिहित किया जाता है। परवर्ती विद्वानों ने इस लक्षण में अतिव्याप्ति, अव्याप्ति आदि दोषों को स्वीकार किया हैं। तद्यथा “चैत्रस्य तण्डुलं पचति” इस वाक्य में उपर्युक्त लक्षणानुसार चैत्र को, जो सम्बन्धि पद है, क्रिया का निमित्त होने के कारण कारक माना जा सकता है, यतोहि वह भी स्वगृह से तण्डुल देकर या अनुमत्यादि से पाकक्रिया का निमित्त कारण बना हुआ है। इस प्रकार चैत्रादि-सम्बन्धी को भी कारकान्तर्भूत करने से प्रस्तुत लक्षण अतिव्याप्ति दोष से ग्रस्त हो जाता है[17]। इसी प्रकार अवाप्ति दोष भी माना जाता है। यथा- निमित्त कारण को कार्य से पूर्व विद्यमान होना चाहिए, तभी उसका कारणत्व उपपन्न होता है। “घटं करोति” में क्रिया ही तथाकथित निमित्त कारण से पूर्व सम्पन्न हो जाती है, यतोहि क्रिया ही घट को उत्पन्न कर रही है। इससे घट क्रिया का निमित्त कारण नहीं बन पायेगा और निमित्त कारण न होने से घट में कारकत्व भी उपपन्न नहीं हो पायेगा। इस अव्याप्ति दोष का निराकरण सांख्यमत के सत्कार्यवाद को आधार बनाकर किया जा सकता है। तदनुसार घट सूक्ष्मरूप से अव्यक्ततया स्व-कारण में विद्यमान तो रहता ही है; वही क्रिया का निमित्त कारण स्वीकार किया जा सकता है। इस लक्षण का विवेचन द्वितीय अध्याय में किया जा चुका है। हृदयहारिणीकार उपर्युक्त दोषों के परिहार हेतु भर्तृहरि प्रोक्त साधन के लक्षण को इससे सम्बद्ध कर प्रस्तुत है[18], जिसके कि प्रस्तुत लक्षण का व्यवहारिक व दार्शनिक रीति से समन्वय हो सके। यद्यपि परवर्ती विद्वानों के अनुसार भोज कृत उक्त लक्षण दोषग्रस्त है, तथापि प्राथमिक दृष्ट्या कारक के लक्षण प्रस्तुतीकरण का यह प्रयास निश्चप्रचम् श्लाघ्य ही है।

कारक संज्ञा

भोज प्रथम अध्याय के प्रथम पाद में ३४ वीं संज्ञा के रूप में कारक संज्ञा का उपस्थापन किया है। पाणिनीय तन्त्र में “कारके”[19] सूत्र के माध्यम से कारक संज्ञा व अधिकार दोनों ही प्रवृत्त होते है परन्तु भोज कारकाधिकार का विधान नहीं करते, अपितु कारक संज्ञा विधान मात्र से ही स्वाभिप्राय की पूर्ति कर लेते है। यह एक महती संज्ञा है अत: इसकी अन्वर्थता स्वत: ही सिद्ध है। इसकी अनुवृत्ति “कर्तृकर्मान्तरितक्रियाधारोऽधिकरणम्”[20] तक जाती है।

एकसंज्ञाधिकार

पाणिनीय तन्त्रवत् भोजीय तन्त्र में  एक संज्ञाधिकार की व्यवस्था यद्यपि कण्ठरवेण प्रोक्त नहीं है, तथापि हृदयहारिणीकार “अभिनिविशो वा”[21] में कर्म तथा अधिकरण इन संज्ञाद्वय की प्राप्ति पर किसी परिभाषा सूत्र का निर्देश करते हैं, जिसमें युगपत् संज्ञाद्वय का निषेध किया गया है[22], जो कि सम्प्रति सरस्वतीकण्ठाभरण में प्राप्त नहीं होता। पाणिनीय तन्त्र में प्राय: संज्ञायें सम्पूर्ण शास्त्र में व्याप्त है। परन्तु भोज ने समस्त संज्ञाओं को एक साथ ही प्रथम पाद में उपनिबद्ध किया है। ध्यातव्य है कि पाणिनीय तन्त्र में एक-संज्ञाधिकार अतीव महत्त्वपूर्ण है। तदनुसार “आ कडारादेका संज्ञा”[23]  से “कडारा: कर्मधारये”[24] तक यह एक-संज्ञाधिकार प्रवृत्त होता है। महाभाष्यकार ने विस्तार से इस विषय पर पूर्वपक्ष पुरस्सर स्वमन्तव्य का उपस्थापन किया है। अङ्ग, पद तथा भ संज्ञा, कर्मधारय और तत्पुरुष, द्विगु तथा तत्पुरुष, उपसर्ग व गति, करण तथा कर्म, हेतु तथा कर्त्ता आदि संज्ञाओं के उदाहरणसहित इसे अनुवृत्ति तथा योगविभाग आदि द्वारा स्पष्ट किया है। यही प्रश्न “कारके” में भी उपस्थित होता है। कारक संज्ञा व अन्य अधिकरणादि संज्ञाओं के प्रसंग में प्रथम अनुवर्तमान कारक का भी विधेय कोटि में निवेश हो जाने से आधार आदि की पहले कारक संज्ञा होकर तदनन्तर अधिकरणादि अन्य संज्ञाएँ होंगी। इसी प्रकार भोजीय तन्त्र में भी अनुवर्तमान कारक का विधेय कोटि में निवेश हो जाने से आधार की प्रथम तो कारक संज्ञा व तदनन्तर वहीं क्रिया के निमित्त आधारादि कारक तत्तत् अधिकरणादि संज्ञक होंगे।

