राम की समसामयिकता 4.33/5 (3)

0
42 views

 

मृगांक मलासी

शोधच्छात्र

संस्कृत विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

ई-मेल : mrigankmalasi@gmail.com

 

भारतीय वाङ्मय में महर्षि वाल्मीकिप्रणीत रामायण को आदिकाव्य माना जाता है। काव्य का सम्बन्ध अथ से लेकर इति तक होता है। अतः उसके लिए धर्म, इतिहास, दर्शन, लोक-जीवन, आचार-विचार और परम्पराएँ सभी कुछ ग्राह्य होता है। कहना न होगा कि पनघट से लेकर मरघट तक हर्ष-विषाद, उत्कर्ष-अपकर्ष, स्तुति-निन्दा, शैशव-जरा, स्थूल-सूक्ष्म, योग-भोग तथा सृष्टि-प्रलय आदि सभी द्वन्द्वात्मक तत्त्वों एवं स्थितियों का काव्य में स्वाभाविक समावेश होता है। यदि कहा जाए कि वही काव्य शाश्वत होता है जिसके मूल में दार्शनिक, सामाजिक चेतना प्रतिष्ठित होती है तो असंगत न होगा।

जीवन और जगत् विषयक दृष्टि का नाम दर्शन है। दर्शन सत्-असत् के विचार के अन्वेषण और विवेचन को लेकर प्रवृत्त होता है। दार्शनिक मूल्यों और मानों ने वैदिक काल से ही भारतीय जीवन को शुद्ध, सात्विक. सर्वाङ्गीण तथा उदात्त आकार दे रखा है। आज की साहित्य समीक्षा जब तक की जीवन मूल्यों की रचना का प्रतिमान नहीं बनाती तब तक उसका अस्तित्व न तो रचना के संरक्षण के लिए माना जा सकता है और न पाठक के मार्गदर्शन के लिए ही उपयोगी हो सकता है।

जब चिन्तन का स्पर्श समस्या कर लेती है, तब वह समाधान का सार्वकालिक मार्ग खोजने लगता है। विश्व में यही दर्शन की उद्भूति है। यह चिन्तन देशकाल की सीमाओं में रहते हुए भी उनसे अतीत होता है। जब उन समाधानों की दिशा में मानव प्रयास आरम्भ कर देता है, तब साधन का जन्म होता है। अन्वेषण कामी और क्रियाशील मनुष्य को सिद्धि की चरम सीमा का आनन्द तो मिलता ही है साथ ही साधना के सोपानों पर व्यक्ति के आरोहण का सुख भी उसे कम परितोष नहीं देता।

आज के समय में सामान्य नागरिक यही सोचता है कि बस किसी भी प्रकार से पुनः राम राज्य की स्थापना हो सके। जो भी यह सोचता है उसने कभी भी राम राज्य नहीं देखा पर पारिवारिक संस्कारों अथवा सामाजिक गतिविधियों से उसने यही सीखा है कि राम राज्य एक आदर्श राज्य की संकल्पना थी। स्वयं गाँधी जी ने ११ फरवरी १९२१ को अयोध्या में साधुओं की सभा को उद्बोधित करते हुए कहा था – ‘हम लोग इस तरह से प्रेम करना सीखें जैसे राम सीता से करते थे। जब तक हम अपने धर्म का पालन सेवा और निष्ठा से नहीं करेंगे तब तक हम न ही ‘स्वराज्य’ पा सकते हैं और न ही अपने धर्म का राज्य।’ गाँधी जी ने उसी वक्तव्य में आगे कहा था कि ‘आपका कर्तव्य मारना नहीं है, अपितु मरना है। जो पहले मरता है वही सर्वशक्तिमान है। जब वशिष्ठ ने राम को कुछ करने का आदेश दिया, राम उसे जी जान से करने को तैयार हो गए थे।’[1]

मानव राम ने भगवान श्रीराम का आदर्शात्मक स्तर प्राप्त किया। राम को निर्गुण, सर्वव्यापी, प्रजापालक, परमात्मा एवं सर्वेश्वर श्रीविष्णु[2]  का अवतार माना गया है। भारतीय संस्कृति राम को पूजती चली आ रही है। राम जहाँ भी गये वह स्थल राममय हो गया।

