अभिधम्मत्थसंगहो में निरय एक अध्ययन 3/5 (2)

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पवित्रा अग्रवाल

पी.एच.डी. (शोध-छात्रा)

pavitracss@gmail.com

9711870873

विशिष्टसंस्कृताध्ययनकेन्द्र

जवाहरलालनेहरुविश्वविद्यालय

नई दिल्ली

 

अभिधम्मत्थसंगहो में निरय एक अध्ययन

‘अभिधम्मत्थसंगहो’ आचार्य अनुरुद्ध द्वारा विरचित है । आचार्य अनुरुद्ध का समय ३७५-४५० ई. निश्चित किया गया है, इसलिए अभिधम्मत्थसंगहो का समय भी पाँचवी शताब्दी का प्रारम्भ स्वीकार किया जा सकता है । धर्म से ही कुछ अतिरेक अर्थ में अभिधर्म है, जैसा कि स्पष्ट है –

तत्थ अभिधम्मो ति केनट्ठेन अभिधम्मो ? धम्मातिरेक-धम्मविसेसट्ठेन, अतिरेक-विसेसत्थदीपको हि एत्थ अभिसद्दो ।[1]

अभिधर्म पिटक को आकरग्रन्थ मानकर अभिधर्मवादियों की दो परम्पराएँ परस्पर विकसित हुई, जिसमें सर्वास्तिवादियों का प्रमुख ग्रन्थ है आचार्य वसुबन्धु रचित अभिधर्मकोश, जो संस्कृत भाषा में है तथा स्थविरवादियों का प्रमुख ग्रन्थ है अभिधम्मत्थसंगहो, जो पालि में है। ‘अभिधम्मत्थसंगहो’ पालि अभिधम्मपिटक का सार है । यह ग्रन्थ कालान्तर में इतना अधिक प्रसिद्ध हुआ कि इस पर कई भाषाओं में टीकाओं की रचना की गई ।

अभिधर्म के चार विषयों का ही संक्षेप में वर्णन किया गया है जो हैं चित्त, चैतसिक, रूप तथा निब्बान । ‘निरय’ का सिद्धान्त जो इस आलेख का विषय है वह अपायभूमि के अन्तर्गत आता है । अपायभूमि की परिभाषा इस प्रकार दी गई है –

तिविध सम्पत्तियो अयन्ति, गच्छन्ति, पवत्तन्ति, एतेना ति अयो, अयतो अपगतो अपायो । [2]

मनुष्यसुख, देवसुख तथा निर्वाण सुख तीन सम्पत्तियाँ हैं, और ये तीनों जिससे प्राप्त होती हैं, वह ‘अय’ है । अर्थात् कुशल कर्म ही ‘अय’ हैं, इन अयों से जो रहित है वह अपायभूमि है । अर्थात् अकुशल कर्म तीनों प्रकार के सुखों से मनुष्य को बहुत दूर ले जाते हैं । अपायभूमियाँ चार प्रकार की हैं । जिनमें से प्रथम है ‘निरय’ ।

अयतो सुखतो निग्गतो ति निरयो । [3]

इसके अतिरिक्त कुछ और स्थानों पर भी निरय का वर्णन प्राप्त होता है जैसे-

सुखसञ्जातो अयो एत्थ नत्थीति निरयो । [4]

नत्थि एत्थ अस्सादसञ्ञितो अयो ति निरयो । [5]

यहाँ ‘अय’ शब्द सुखार्थक है । जो कुशल कर्मों को बढाता है वह धर्म अय है और जिस भूमि में अय (सुख) नहीं वह निरय है । उस ‘अय’ से विनिर्गत भूमि को ‘निरय’ कहते हैं । अर्थात् सुख से पूर्णतया रहित स्थान ही ‘निरय’ है । सुख से राहित्य, दुःख की परिपूर्णता को भी द्योतित करता है । ‘निरय’ को मुख्यतया आठ प्रकार का कहा गया है, अन्य कुछ गौण निरयों के भी नाम प्राप्त होते हैं ।