कारकप्रतिपादन क्रम

भोजीय तन्त्र में लोक व्यवहार व प्रक्रिया सारल्य पर अधिक ध्यान दिया गया है। इसी कारण भोज ने निम्न क्रम में कारकों का प्रतिपादन किया है – १. कर्त्ता २. हेतु ३. कर्मकर्ता ४. कर्म ५. करण ६. सम्प्रदान ७. अपादान ८. अधिकरण । इनमें कर्म विवेचन में प्रसंगवश प्राप्त करण तथा सम्प्रदान का भी उल्लेख है।  इसके विपरीत पाणिनि १. अपादान २. सम्प्रदान ३. करण ४. अधिकरण ५. कर्म ६. कर्ता। पाणिनीय क्रम का मुख्य आधार “विप्रतिषेधे परं कार्यम्”[25] यह परिभाषा सूत्र है। तदनुसार तुल्यबलविरोधरूप विप्रतिषेध उपस्थित होने पर अर्थात् जहाँ भिन्न-भिन्न अर्थों वाले दो कार्य परस्पर एक स्थान पर एक साथ प्राप्त होते हैं, वहाँ सूत्रपाठक्रम की दृष्टि से परवर्ती कार्य ही होता है। यथा- वृक्षेभ्य: में वृक्ष प्रातिपदिक से चतुर्थी विभक्ति बहुवचन में “भ्यस्” प्रत्यय परे होने पर युगपत् ही “सुपि च”[26] सूत्र से दीर्घ प्राप्त होता है तथा “बहुवचने झल्येत्”[27] सूत्र से  एत्व प्राप्त होता है, यतोहि “पर्जन्यतल्लक्षणप्रवृत्ति:”[28] सूत्रों की प्रवृत्ति मेघ के समान होती है। जैसे मेघ ऊषर, अनूषर आदि न देखकर सर्वत्र वर्षा करता है, तद्वत् ही सूत्र भी प्रवृत्त होते हैं। न कि अग्नि के समान, जो कि केवल अदग्ध को ही जलाता है, दग्ध को नहीं। इस अवस्था में तुल्यबलविरोधरूप विप्रतिषेध उपस्थित है, अत: परवर्ती सूत्र “बहुवचने झल्येत्” ही प्रवृत्त होगा। कारक-प्रकरण में भी यही तुल्यबलविरोधरूप विप्रतिषेध उपस्थित हो तो पूर्ववर्ती कारक की अपेक्षा परवर्ती कारक ही प्रवृत्त होता है[29]। तद्यथा- “वृक्षं पुष्पमवचिनोति” में “ध्रुवमपायेऽपादानम्”[30] से अपादान व “अकथितञ्च”[31] से कर्म कारक की प्राप्त है। परन्तु पूर्वोक्त परिभाषानुसार परवर्ती कर्म कारक ही प्रवृत्त होता है।

