संस्कृत साहित्य में वर्णित चतुःषष्टि कला की उपयोगिता 3.25/5 (4)

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प्रियंका चौरसिया
शोधच्छात्र (संस्कृत विभाग)
बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

कलाओं की दृष्टि से संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन प्रायः उपेक्षित सा ही रहा है। आनन्दमयी सृष्टि की रचना ही ‘कला’ है। परवर्ती युग में सामान्य रूप से किसी भी कर्म में विशेष कुशलता को ‘कला’ कहा जाने लगा। कार्य करना ही ‘कला’ नहीं है अपितु उस कार्य को अत्यन्त सुन्दरता, कुशलता, निपुणता तथा सुरुचिपूर्ण ढंग से करना जिसे देखकर सब विस्मित हो जाये कला है। कला दूसरे शब्दों में हुनर को कहते हैं। कला वह है जो अपूर्ण को पूर्ण, असुन्दर को सुन्दर तथा अशिव को शिव बनाती है।ईश्वररचित इस संसार में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सत् असत्, उचित अनुचित, कर्त्तव्य अकर्त्तव्य में अन्तर कर पाने के साथ-साथ सृजनशील भी है। नित्य नूतन निर्माण कर वह ईश्वरीय सृष्टि को सजाता संवारता रहता है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। अथर्ववेद के भूमि सूत्त में स्पष्ट कहा गया है – शिल्प अथवा कला एक सृष्टि है, एक संरचना है।

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