त्रेता युग से द्वापर युग और कलयुग के ५००० से भी अधिक वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी राम की जीवन्तता इस बात की पुष्टि करती है कि राम का अस्तित्व कदापि विलीन नहीं हो सकता। उच्च न्यायालय के न्यायधीशों ने इस यथार्थता की अभिव्यक्ति के लिए अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय में इकबाल के शेर को उद्धृत किया-

है राम के वजूद में हिन्दोस्तां को नाज

अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द।

समस्त भारतीय समाज ने उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक राम को समान आदर्श के रूप में स्वीकार किया है। वाल्मीकिकृत रामायण के अतिरिक्त कृतिवास रामायण (बंगाली), भावार्थरामायण (मराठी), तुलसीदासकृत रामचरितमानस, बत्तलेश्वर रचित कौशिक रामायण, कम्बनकृत कम्बलरामायण आदि प्रायः ३०० रामायण विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध हैं। वाल्मीकि का यह कथन ‘समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव।’ राम के आदर्श को प्रस्तुत करते हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त पूछते हैं-

राम तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?

हो गया निर्गुण, सगुण साकार है;

ले लिया अखिलेश ने अवतार है।

भारत का संविधान २६ नवम्बर १९४९ को भारत की संविधान सभा ने भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोक तन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिये दृढ़ संकल्प होकर अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया। इस प्रकार न्यायाधिपति श्री सुब्बाराव के अनुसार उपर्युक्त ‘उद्देशिका’ (प्रीयम्बल) अधिनियम के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं का उल्लेख करती है। भारत का संविधान यद्यपि धर्म, पंथ-निरपेक्ष शब्द का प्रयोग तो करता है लेकिन इन शब्दों की व्याख्या नहीं करता। भारत में प्राचीन काल से राज्य धर्म के सम्बन्ध में पूर्णतः तटस्थ रहा है। राज्य प्रत्येक धर्म को समान रूप से संरक्षण प्रदान करता है किन्तु किसी धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता। राज्य का सम्बन्ध मानव में आपसी सम्बन्धों से रहता है- इनके आधारभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन राम ने किया। इन्हीं आधारभूत सिद्धान्तों का समावेश भारत के संविधान के भाग तीन में मौलिक अधिकारों के रूप में परिलक्षित होते हैं।[3]

भारत के संविधान भाग तीन के प्रावधानों का उल्लेख एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चित्र से प्रारम्भ होता है। संविधान की मूल प्रति जिसमें संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, के पृ०६ पर अत्यन्त आकर्षक रेखाचित्र है जिसमें वल्कल वस्त्रों में अलौकिक विजयी मुद्रा में धनुष धारण किये, सौम्य एवं सुन्दर जनकनन्दिनी व सीधे हाथ में तलवार को आक्रामक रूप से धारण किये हुए पराक्रमी रक्षक कनिष्ठ भ्राता लक्ष्मण पुष्पक यान में विराजमान हैं। विमान से उभरती हुई विभिन्न तरंगे प्रदर्शित करती हैं कि विमान तीव्र गति से गन्तव्य की ओर अग्रसर हो रहा है।

भारत के संविधान की मूल हस्तलिखित प्रति के पृष्ठ ६ पर अंकित राम के चित्र को भारत के संविधानों से हटाने के प्रयासों के सन्दर्भ में सन् १९९१ में दायर एक अभ्यर्थना को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया।[4] लेकिन राम के चित्र के आधार पर ही प्रयाग उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति हरिनाथ तिलहरी और ए.एन. गुप्ता ने कहा कि ‘संविधान की मूल प्रतियों में अंकित रेखाचित्रों से संकेत मिलता है कि संविधान सभा ने श्रीराम को राष्ट्र नायक एवं राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत व श्रद्धा के पुरुष के रूप में स्वीकार किया था। इन न्यायधीशों ने कहा कि राम का जीवन दर्शन देश का आदर्श है। संविधान के आधार पर राम का संवैधानिक अस्तित्व, मान्यता व वास्तविकता है और राम राष्ट्रीय संस्कृति और संरचना के आधार स्तम्भ हैं।