भोज भी स्व-तन्त्र में “विप्रतिषेधे परं कार्यम्”[32] इस परिभाषा को स्वीकार करते है। इसे स्वीकार करने पर कारक प्रकरण में यह समस्या समुपस्थित होती हैं कि कर्त्ता की अपेक्षा परवर्ती  करण, सम्प्रदान आदि कारक तुल्यबलविरोधरूप विप्रतिषेध होने पर प्राप्त होने लग जायेंगे, जो कि अभीष्ट नहीं है। इसके निराकरणार्थ वे दो अन्य परिभाषाओं को उपस्थापित करते हैं। तद्यथा-  १. “कार्यकालं संज्ञापरिभाषम्”[33] – संज्ञा तथा परिभाषा प्रकरण में तुल्यबलविरोधरूप विप्रतिषेध होने पर पौर्वापर्य को स्वीकार न कर, कार्यकाल को ही आधार मानकर प्रवर्तना होगी। यथा – (क) संज्ञा प्रकरण – कर्तृकर्मादि संज्ञाओं के पौर्वापर्य को आधार न मानकर विवक्षानुसार कारक व्यवस्था प्रवृत्त होगी – वलाहकाद् विद्योतते, वलाहकेन विद्योतते, वलाहको विद्योतते इत्यादि। यहाँ अपादान के परवर्ती होने से नित्य आपादान की प्राप्ति हो रही थी, जिससे अन्य अभीष्ट रूप सिद्ध नहीं होते, अत: इस परिभाषा से वक्ता की विवक्षा को मुख्य आधार मानकर ही कारक प्रवृत्त होंगे। (ख) परिभाषा प्रकरण – “पूर्वत्राऽसिद्धम्”[34] इस परिभाषा के अनन्तर पठित सूत्र पूर्ववर्ती सूत्रों के प्रति असिद्ध होते हैं। यहाँ परिभाषा प्रकरण में विद्यमान  “सप्तम्या निर्दिष्टे पूर्वस्य”[35] के अनुसार सप्तमी विभक्ति से निर्दिष्ट कार्य अव्यवहित पूर्ववर्ती को होता है। “झलां झरि सवर्णे च”[36] से “प्र त् त् त् त् त” इस अवस्था में सप्तमीनिर्दिष्ट सवर्ण झर् से पूर्ववर्ती तकारद्वय का लोप होकर “प्रत्तम्” यह अभीष्ट रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार “पूर्वत्राऽसिद्धम्” के अधिकार में भी “सतम्या निर्दिष्टे पूर्वस्य” से सप्तमी निर्दिष्ट कार्य प्रवृत्त होते हैं अत: यहाँ पौर्वापर्य की प्रसक्ति न होकर कार्यकाल के अनुसार प्रवर्तना होती है।

२. यथोद्देशं संज्ञापरिभाषम्[37] – उद्देश्यानुसार भी इनकी प्रवृत्ति होती है। तद्यथा “कांस्यपात्र्यां भुङ्क्ते” में अपादान को बाधकर परवर्ती होने से अधिकरण की प्रवृत्ति होती है। वही अपादान कर्म तथा करण संज्ञाओं से विप्रतिषेध की अवस्था में परवर्ती होने पर भी बाधित होता है। तद्यथा – “गां दोग्धि पय:” में अपादान “गाय” को उद्देश्यानुसार कर्मत्व हो गया। “धनुषा विध्यति” में धनुष का मूलरूप अपादान है, परन्तु उद्देश्यवशात् करणत्व प्राप्त हो गया।

विवक्षात: कारकाणि[38]

यह एक ऐसा विषय है जो, यह स्वीकार करवाता है कि भाषा का प्रयोग लोक के अधीन है। कारकों का व्यवहार प्राय: वक्ता की विवक्षा पर निर्भर होता है, द्रव्य की स्थिति पर नहीं। व्याकरण के प्रायश: नियम उसके सामने विनत हैं।

विवक्षा एक लौकिक तत्त्व है। दृष्टार्थ अथवा लोकत: प्राप्त होने के कारण यह शास्त्र में विहित नहीं है। यतोहि विधान अदृष्टार्थ या अत्यन्त अप्राप्त विषय का होता है[39]। आचार्यों ने इस  लोक-विवक्षा के महत्त्व को ध्यान में रखकर ही भाषा-प्रयोगों का विश्लेषण किया हैं। शास्त्रों में यत्र-तत्र “विवक्षा भवति” “विवक्षा दृश्यते” आदि वाक्यों से इसका महत्त्व दृष्टिगोचर होता है।