बौद्ध धर्म का ये विश्वास है कि पृथ्वी २,४०,००० योजन गम्भीर है । वह १,२०,००० योजन पर्यन्त मृत्तिकामय है, शेष १,२०,००० योजन भाग पाषाणमय है । ऊपर के १,२०,००० योजन मृत्तिकामय भाग में क्रमशः ऊपर से नीचे आठ निरय होते हैं । एक निरय से दूसरे निरय के मध्य में १५,००० योजन का अन्तर होता है । अर्थात् इस मनुष्यभूमि के तल से १५,००० योजन नीचे ‘संजीव’ नामक निरय है, उससे १५,००० योजन नीचे कालसूत्र है । इसी तरह अन्य निरयों के सम्बन्ध में जाना जा सकता है ।[6]

मनुष्य को निरय में भेजने का कार्य वैमानिक प्रेतराज अथवा धर्मराज करते हैं । प्रेतराज एक नहीं अपितु अनेक होते हैं जिस प्रकार पृथ्वी पर अनेक राजा होते हैं उसी प्रकार एक निरयभूमि के चारों द्वारों पर चार यमराज विद्यमान होते हैं । वे उस भूमि पर आने वाले सभी सत्त्वों से पूछताछ नहीं करते । जिनके अकुशल कर्म अधिक बलवान होते है उन्हें तो सीधे ही नरक में चले जाना पड़ता है; परन्तु जिनके अकुशल कर्म उतने बलवान नहीं होते ऐसे सत्त्वों को नरक से छुटकार दिलाने के लिए नरकपाल उन्हें यमराज के पास ले जाते हैं । यहाँ इन्हें धर्मराज भी कहा जाता है, क्योंकि ये मनुष्य को यथासंभव निरय से बचाने का प्रयास करते हैं । इसके लिए उन सत्त्वों से पूछताछ होती है, यह पूछताछ यातना देने के लिए नहीं बल्कि नरक से छुटकारा दिलाने के लिए होती है । इसके लिए यह मनुष्य को कोई भी कुशल कर्म याद करने को कहते हैं, तत्पश्चात् स्वयं भी याद करते हैं कि क्या इसने कोई कुशल कर्म किया है । यमराज को अगर अपने पुण्य का कुछ भाग दान किया होता है तो यमराज व्यक्ति का निरयकाल कम कर देते हैं । इसलिए यहाँ यमराज दुष्टराज न होकर धर्मराज होते हैं ।[7] बौद्धों में आज भी अपने किए गए पुण्य में से ‘पातिदान’ करने की प्रथा है । बौद्ध-धर्म में पाँच देवदूत माने जाते हैं – १. शिशु २. वृद्ध ३. रुग्ण ४. अपराधी ५. मृत । क्योंकि ये यमराज द्वारा प्रेषित दूत की भाँति होते हैं । यमराज नरक में पहुँचने वाले सत्त्वों से इन्हीं पाँचों को दिखा-दिखा कर पूछताछ करते हैं ।[8]

‘देव’ शब्द का अर्थ यहाँ मृत्यु है तथा मृत्यु के ही दूत होने से वे सभी देवदूत हैं । ये मनुष्यों को उसकी सीमाओं की जानकारी देते हैं । इन सबकी उपेक्षा करते हुए भी यदि मनुष्य अकुशल कर्मों में लीन रहता है तो उसके लिए कोई भी एक ‘निरय’ निश्चित होता है । ये सभी ‘निरय’ अलग-अलग अकुशल कर्मों के फल होते हैं । यह निरय सञ्जीव, कालसुत्त, संघात, जालरोरुव, धूमरोरुव, तापन, पतापन एवं अवीचि इस तरह आठ प्रकार का होता है, इनका वर्णन इस प्रकार है –