उच्च न्यायालय के ये विचार विश्व हिन्दु अधिवक्ता संघ, महर्षि अवधेश बनाम उत्तर प्रदेश के विवाद के संदर्भ में १ जनवरी १९९३ को दिये गये निर्णय में स्पष्ट रूप से लिखे गये हैं।[5] इस निर्णय के विरुद्ध प्रार्थना को उच्चतम न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।

राम के स्वभाव को अपना कैसे बनाया जाए इस पर विचार किया जाना चाहिए। स्वभाव का अर्थ होता है अपना भाव या अस्तित्व। नीलमणि के अनुसार जो किसी बाहरी हेतु (कारण) की अपेक्षा न रखता हो उसको स्वभाव कहा जाता है। इसके निसर्ग और स्वभाव दो भेद हैं। सुदृढ़ अभ्यास से उत्पन्न संस्कार को निसर्ग कहते हैं। जो किसी से उत्पन्न नहीं होता और जो स्वतः सिद्ध है उसको स्वरूप भाव कहते हैं।[6] श्वेताश्वतरोपनिषद् में ‘कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा’ के रूप में जो उल्लेख मिलता है उसमें काल, नियति और यदृच्छा के साथ स्वभाव को लिया गया है। उपनिषद् के ऋषि ने भले ही इसे कालादि के रूप मे ग्रहण किया हो, किन्तु आगे चलकर यदृच्छावाद अलग पनपा और विकसित हुआ। स्वभाववाद के अनुसार वस्तुएँ जैसी हैं अपने स्वभाव के कारण हैं। हम जिस विश्व में रहते हैं वह नियमहीन तो नहीं है लेकिन उस पर शासन करने वाली कोई बाह्य शक्ति नहीं है। विश्व अतन्त्र नहीं अपितु आत्मतन्त्र हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार सब घटनाओं के मूल वस्तु के स्वभाव से जुड़ी एक अनिवार्यता है। दार्शनिक चिन्तन में स्वभाववाद का जो स्वरूप स्थिर हुआ है उसके अनुसार यह प्रकृति के पीछे कोई दिव्य-शक्ति काम कर रही है, इस बात का निषेध करता है।[7] स्वभाव भाविनो भावान् आदि के रूप में महाभारत में इसका अनेक स्थलों पर प्रयोग हुआ किन्तु उससे पूर्व रामायण में स्वभाववाद की चर्चा मिलती है। वाल्मीकि ने कालतत्त्व के सन्दर्भ में स्वभाव को जोड़ा है –

न कालः कालमत्येति न कालः परिहीयते।

स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते॥[8]

अभिप्राय यह है कि काल भी अपनी व्यवस्था का उल्लंघन नहीं कर सकता, यह काल कभी भी क्षीण नहीं होता। स्वभाव को पाकर कोई इसका उल्लंघन नहीं करता। वाल्मीकि का मत है कि न कोई सब काम कर सकता है और न कोई दूसरे को काम में लगा सकता है। सारा जगत् स्वभाव का वशवर्ती है और स्वभाव का आधार काल है।[9]

किसी भी साहित्य का सम्बन्ध लोक से अर्थात् समाज से होता है। राम अथवा कृष्ण को आधार बनाकर जितना भी साहित्य रचा गया है उन सबका सामाजिक दर्शन है लोकहित,लोकोपकार। कर्मशील व्यक्ति समाज को कुछ देता रहे तथा मुक्ति प्राप्ति की उसकी साधना दूसरों के लिए पथ-प्रदर्शक बन सके यह आचरण अपने आप में समस्त मानवता के लिए है। गीता में इसी भाव को व्यक्त किया गया है-

यद्-यदाचरति श्रेष्ठस्तद्तदेवतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरूते लोकस्तदनुवर्तते॥