महाभाष्यकार विवक्षा के विषय में कहते हैं कि कभी-कभी सत् पदार्थ की भी अविवक्षा होती है। यथा- अलोमिका एडका, अनुदरा कन्या। इसी प्रकार कभी-कभी असत् पदार्थ की भी विवक्षा होती है। यथा- समुद्र: कुण्डिका, विन्ध्यो वर्धितकम्[40]। भर्तृहरि ने वाक्यपदीयस्थ साधनसमुद्देशस्थ में विवक्षा का विस्तृत विवेचन किया है। उनके अनुसार अनेक धर्मों से युक्त यह विश्व समस्त शक्तियों का समूह है। ये शक्तियाँ सर्वत्र सर्वदा सर्वथा समुपलब्ध हैं, अत: एक समय में एक ही शक्ति विवक्षित होती है, जिसके कालभेद से भिन्न-भिन्न शक्तियों की विवक्षा सम्भव होती है[41]। कारक का व्यवहार बुद्धि की अवस्था पर निर्भर है। बुद्धि स्वकल्पना से विभिन्न रूप में पदार्थ को ग्रहण कर सकती है। यथा- घटोऽस्ति, घटमानय, घटेन सिञ्चति, घटात् जलं पतति, घटे जलं वर्तते[42] और उसी रूप में विवक्षित करती है। बुद्धि के द्वारा एक पदार्थ का भी भिन्नत्व सम्भव है तथा अनेक पदार्थों का भी एकत्व सम्भव है[43]

सभी कारक क्रिया-निष्पत्ति मात्र में कर्तृत्व-शक्ति धारण करते हैं, परन्तु उनके व्यापारों के भेद की विवक्षा होने पर करणत्वादि शक्तियों से सम्बद्ध होते हैं[44]। यथा- पुत्रोत्पत्ति में माता-पिता दोनों ही कर्त्ता हैं, परन्तु भेद-विवक्षा में कहा जाता है-(क) अयमस्यां पुत्रं जनयति व (ख) इयमस्माज्जनयति पुत्रं। अभेद विवक्षा में कहते हैं- “पितरौ जनयत:”[45]। इस प्रकार सभी कारक विवक्षा से (जो बुद्धि की अवस्था कही जा सकती है) प्रवृत्त होते हैं।

यह सत्य है कि विवक्षाधीन होने से कारकों में व्यत्यय देखा जाता है, तथापि इसके लिए प्रयोक्ता निरङ्कुश नहीं हो सकता। हृदयहारिणीकार के अनुसार विवक्षा में सर्वथा स्वेच्छाचार स्वीकार्य नहीं है। विवक्षा एक कुलवधू के समान होती है, जो कि स्वतन्त्र होने पर भी कभी-भी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करती। यथा अपादान की “धनुषा विध्यति” के रूप में विवक्षा स्वीकार्य है, परन्तु “धनुषो विध्यति” स्वीकार्य नहीं हो सकता[46]। विवक्षा के लिए तीन तथ्य सदैव स्मरणीय हैं-

  • शास्त्रोक्त कारक-विभक्ति के परिवर्तित करने पर भी अर्थ-परिवर्तन नहीं होना चाहिए। यथा- “ग्रामादागच्छति” की विवक्षा “ग्राममागच्छति” नहीं हो सकती।
  • पदों की प्रकृति में परिवर्तन नहीं होना चाहिए। यथा- “ग्रामादागच्छति” की विवक्षा “ग्रामं त्यजति” नहीं हो सकती, यतोहि दोनों की प्रकृतियाँ भिन्न हैं। समानार्थक प्रकृतियों के प्रयोग में कोई आपत्ति नहीं है।
  • यह केवल शिष्ट प्रयोगों पर ही आश्रित है। प्रमत्तों वा अवैय्याकरणों के अशिष्ट प्रयोगों को विवक्षित कहकर ग्रहण नहीं किया जा सकता।

विवक्षाप्रभाव – प्राय: करण की कर्तृत्वेन विवक्षा देखी जाती है। यथा “असिश्छिनत्ति” । करण जब कर्तृत्वेन विवक्षित होता है तो अपना स्थानापन्न कुछ-न-कुछ छोड़ जाता है, जिसका की प्रकर्ष पूर्ववत् ही बना रहता है। यथा “असि: तैक्ष्णेन गौरवेण काठिन्येन संस्थानेन वा छिनत्ति”। यदि संयोगवश ये तैक्ष्णादि भी कर्तृत्वेन विवक्षित होने लगे तो भी लौकिक कठिनाई भले ही हो, शास्त्रीय संगति तो हो ही जायेगी। यहाँ तैक्ष्ण में शब्दभेद की कल्पना करके कर्ता और करण में भेद किया जा सकता है[47]