  • सञ्जीव निरय

जलितावुधहत्थेहि खण्डितापि नेरयिका ।

जीवन्ता यम्हि पुनो पि ‘सञ्जीवो’ ति पवुच्चते ॥[9]

अर्थात् जिस नरक में सत्त्व जलते हुए शस्त्र लिये नरकपालों द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाने पर भी बार-बार जीवित हो जाता है उस नरक को सञ्जीव नरक कहते हैं ।

 

  • काळसुत्त निरय (कालसूत्र) –

काळसुत्तेन तच्छन्ति यम्हि निरयपालका ।

अनुबन्धा पपतन्ते ‘काळसुत्तो’ पवुच्चते ॥[10]

अर्थात् नरक में नरकपाल सत्त्व के पीछे दौड़ते हुए उन्हें कालसूत्र से निशान लगाने पश्चात् बढई की भाँति उन्हें काटते हैं वह नरक कालसूत्र कहलाता है ।

  • सङ्घात निरय-

अयोमयपथव्यं हि कटिमत्तं पवेसिते ।

अयोसिला संघाटेन्ति  ‘संघाति’ ति पवुच्चते [11]

अर्थात् जिस प्रकार नरक में नरकपाल नरक में पड़े जीवों को नौ योजन पर्यन्त लौहमय पृथ्वी में कटि तक प्रवेश करवा के शिलाओं के द्वारा पीसते हैं उस नरक को संघात कहते हैं ।

  • जालरोरुव निरय (ज्वालरौरव) –

जालाहि पविसित्वान डय्हमाना दयावहं ।

महारवं रवन्तेत्थ वच्चते जालरोरुवो ॥ [12]

अर्थात् इस नरक में नरकजीवों के शरीर को नौ द्वारों में प्रविष्ट करवायी गई ज्वालाओं द्वारा दग्ध किया जाता है जिससे नारकीय सत्त्व दयनीय क्रन्दन करते हैं । इस कारण यह ज्वालरौरुव नरक है ।

  • धूमरोरुव निरय (धूमरौरुव) –

धूमेहि पविसित्वान सेदमाना दयावहं ।

महारवं रवन्तेत्थ वुच्चते धूमरोरुव ॥ [13]

अर्थात् इस नरक में नारकीय सत्त्वों के शरीर को नौ द्वारों में प्रविष्ट करवायी गयी धूम द्वारा प्रताड़ित किया जाता है जिससे नारकीय सत्त्व करुण क्रन्दन करते हैं इस तरह यह धूमरोरुव नरक है ।

  • तापन निरय (तपन) –

जलिते अयसूलम्हि निच्चलं निसिदापिते ।

तापेति पापके पाणे तापनो ति पवुच्चते ॥[14]

अर्थात् इस नरक में जलते हुए शूल पर सत्त्वों को निश्चल बैठाकर सन्ताप दिया जाता है इस कारण यह तापन नरक है ।

  • पतापन निरय (प्रतापन) –

अयसेलं आरोपेत्वा हेट्ठा सूलं पतापिय ।

पापके यो पतापेति पतापनो ति वुच्चते ॥[15]

अर्थात् अयःशैल पर बैठाकर नीचे से तीक्ष्ण शूलों पर गिराकर जो नरक पापी सत्त्वों को सन्ताप देता है उसे प्रतापन नरक कहते हैं ।

  • अवीचि निरय –

जालानं सत्तानं यत्थ नत्थि दुक्खस्स अन्तरं ।

बालानं निवासो सो हि अवीचीति पवुच्चते ॥[16]

जिस नरक में ज्वालाओं और दुःखों का अन्त नहीं है अर्थात् ज्वालाओं द्वारा सत्त्वों को निरन्तर प्रताड़ित करते जाने से उनके दुःख निरन्तर बढते रहते है और मूढ सत्त्वों को इस नरक में हमेशा के रह जाना होता है इस कारण से यह अवीचि नरक कहलाता है।