राम अपने भौतिक सुख के लिए या तो वन जाते ही नहीं या भरत के कहने मात्र से लौट आते किन्तु वे जीवन-मूल्यों के प्रति समर्पित थे। दूसरी ओर रावण विशेष रूप से अपने और सामान्यतया अपनों के लिए दत्तचित्त रहता है। प्रजा के हित को सर्वोपरि मानकर राम सीता का त्याग करने में भी पीछे नहीं हटते।[10] राम का जीवन त्याग वृत्ति का अनुपम उदाहरण है।किसी शाश्वत नैतिक मूल्य की रक्षा के लिए अपने वैयक्तिक सुखों, सांसारिक विषय भोगों, जीवन की उच्च सुविधाओं, ऐश्वर्य, पद और प्राणों का भी बलिदान कर देना त्याग है। यही भारतीय संस्कृति का आदर्श है। जटायु का चरित्र, हनुमान, सीता, भरत, लक्ष्मण आदि के चरित्र इनसे भरे पड़े हैं।  भवभूतिप्रणीत उत्तररामचरित में राम का व्यक्तित्व अपनी विशिष्टता से सभी को प्रेरित करता है। वह राज धर्म को सर्वोपरि मानकर निरन्तर धर्मसम्मत कार्य करते हैं। अपनी व्यथा को सबसे छुपाते हुए राम जब दण्डकारण्य में पहुँचते हैं तो सीता के साथ बिताये हुए समय का स्मरण कर रोने लगते हैं। यह दृष्टान्त प्रदर्शित करता है कि सीता निर्वासन जैसी आज्ञा देने वाला कठोर राम भी पत्थर को भी पिघला देने वाला विलाप करते हैं। हमारे संस्कार किस प्रकार के होने चाहिए ये प्रेरणा हमें राम-कृष्ण सम्बन्धी साहित्य से मिलती है। सीता जिसकी अग्नि-परीक्षा लेने के उपरान्त भी निष्कासित होना पड़ता है वह मूक होकर सब कुछ स्वीकार कर लेती है। राम के प्रति अपने गुस्से को भी मर्यादित भाषा में ही प्रदर्शित करती है। जिसने आजीवन राम को प्रिय,आर्यपुत्र, राघवधुरन्धर, नाथ, प्राण जैसे सम्बोधनों से सम्बोधित किया हो वह आज उसे राजा शब्द से सम्बोधित करती है जो दिखाता कि किसी के प्रति अगर विरोध भी करना है तो मर्यादा में रहकर।[11] भरत का चरित्र अपने आप में एक महाकाव्य की पृष्ठभूमि लिए हुए है। राम को अकारण निष्कासित करने पर भरत अपनी माँ कैकेयी से प्रश्न करते हैं।[12] राज्याधिकार की व्यवस्था के विषय में भी भरत अविचलित रूप से राजधर्म नियमो के प्रति आस्थावान् थे। अनायास ही राज्याधिकार प्राप्त होने पर भी उन्होंने स्वयं को नियमानुसार उसका अधिकारी नहीं माना। राम की अनुपस्थिति में भरत ने पूरे चौदह वर्ष तक नन्दिग्राम में रहकर राज्य का संचालन किया। यह एक विडम्बना ही है कि भरत की चौदह वर्ष की राज्य-व्यवस्था को एकदम उपेक्षित छोड़ दिया गया। उसके सम्बन्ध में कतिपय संकेत ही रामायण एवं अन्य ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं।

ज्वलन्त और समसामयिक प्रश्न यह है कि क्या आज हम अपने मूल्यों अथवा आदर्शों को जीवित रख पाने में समर्थ हैं? रामराज्य तो हर कोई चाहता है पर क्या वास्तव में हम स्वयं के भीतर से इसके लिए तैयार हैं? आज के समय में देश की स्थिति ऐसी है कि स्वयं राम भी अवतरित हो जाए तो वह भी यह सिद्ध करने में असमर्थ होंगे कि उनका जन्म अयोध्या में हुआ था। आज न्यायालय में कतिपय स्वार्थी जनों के कारण राम के अस्तित्व को लेकर ही प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं ऐसी भीषण स्थिति में क्या हम उनके चरित्र को अंगीकार कर पाने में समर्थ हैं। जब प्रश्न अस्मिता पर खड़ा किया जाए जब आधारभूमि को ही खोखला बनाने का दुस्साहस किया जाए तब भला आज का कवि भी मौन कैसे रह सकता है?