लोक में असत् पदार्थों की भी करणत्वेन विवक्षा देखी जाती है। भवानन्द का यह मत है कि सत् पदार्थ की विवक्षा होने पर साधकतमत्व सिद्ध करना सम्भव है, परन्तु असत् पदार्थ की विवक्षा होने पर असत् पदार्थ के अतिशय की विवक्षा असंगत है[48]। व्याकरण तन्त्र में इस मत को प्रश्रय नहीं दिया गया है। यहाँ सत्पदार्थवत् ही असत्पदार्थ का भी प्रकृष्टोपकारकत्व स्वीकार किया जाता है। “धनाभावेन मुक्त:” इत्यादि वाक्यों में धन असन्निहित (अभावात्मक) रहकर भी मुक्ति रूप क्रिया सिद्धि के कारण करणत्वेन प्रसिद्ध है[49]

भेदाभेदविवक्षा लक्षणस्थ “क्रियया” पद का कृत्रिम कर्म में ही समावेश कर लेने से भी सम्प्रदान की अभीष्ट सिद्धि सम्भव है। परन्तु ऐसी स्थिति में सन्दर्शनादि अवान्तर क्रिया तथा मुख्य क्रिया के बीच भेद विवक्षित होता है[50]। “पत्ये शेते” इत्यादि उदाहरण इसी तरह सिद्ध होते है। जहाँ सम्प्रदान विवक्षित न हो वहाँ अभेद ही रहता है[51]। गत्यर्थक धातुओं में भेद तथा अभेद दोनों की विवक्षा देखी जाती है। यथा भेद विवक्षा में “ग्रामाय गच्छति” तथा अभेद विवक्षा में “ग्रामं गच्छति” प्रयोग होता है। यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि भेदाभेद विवक्षा को आधार माने तो “ओदनं पचति” को भेद विवक्षा में “ओदनाय पचति” होने लगेगा, जो कि अभीष्ट नहीं है। इस पर हृदयहारिणीकार कहते हैं कि यद्यपि विवक्षा वक्ता की इच्छा पर निर्भर करती है, तथापि वह यादृच्छिक नहीं है। अत: प्रयोगसाङ्कर्य  नहीं देखा जाता[52]। एतदर्थ उन्होंने भर्तृहरि को उद्धृत किया है[53]

कारकप्रकरण का अन्य वैशिष्ट्य

  • संरचना सरस्वतीकण्ठाभरण का मुख्य आधार अष्टाध्यायी है। कारक व विभक्ति प्रकरण में ही शतशः सूत्र अष्टाध्यायी से यथावत् तथा आंशिक परिवर्तन कर स्वीकार किए गये हैं। तथापि अन्य व्याकरणों का भी इस पर पर्याप्त प्रभाव परिलक्षित होता है।
  • समग्रता सरस्वतीकण्ठाभरण एकमात्र व्याकरण हैं, जिसमें पूर्ववर्ती समस्त व्याकरण-सिद्धान्त एकत्रोपसंगृहीत हैं। यथा- पाणिनि- ‘कर्मणि द्वितीया’। वार्तिककार (कात्यायन) – ‘जुगुप्साविरामप्रमादार्थानाम्’। भर्तृहरि – हेतुसंज्ञा के लक्षण में ‘अनुकूलो वा’ तथा अधिकरण के लक्षण में ‘कर्तृकर्मान्तरित’ पद ग्रहण। न्यासकार (जिनेन्द्रबुद्धि)- प्रथमा विधान में ‘अर्थमात्रे’ पाठ। चान्द्र – ‘ऋते द्वितीया च’। यहाँ कतिपय आचार्यों के स्थालीपुलाक न्यायेन कारक व विभक्ति प्रकरण में स्वीकृत सिद्धान्तों का दिग्दर्शन कराया गया है।
  • कर्मकर्ता कारक प्रकरण में “कर्मकर्ता” विवेचन भोज के व्यावहारिक दृष्टिकोण व स्पष्टप्रतिपत्त्यर्थ प्रयास का अनुपम उदाहरण है। भोज ने ३ सूत्रों में कर्मकर्ता का उपाख्यान किया है। इसका मूल पाणिनीय तन्त्रस्थ “कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः” व तत्सूत्रानुवर्ती वार्तिक है। परन्तु पाणिनीय तन्त्र में इसे कारक-प्रकरण में परिगणित नहीं किया गया है और न हि कर्मकर्ता नामक किसी संज्ञा विशेष का विधान किया है। भोज ने “कर्मकर्ता” नामक एक नूतन संज्ञा कर इसका कारक-प्रकरण में उपाख्यान किया है। भोज की यह प्रक्रिया सारल्य के प्रति आसक्ति परवर्ती प्रक्रिया-ग्रन्थों के लिए आदर्श व अनुकरणीय है।
  • अधिकाराभाव भोजीय कारक व विभक्ति प्रकरण में कारकाधिकार व अनभिहिताधिकार का अभाव है। पाणिनीय तन्त्र में दोनों ही अधिकार अतीव महत्त्वपूर्ण हैं। भोजीय तन्त्र में प्रथम अध्याय के प्रथम पाद में संज्ञा विधान के कारण कारकाधिकार की अपेक्षा कारक-संज्ञामात्र का ही अनुवर्तन अपादानादि में होता है। विभक्ति-प्रकरण में भोज ने अनभिहिताधिकार को अनावश्यक माना है, अतः भोजीय तन्त्र में तदाभाव में भी अभीष्ट-रूप सिद्धि होती है। इन अधिकारद्वय व्यतिरिक्त शेषाधिकार का भोज ने विधान किया है।
  • अधिकरण की षड्विधताभोजीय तन्त्र में सर्वप्रथम षड्-विध अधिकरण का आख्यान् किया गया है। भोज से पूर्व चान्द्र आदि ने ४ भेदों का व्याख्यान किया है, परन्तु भोज ने स्व-ऊहया प्रकारद्वय का अतिरिक्त आख्यान किया है। परवर्ती सारस्वतादि व्याकरणों में भोज का ही अनुसरण किया गया है।
  • परिष्कारसमर्थक भोज सदैव परम्परानुगामिता के प्रबल समर्थक रहे हैं। परन्तु साथ ही साथ परिवर्धन व परिष्कार भी उन्हें अभीष्ट था। यथा पाणिनीय सूत्र ‘ आधारोऽधिकरणम्’ के स्थान पर ‘कर्तृकर्मान्तरितक्रियाधारोऽधिकरणम्’ इस परिष्कृत पक्ष का उपस्थापन।