इनके अतिरिक्त अन्य कुछ क्षुद्र नरक भी माने जाते हैं । जिन्हें ‘उस्सद निरय’ कहा गया है ।

अधिकयातनास्थानत्वासुत्सदः । [17]

‘उस्सद’ शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है । यहाँ ‘उत्’ शब्द ‘अधिक’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । अधिक यातना का स्थान होने से इन्हें ‘उस्सद’ कहते हैं । अर्थात् अवीचि आदि नरकों में जाने के पश्चात् भी जिनके पापकर्म शेष रहते हैं उनके लिए और अधिक यातना के स्थान में उस्सद निरय हैं । ये चार प्रकार के हैं, इनका वर्णन इस प्रकार है –

  • गूथनिरय –

अवीचिम्हा पमुत्तापि अमुत्ता सेसपापिनो ।

पच्चन्ति पूतिके गूथे तस्सेव समनन्तरे ॥[18]

अर्थात् अवीचि निरय से मुक्त होने के पश्चात् भी जिस सत्त्व के अकुशल कर्म शेष हैं वे पापी सत्त्व मुक्त न होकर अवीचि नरक के समीप स्थित गूथनिरय नामक नरक में प्रताड़ित किए जाते हैं ।

  • कुक्कुलनिरय (कुकूल) –

पुउतिगूथा पमुत्तापि अमुत्ता सेसपापिनो ।

पच्चन्ति कुक्कुले उण्हे तस्सेव समनन्तरे ॥ [19]

अर्थात् पूर्व नरक (गूथनिरय) से मुक्त होने पर भी जिन सत्त्वों के अकुशल कर्मों का नाश नहीं हुआ है वे सत्त्व मुक्त न होकर पूर्व नरक के समनन्तर स्थित गर्म भस्म वाले कुक्कुलोण्ह नामक नरक में पकाये जाते हैं ।

  • सिम्बलिवन निरय (अयःशाल्मलीवन)-

कुक्कुलोण्हा पमुत्तापि अमुत्ता सेसपापिनो ।

पच्चन्ति सिम्बलीदाये तस्सेव समनन्तरे ॥ [20]

अर्थात् जिन सत्त्वों के अकुशल कर्म कुक्कुलोण्ह नरक में जाकर भी नष्ट नहीं हो पाये हैं वे मुक्त न होकर सिम्बलीदाय नामक नरक में प्रताड़ित किये जाते हैं ।

  • असिपत्त निरय (असिपत्र)-

सिम्बलिम्हा पमुत्तपि अमुत्ता सेसपापिनो ।

पपचन्ति असिपत्ते तस्सेव समनन्तरे ॥ [21]

जिन नारकीय सत्त्वों के अकुशल कर्मों का अन्त सिम्बलीदाय नामक नरक में जाकर भी पूर्णतया नष्ट नहीं हुए हैं वे सत्त्व पूर्व नरक के समनन्तर बने हुए असिपत्त नामक नरक में पड़कर जलते हैं ।

  • खारोदक (क्षारोदक)-

असिपत्ता पमुत्तापि अमुत्ता सेसपापिनो ।

पपचन्ति खारोदके तस्सेव समनन्तरे ॥ [22]

अर्थात् उस असिपत्त नामक नरक से भी जिन के अकुशल कर्म समाप्त नहीं हुए हैं वे मुक्त होने की अपेक्षा खारोदक नामक नरक में पकाये जाते हैं ।

निरय के अध्ययन का मूल उद्देश्य मानव को अकुशल कर्मों से हटाकर कुशल धर्मों की ओर प्रेरित करना है । मनुष्य केवल अपने कर्मों का फल प्राप्त करता है फिर भले ही वह कर्म उसके द्वार स्वयं किए गए हों या किसी के द्वार प्रेरित किए जाने पर किए गए हों ।