हर्षदेव माधव ने इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है। आज राजनीति के दोगलेपन से साधारण जन भी क्षुब्ध है तो भला एक कवि का हृदय कैसे न व्यथित होगा। राजनीति के क्षेत्र में व्यक्ति की धार्मिक आस्थाओं को नीलाम किया जा रहा है। अपने कर्त्तव्यों के लिए जिन पुरुषोत्तम राम ने परिवार एवं राजसुख का परित्याग कर दिया उनकी अयोध्या व्यक्तिगत स्वार्थों की ज्वाला में दग्ध हो रही है। ऐसी घृणित राजनीति से रक्तरञ्जित अयोध्या में यदि राम स्वयं लौट आयें तो घनीभूत शोक से पीड़ित अयोध्या कैसे आश्वस्त कर पायेगी उन्हें क्योंकि-

अधुना

अयोध्यायां मनुष्या न वसन्ति

वसन्त्यत्र विषादखण्डाः

महालयेषु अश्रुदीपाः प्रज्ज्वलन्ति

भित्तिषु व्यथाः श्वसन्ति।[13]

समाज के गिरते मूल्य ही कवि को यह कहने को बाध्य करते हैं कि- लंकायाम् एको विभीषणोऽपि आसीत्। अर्थात् आज के समय से तो रावण राज्य ही अच्छा था जिसमें एकमात्र रावण ही मतिभ्रष्ट था। परन्तु रावण की दुर्नीतियों का प्रबल विरोधी एक विभीषण भी था।

आज के सन्दर्भ में यह कहना गलत न होगा कि राम ने शान्ति की स्थापना कर रामराज्य की स्थापना की थी परन्तु वह शान्ति भी युद्ध के बाद आयी थी वह युद्ध था पाप-पुण्य, सत्य-असत्य के मध्य। यह वह युद्ध है जोइन्द्र ने वृत्र या नमुचि के साथ किया। यह वह संघर्ष है जो शिव और त्रिपुर तथा अन्धक के बीच एवं कुमार और तारक के मध्य हुआ। यही युद्ध राम को रावण के विरुद्ध करना पड़ा। राम और रावण के मध्य प्रकाश तथा अन्धकार का संघर्ष है। राम मर्यादा तथा चारित्र्य के परिपालक मूल्यवादी हैं जबकि रावण ‘स्व’ और ‘स्वकीय’ से परे कुछ भी न देखने वाला भोगवादी है। राम का उद्घोष है-

निर्मर्यादस्तु पुरुषः पापाचारः समन्वितः।

मानं न लभते सत्सु भिन्नचारित्र दर्शनः॥[14]