एतदतिरिक्त योगविभाग कल्पना भोजीय कारक प्रकरण की अपरा विशेषता है। यद्यपि भोज के वैयाकरण होने के कारण संक्षेपधी होना स्वाभाविक ही है और उनके शास्त्र में पदे पदे यह परिलक्षित भी होता है, तथापि स्पष्टप्रतिपत्ति हेतु भोज वैयाकरणों के “अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः” के सिद्धान्त का भी त्याग कर देते है। इसका मुख्य कारण छात्रोपयोगिता व विषय की सहजग्राह्यता ही है, न कि पूर्वाचार्यों के प्रति अनादर भावना।

एतदन्यद् भोज ने नैसर्गिकी स्वप्रतिभा से सूक्ष्मावगाहन कर उनमें आवश्यकतानुसार परिष्कार, परिवर्तन व सम्वर्धन कर तत्कालीन नूतनभाषिक प्रयोगों का भी विचार किया है।

 

सन्दर्भग्रन्थसूची

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  • पदमञ्जरी,(काशिका सहित), हरदत्त मिश्र, सं. द्वारिकाप्रसाद शास्त्री, बनारस : १९६४.
  • परिभाषेन्दुशेखर:, नागेशभट्ट, सं. डॉ. गिरिजेशकुमारदीक्षित, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी : १९८७.
  • प्रौढमनोरमाकारकादव्ययीभावान्तो भाग: (सशब्दरत्न अनन्या हिन्दीव्याख्योपेता), भट्टोजिदीक्षीत, व्या. डॉ. रमाकान्त पाण्डेय, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी : २००७.
  • बृहच्छब्देन्दुशेखर, नागेशभट्ट, चौखम्बा प्रकाशन, दिल्ली.
  • महाभाष्य, पतञ्जलि, सं. वेदव्रत शास्त्री,गुरुकुल झज्जर, हरियाणा : १९६४.
  • लघुशब्देन्दुशेखर: (कारकाव्ययीभावप्रकरणात्मक:), नागेशभट्ट, सं. श्री कृष्णानन्द झा, कामेश्वरसिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभङ्गा : २००३.
  • वाक्यपदीय , भर्तृहरि, चौखम्बा प्रकाशन, दिल्ली : १९९५.
  • वैयाकरणसिद्धान्तमञ्जूषा, नागेश भट्ट, सं. कालिकाप्रसाद शुक्ल, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी : १९७७.
  • वैयाकरणभूषणसार:, (“प्रभा” “दर्पण” व्याख्याद्वयोपेत:), कौण्डभट्ट, चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी : वि. सं. २०६८.
  • वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी (तत्त्वबोधिनिबालमनोरमाशेखरव्याख्यात्रयविराजिता) प्रथम भाग, भट्टोजिदीक्षित, सं. श्रीगुरुप्रसादशास्त्री, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी : २०१२.

