शिक्षा और नैतिकमूल्यों का अभेदान्वय 2.6/5 (5)

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प्रियंका चौरसिया
शोधच्छात्र, संस्कृत विभाग
बुंदेलखण्ड विश्वविद्याल, झांसी

आदिकाल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में शिक्षा का बहुत महत्व रहा है शिक्षा को मोक्ष का साधन -भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में ‘आध्यात्म विद्यानाम्’ कहकर इसी सिद्धान्त का समर्थन किया है।शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए उसके विभिन्न ज्ञान तंतुओं को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया है। इसके द्वारा लोगों में आत्मसात करने, ग्रहण करने, रचनात्मक कार्य करने, दूसरों की सहायता करने और राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों में पूर्ण सहयोग देने की भावना का विकास होता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को परिपक्व बनाना है ! साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य साक्षात् नाखून और सींघ रहित पशु के समान है।ज्ञान की प्राप्ति शिक्षा या विद्या से होती है दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। ‘शिक्ष्’ धातु से शिक्षा शब्द बना है, जिसका अर्थ है – ज्ञान पाना। जो हमें अज्ञान के बंधन से मुक्त कर दें अर्थात् अज्ञान निवृत्ति ही आत्मज्ञान है। शिक्षा की प्रक्रिया युग सापेक्ष होती है। युग की गति और उसके नये-नये परिवर्तनों के आधार पर प्रत्येक युग में शिक्षा की परिभाषा और उद्देश्य के साथ ही उसका स्वरूप भी बदल जाता है यह मानव इतिहास की सच्चाई है।
भारत की प्राचीन शिक्षा आध्यात्मिकता पर आधारित थी जिसमें ध्यान, योग, तपस्या शिक्षा का साधन था। शिक्षा मुक्ति, आत्मबोध और नैतिकमूल्यों के महत्व पर आधारित थी।

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