अभिधम्मत्थसंगहो में उद्देश रूप में ही कहे गए विषय को उसकी टीकाओं में विस्तार से वर्णन किया गया है । यह सिद्धान्त अट्ठकथाओं में भी इसी रूप में प्राप्त होता है । अतः कहा गया है कि “यावञ्चिदं भिक्खवे! न सुकरा अक्खानेन पापुणितुं याव दुक्खा निरया”[23] अर्थात् भिक्षुओ! नरक में जितने दुःख हैं उनका व्याख्यान द्वारा पार पाना अत्यन्त दुष्कर है । ‘निरय’ के सिद्धान्त का उद्देश्य यही था कि लोग इससे डरते रहें तथा कुशल कर्मों में प्रमाद न करें । क्योंकि कुशल कर्म ही मनुष्य को निब्बान सुख तक पहुंचा सकते हैं । इन नरकों और इनके दुःखों का वर्णन करना अत्यन्त दुःसाध्य है । अतः मानव को अकुशल कर्मों से प्राप्त ऐश्वर्यों के प्रति आसक्ति को त्यागकर कुशल कर्मों द्वारा प्राप्त ज्ञान से ही जीवन का कल्याण समजना चाहिए । अकुशल कर्मों में आसक्ति त्यागकर करुणा, मुदिता, मैत्री को अपना कर संसार के लिए कल्याणकारी कार्यों का सम्पादन करना चाहिए ।

UGC Approved Journals

सन्दर्भ संकेत –

अभिधम्मत्थसंगहो, स्यामी संस्करण, महामुकुट राजविद्यालय

अभिधम्मत्थसंगहो, रोमन संस्करण, जर्नल ऑफ पालिटेक्सट सोसायटी १८८४

अभिधम्मत्थसंगहो, सिंहली संस्करण, भिक्षु पञ्ञानद , १८९८

अभिधम्मत्थसंगहो, आचार्य नुरुद्ध, संपा. आचार्य बलदेव उपाध्याय, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी

स्फुटार्था (अभिधर्मकोशभाष्य की यशोमित्रकृतटीका), रोमन संस्करण, टोकियो, जापान

विभावनी (अभिधम्मत्थसंगहो की टीका), बर्मी संस्करण

अभिधर्म कोश, अनु. आचार्य नरेन्द्र देव, हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद. १९५८

अभिधर्म कोश, संपा. राहुल सांकृत्यायन, काशी विद्यापीठ, वाराणसी. १९८८

अट्ठसालिनी, भण्डारकर ओरिएन्टल सीरिज, पूना. १९४२

मज्झिम निकाय, अनु. राहुल सांकृत्यायन, सम्यक् प्रकाशन, नई दिल्ली.

अंगुत्तर निकाय, अनु. राहुल सांकृत्यायन, सम्यक् प्रकाशन, नई दिल्ली.

 

[1] अट्ठ्, पृ. २

[2] अभि.संगहो, पृ. ४६६

[3] विभा. पृ. १२३

[4] अट्ठ. पृ. ३०७

[5] विसु. पृ. २९७

[6] अभि.संगहो, पृ. ४६८

[7] म.नि. (उपरिपण्णासक) पृ, १६४

[8] अ.नि., द्वि. भा. पृ. ११७

[9] अभि. को. पृ. ३७२

[10] अभि. को. पृ. ३७३

[11] अभि. को. पृ. ३७२

[12] अभि. को. पृ. ३७२

[13] अभि. को. पृ. ३७२

[14] अभि. को. पृ. ३७२

[15] अभि. को. पृ. ३७३

[16] अभि. को. पृ. ३७२

[17] स्फु. पृ. ३२३

[18] अभि.संगहो, पृ. ४७२

[19] अभि.संगहो, पृ. ४७२

[20] अभि.संगहो, पृ. ४७२

[21] अभि.संगहो, पृ. ४७३

[22] अभि.संगहो, पृ. ४७३

[23] म.नि. तृ.भा. पृ. २३७

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