 

  • सहायक ग्रन्थ
  • हिन्दी ग्रन्थ
  • उपाध्याय, बलदेव, संस्कृत शास्त्रों का इतिहास, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी : २००६.
  • कुमार, अरविन्द, भवानन्दकृत कारकचक्र का एक अध्यायन (व्याकरणशास्त्र एवं नव्यन्याय के आलोक में), निर्मल बुक एजेन्सी, कुरुक्षेत्र हरियाणा :१९९२.
  • जयराम, पण्डित, कारकवादार्थ:, श्रीवेङ्कटेश मुद्रणालय, मुम्बई :१९१०.
  • ताताचार्य, एन. एस. रामानुज, सुबर्थ विचार (भाग) , राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली : २००६.
  • मीमांसक, युधिष्ठिर, संस्कृत व्याकरण का इतिहास (प्रथम), रामलाल कपूर ट्रस्ट, हरियाणा : १९९४, द्वितीय : २०००.
  • शर्मा, उमाशङ्कर, संस्कृत व्याकरण में कारकतत्वानुशीलन (पाणिनि तन्त्र के सन्दर्भ में), चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी : १९९७.

 

 

[1] म. भा.

[2] (क)“तत्र सर्वकारकाणां धात्वर्थेऽन्वय:” । – लघुमञ्जूषा, पृ. ५४४ ।

(ख) “सर्वकारकान्वययितावच्छेदकधर्मवती क्रिया”। – परमलघुमञ्जूषा, पृ. १३४ ।

[3] “भूवादयो धातव:”। -अष्टाध्यायी, १-३-१ ।

[4]  लघुमञ्जूषा, पृ. ५४४ ।

[5] महाभाष्य, १-३-१ ।

[6] “इह सर्वेषु साधनेषु सन्निहितेषु कदाचित्पवतीत्येतद् भवति, कदाचिन्न भवति। यस्मिन्सन्निहिते पचतीत्येतद् भवति सा नूनं क्रिया। अथवा, यया देवदत्त इह भूत्वा पाटलिपुत्रे भवति, सा नूनं क्रिया”। वही, १-३-१ ।

[7] “सुप्तिङन्तं पदम्” । अष्टाध्यायी, १-४-१४ ।

[8] “अपदं न प्रयुञ्जीत” ।

[9] “कारकाणां प्रवृत्तिविशेष: क्रिया:। – व्याकरणमहाभाष्य, प्. १२३ ।

[10] “एकतिङ् वाक्यम्” ।

[11] “मधुपर्क: मधुपर्क: मधुपर्क: इत्याचार्येणोक्ते:, मधुपर्क: प्रतिगृह्यतामिति पिता ब्रूयात्,

मधुपर्क प्रतिगृह्णामीति वरो ब्रूयात्”।

  • आश्वलायन गृह्यसूत्र, १-२४-७ ।

[12] “आख्यातं साव्ययकारकविशेषणं वाक्यम्”।        – सर. १-१-३१।

[13] सर. १-१-३२।

[14] सर.  १-१-७४।

[15] विषय: विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम्।

निर्णयश्चेति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम्॥……..

[16]  वही, १-१-३२।

[17] “चैत्रस्य तण्डुलं पचतीति सम्बन्धिनि चैत्रादावतिव्याप्ते:। अनुमत्यादिप्रकाशनद्वारा सम्प्रदानादेरिव तण्डुलदिद्वारा सम्बन्धिनोऽपि क्रियानिमित्तत्त्वात्”।                                      –  प. ल. मं., पृ. १६९।

[18]  “स्वाश्रये समवेतानां तद्वदेवाश्रयान्तरे।

क्रियाणामभिनिष्पत्तौ सामर्थ्यं साधनं विदु:”॥     – सर. ह्दयहारिणी, १-१-३२ की व्याख्या में उद्धृत।

[19]  अ. १-४-२३

[20]  सर. १-१-७४।

[21] वही, १-१-५१।

[22] “व्यवस्थितविभाषेयम्। तेन प्रतिविषयं संज्ञाद्वयं न भवति”।    हृद. सर. १-१-५१।

[23]  अ. १-४-१

[24]  वही, २-२-३८

[25]  अ. १-४-२ ।

[26]  अ. ७-३-१०२।

[27]  अ. ७-३-१०३।

[28]  परिभाषेन्दुशेखर – १२०, पृ. ३९८।

[29]  “अपादानसम्प्रदानकारणाधारकर्मणाम्।

कर्तुश्चोभयसम्प्राप्तौ परमेव प्रवर्तते। – श. श. प्र.,  पृ. ३४५ पर भर्तृहरि के नाम से उद्धृत।