योगिराज अरविन्द की टिप्पणी इस सन्दर्भ में युक्तिसंगत है कि भारत के सांस्कृतिक मानस को ढालने में वाल्मीकि की कृति ने प्रायः एक अपरिमेय शक्ति से युक्त साधन के रूप में कार्य किया है इसने राम और सीता जैसे या फिर हनुमान, लक्ष्मण और भरत सरीखे पात्रों के रूप में अपने नैतिक आदर्शों की सजीव मानव प्रतिमूर्तियों को उसके सम्मुख चित्रित किया है ताकि वह उनसे प्रेम कर सके और उनका अनुकरण कर सके, राम और सीता को तो इतनी दिव्यता के साथ मूल सत्य की ऐसी अभिव्यक्ति के साथ चित्रित किया गया है कि वे स्थायी भक्ति और पूजा के पात्र बन गए हैं। हमारे राष्ट्रीय चरित्र के सर्वोत्तम और मधुरतम तत्त्वों में से बहुतों का गठन इसी ने किया है और इसी ने उसके अन्दर सूक्ष्मतर और उत्कृष्ट पर सुदृढ़ आत्मिक स्वरों को और उस अधिक सुकुमार मानव प्रकृति को उद्बुद्ध तथा प्रतिष्ठित किया है जो सद्गुण और आचार-व्यवहार के प्रचलित बाह्य अंगों से कहीं अधिक मूल्यवान वस्तुएँ हैं।[15] रामायण का सन्देश है कि राष्ट्रीय चरित्र के सर्वोत्तम और मधुरतम तत्त्वों के गठन करने वाले सूत्रों को सहेजा जाए क्योंकि इनके अभाव में मानवता का अस्तित्व सन्दिग्ध हो जाता है। रामादिवत्प्रवर्तितव्यम्। अयोध्या और लंका दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ हैं। अयोध्या में है देवोपम मानव-संस्कृति और लंका में राक्षस संस्कृति। इन दोनों संस्कृतियों की संघर्ष भूमि का नाम ही रामायण है। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि लंका में भी विभीषण और सुषेण जैसे व्यक्तित्व हैं और अयोध्या में भी मन्थरा और कैकेयी जैसे पात्र विद्यमान हैं। इसलिए मूल्यों और संस्कृतियों के लिए वज्र की रेखाएँ खींचकर भौगोलिक सीमा का निर्धारण नहीं किया जा सकता।

आदर्श राज्य अपने चरित्रवान् तथा मूल्यधर्मी नागरिकों से बनता है। रामायण में अयोध्या एक ऐसा ही राज्य है जिसके निवासी प्रसन्नचित्त, धर्मात्मा, बहुश्रुत अपने धन से ही सन्तुष्ट, निर्लोभी एवं सत्यवादी थे।[16]  उस राज्य में न कोई काम का वशवर्ती था न कृपण ,न क्रूर और न नास्तिक पुरुष तथा मूर्ख वहाँ देखा जा सकता था। समस्त नर-नारी समूह धार्मिक, सुसंयत तथा आचार-विचार से समृद्ध थे और आचरण में ऋषियों की तरह निर्मल अन्तः करण वाले थे।[17] राज्य में वर्णगत खींचतान न थी-

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्या क्षत्रमनुव्रताः।

शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन वर्णानुपचारिणः॥[18]

समुन्नत नगर का आदर्श कोशल है जहाँ के निवासी धन-धान्य से समृद्ध सुखी और आत्मसन्तुष्ट थे।[19] आदिकवि ने एक स्थल पर ऐसे आदर्श चरित्र का अंकन किया है जिसके सामने राज्य-लिप्सा नगण्य है। प्रायः सत्ता के लालच में भाई-भाई को, पुत्र पिता को और आत्मीय दूसरे आत्मीय के साथ अमानवीय व्यवहार कर बैठता है किन्तु रामायण में चाहे सत्ता का प्रसंग हो या सामान्य जीवन का,मनुष्य के आचरण का धरातल ऊँचा ही दृष्टिगोचर होता है।[20]

आज के समय में हमें भी आवश्यकता है कि अपने सिद्धान्तों एवं धर्म के लिए सावधान रहकर विरोधियों से डटकर सामना करने की। यजुर्वेद का कथन है कि मा त्वा परिपन्थिनो विदन्।[21] अर्थात् इस बात के लिए सावधान रहो कि तुम्हारी वास्तविक उन्नति के बाधक शत्रु तुम पर विजय प्राप्त न कर सके। रामायण हमें आन्तरिक और बाहरी शत्रुओं के प्रति सचेत करती है-

कर्मभूमिमिमां प्राप्य कर्त्तव्यं कर्म यच्छुभम्[22]