[30]  अ. १-४-२४।

[31]  वही, १-४-५१।

[32] सर. १-२-११९।

[33]  सर. १-२-१२८।

[34]  सर. ७-३-३८।

[35]  सर. १-२-२८।

[36]  सर. ७-४-१७४।

[37]  सर. १-२-१२९।

[38] सर. कं. १-२-६३।

[39](क) द्र.- “अदृष्टार्था त्वधीतिर्विहितत्त्वात्” – सायणकृत ऋग्भाष्यभूमिका, स्वाध्याय प्रकरण, पृ…..

(ख) विधिरत्यन्तमप्राप्ते”।            – अर्थसंग्रह, पृ. १२४।

[40] “ सतोऽप्यविवक्षा भवति, तद्यथा- अलोमिकैडका, अनुदरा कन्येति। असतश्च विवक्षा भवति- “समुद्र: कुण्डिका, विन्ध्यो वर्धितकमिति”।                          – व्या.म., १-४-२४, पृ.३६० ।

[41] “ शक्तिमात्रासमूहस्य विश्वस्यानेकधर्मण:।

सर्वदा सर्वथा भावात् क्वचित् किञ्चिद् विवक्ष्यते”॥                -वा.प., सा.स., कारिका-२।

[42] “साधनं व्यवहारश्च बुद्ध्यवस्थानिबन्धन:।

सन्नसन्वार्थरूपेषु भेदो बुद्ध्या प्रकल्पते॥               – वही, कारिका- ३।

[43] “बुद्ध्यैकं भिद्यते भिन्नमेकत्वं चोपगच्छति”।     – हेलाराज, वही, कारिका- ३।

[44] “निष्पत्तिमात्रे कर्तृत्वं सर्वत्रैवास्ति कारके।

व्यापारभेदापेक्षायां करणत्वादिसम्भव:॥            – वा.प., सा.स., कारिका-१८।

[45] “पुत्रस्य जन्मनि यथा पित्रो: कर्तृत्वमुच्यते।

अयमस्यामियं त्वस्मादिति भेदो विवक्षया॥          – वही, कारिका- १९।

[46] “विवक्षा च कुलवधूरिव, न लौकिकीं प्रयोगमर्यादामतिक्रामति।…….विवक्षायाश्च नियतत्वात् सत्यप्यपाये धनुषा विध्यतीत्येव,

न धनुषो विध्यतीति”।    – हृद.हा,  सर.कं., १-२-६३।

[47] “अस्यादीनां तु कर्तृत्वे तैक्ष्णादि करणं विदु:।

तैक्ष्णादीनां स्वतन्त्रत्वे द्वेधात्मा व्यवतिष्ठते”॥     – वाक्य. साधनसमुद्देश, कारिका- ९६।

[48] “उत्कृष्टं नैव करणमन्यैस्तुल्यत्वदर्शनात्।

कथमिच्छामभावस्य को हि कुर्यादबालिश:”॥  – पुरुषोत्तमदेव, कारकचक्र, पृ. १०८।

[49] “यथा च सन्निधानेन करणत्वं प्रतीयते”।

तथैवासन्निधानेऽपि क्रियासिद्धे: प्रतीयते”॥   – वाक्य. साधनसमुद्देश, कारिका- ९७।

[50] “यदा सन्दर्शनादयो भेदेन विवक्ष्यन्ते, तदा शयनादिभिरभिप्रेयमाणस्य पत्यादे: सम्प्रदानत्वम्”।  हृद. सर. १-१-५६, पृ. १८।

[51] “यदा पुनरभेदेन विवक्ष्यन्ते, तदा नेतीत्येतमेवार्थं प्रथयति”।   – वही, पृ. १८।

[52] “विवक्षा च नियता। तथाहि- पत्ये शेते इत्यादौ भेदविवक्षा। कटं करोतीत्यादावभेदविवक्षा। ग्रामं गच्छति, ग्रामाय गच्छति इत्यादौ भेदाभेदविवक्षेति प्रयोग सङ्करो न भवति”।        – वही, पृ. १८।

[53] “भेदाभेदविवक्षा च स्वभावेन व्यवस्थिता

तस्माद् गत्यर्थकर्मादौ व्यभिचारो न विद्यते”॥       – वाक्य. साधनसमुद्देश, कारिका – १३३।

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