इस कर्मभूमि को पाकर मानव का कर्त्तव्य हो जाता है कि वह आत्म-कल्याण और लोकोत्कर्ष के जो भी कार्य हों उन्हें निष्पादित करें। आज के भौतिकवादी युग में मानव अपने लक्ष्य से भटक रहा है ऐसे समय में उसे सत्मार्ग दिखाने हेतु रामायण-महाभारत ने प्रायः एक अपरिमेय शक्ति से युक्त साधन के रूप में कार्य किया है। अतः आवश्यक है कि इनमें वर्णित पात्रों के सत्चरित्र से शिक्षा ली जाए। विशेष रूप से राम को केवल एक क्षेत्र विशेष तक सीमित न कर सम्पूर्ण विश्व के दृष्टिकोण से समझा जाए।

 

 

सन्दर्भग्रन्थ सूची

  • आर्ष रामायण में मानव-उत्कर्ष के सिद्धान्त, राजेन्द्र प्रसाद माथुर, क्लासिकल पब्लिशिंग कम्पनी,नई दिल्ली,२०१२
  • उत्तररामचरितम्, भवभूति
  • भारतीय संस्कृति के आधार
  • वाल्मीकि रामायण
  • रघुवंशम्
  • श्रीमद्भगवद्गीता
  • हमारा संविधान

UGC Approved Journals

[1]           गाँधी के उक्त भाषण का आंग्लभाषा में अनुवाद उत्तरप्रदेश राजकीय अभिलेखागार, लखनऊ में संरक्षित है।

[2]           वा० रा० १/१५/१६

[3]           आ०रा०मा०उ०सि०

[4]           १० जनवरी १९९३ के Times of India पत्र में छपी खबर के अनुसार राजस्थान पत्रिका के संवाददाता के.सी. कुलिश

द्वारा यह अभ्यर्थना इस संदेह पर दायर की गयी थी कि केन्द्र सरकार संविधान से सभी चित्रों को हटाने के लिये प्रयत्नशील है।

[5]           प्रयाग उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ६३ पृष्ठोंके निर्णय में संविधान में अंकित राम के चित्र की महत्ता को

स्वीकार किया।

[6]           बहिर्हेत्वनपेक्षी तु स्वभावोऽथ प्रकीर्तितः। निसर्गश्च स्वरूपश्चे त्येषोऽपि भवति द्विधा॥

निसर्गः सुदृढाभ्यासजन्यः संस्कार उच्यते। अजत्यस्तु स्वतः सिद्धः स्वरूपः भाव इष्यते॥

उ. नी.हिन्दू धर्मकोश,पृ० ६९४

[7]           हिरियन्नाः, भारतीय दर्शन की रूपरेखा के आधार पर,पृ० १०४

[8]           रामायण, ४-२५-६

[9]           न कर्ता कश्यचित्कश्चिद् नियोगे नापि नेश्वरः। स्वभावे वर्तते लोकस्तस्य कालः परायणम्॥ रामायण ४.२५.५

[10]         स्नेहं दयां च सौख्यं चयदि वा जानकीमपि

आराधनाय लोकस्य मुञचतो नास्ति मे व्यथा॥ उ.रा.

[11]         (क) अपरिहीनधर्मः स राजा। उ०रा० पृ०३००

(ख) वाच्यस्त्वयामद्वचनाद् स राजा वहनौ विशुद्धामपि यत्समक्षम्। रघुवंश त्रयोदश अंक

[12]         वा.रा.२.७३.१२, २.७४.३

[13]         निष्क्रान्ताः सर्वे, पृ०३

[14]         रामायण.२-१०९-३

[15]         अरविन्द, भारतीय संस्कृति के आधार,पृ० ३००-३०१

[16]         तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः।

नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः। रामायण,१.६-६

[17]         कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित्।

द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान्न न च नास्तिकः॥

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयुताः।

उदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामला॥ रामायण,१-६-८,९

[18]         रामायण,१-६-१९

[19]         कोशलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्।

निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्॥ रामायण, १-५-५

[20]         कथं नु पुत्राः पितरं हन्युः कस्यांचिदापदि।

भ्राता वा भ्रातरं हन्यात् सौमित्रे प्राणमात्मनः॥रामायण. २.९७-१६

[21]         यजुर्वेद ४-३४

[22]         रामायण, २-२०५-२८

Please rate this Research Paper

Leave a Reply