संस्कृत काव्यों में वर्णित वर्षा ऋतु 4.5/5 (2)

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मनीष कुमार

शोधच्छात्र

संस्कृत विभाग,

राँची विश्वविद्यालय,

राँची,

झारखण्ड-834002

संस्कृतकाव्यों में ऋतुओं का वर्णन सर्वदा कवियों का अभीष्ट विषय रहा है। इसका आश्रय लेकर कवियों ने अपनी कृतियों में काव्यतत्त्वों का सम्यक् उन्मीलन किया है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटकों में ऋतुओं का वर्णन अपेक्षित है। आचार्य दण्डीकृत काव्यादर्श में भी महाकाव्यों में ऋतुओं के वर्णन करने की बात कही गई है।[1]  काव्यमीमांसाकार ने ऋतुओं के वर्णन के व्यापक महत्त्व को स्वीकार किया है। उन्होंने अपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ काव्यमीमांसा के अठारहवें अध्याय को ऋतुओं पर ही समर्पित कर दिया। इसके अनुसार दो मासों की ऋतु होती है-द्वौ मासावृतुः। षड् ऋतुओं का परिवर्तन ही सम्वत्सर है-षण्णामृतूनां परिवर्त्तः सम्वत्सरः। इनके अनुसार श्रावण और भाद्रपद की वर्षा ऋतु होती  है, आश्विन और कार्तिक की शरद् ऋतु होती है। मार्गशीर्ष और पौष का हेमन्त होता है, माघ और फाल्गुन का शिशिर होता है, चैत्र और वैशाख का वसन्त होता है तथा ज्येष्ठ और आषाढ की ग्रीष्म ऋतु होती है।

यद्यपि इस अध्याय में सभी ऋतुओं का वर्णन प्राप्त होता है, लेकिन प्रकृत सन्दर्भ में वर्षा ऋतु का वर्णन ही अभिप्रेत है। इस अध्याय में वर्षा ऋतु के सन्दर्भों का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है जिसके बाद काव्यसाहित्य में वर्णित वर्षा ऋतु का विवेचन किया जायेगा।

वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए कहा गया है[2]

प्रावृष्यम्भोभृताम्भोदभरनिर्भरमम्बरम्। कादम्बकुसुमामोदा वायवो वान्ति वरुणाः।। Click To Tweet

अर्थात् वर्षा ऋतु में आकाश जलपूर्ण बादलों से व्यापृत हो जाता है और कदम्ब कुसुमों से सुगन्धित पाश्चात्य वायु बहती है।

गर्भान्बलाकासु निवेशयन्तो वंशाङ्कुरान्स्वैर्निनदैः सृजन्तः। रजोऽम्बुदाः प्रावृषि मुद्रयन्तो यात्रोद्यमं भूमिभृतां हरन्ति।। Click To Tweet

अर्थात् वर्षाकाल में बादल बगुलियों में गर्भ का आधान कराते हुए, अपने गर्जनों से बाँसों में अङ्कुर उत्पन्न करते हुए तथा धूलों को आच्छादित करते हुए अर्थात् कीचड़ उत्पन्न करते हुए राजाओं की विजय यात्रा के उद्यम को दूर करते हैं।

गर्भान्बलाकासु निवेशयन्तो वंशाङ्कुरान्स्वैर्निनदैः सृजन्तः। रजोऽम्बुदाः प्रावृषि मुद्रयन्तो यात्रोद्यमं भूमिभृतां हरन्ति।। Click To Tweet

अर्थात् सल्लकी, साल, शिलीन्ध्र, यूथी को पुष्प प्रदान करने वाला, लाङ्गली को पुष्पित करने वाला तथा तप्त भूमि में जल गिराने से उससे निकली हुई गन्ध से सुगन्धित वर्षा का दिन सुन्दर होता है।

वनानि नीलीदलमेचकानि धाराम्बुधौता गिरयः स्फुरन्ति। पूराम्भसा भिन्नतटास्तटिन्यः सान्द्रेन्द्रगोपानि च शाद्वलानि।। Click To Tweet

अर्थ‌ात् इस वर्षा ऋतु में वन नीलपत्रों से सुशोभित हो गये हैं, वर्षाधार से धुले हुए पर्वत सुन्दर प्रतीत हो रहे हैं, नदियों ने जल भर जाने से तटों को तोड़ डाला है और घासयुक्त स्थल वीरबहूटियों के झुण्ड से युक्त है।

चकोरहर्षी यतिचारचौरो वियोगिनीवीक्षितनाथवर्त्मा। गृहान्प्रति प्रस्थितपान्थसार्थः कालोऽयमाध्मातनभाः।। Click To Tweet

अर्थात् इस वर्षाकाल में चकोर हर्षित हो जाते हैं, यतियों का पर्यटन रुक जाता है, वियोगिनियाँ अपने पति का मार्ग देखने लगती हैं, पथिक अपने-अपने गृहों को चल देते हैं और आकाश बादलों से घिर जाता है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि काव्यशास्त्रियों ने काव्यों में ऋतुवर्णन के महत्त्व को स्वीकार किया। यतः वर्षा ऋतु प्राणीमात्र के लिए प्राणदायी ऋतु है, अतः इस ऋतु पर काव्यशास्त्रियों और कवियों की विशेष दृष्टि रही है। यहाँ पर कतिपय महत्त्वपूर्ण काव्यों में वर्णित वर्षा ऋतु पर प्रकाशन डाला जा रहा है। ये वर्णन हमारी समृद्ध काव्यपरम्परा की ओर तो सङ्केत तो करते ही हैं, प्रकृति के प्रति हमारी सम्वेदनशीलता को भी अभिव्यञ्जित करते हैं। यह वही ऋतु है जिसकी प्रतीक्षा समाज के सभी वर्गों के लोग समानभाव से करते हैं।

वाल्मीकिरामायण में वर्णित वर्षा ऋतु

लक्ष्मण को सम्बोधित करते हुए श्रीरामचन्द्र लक्ष्मण से कहते हैं- सुमित्रानन्दन! अब यह जल की प्राप्ति कराने व‌ाला वर्षाक‌ल आ गया। देखो, पर्वत के समान प्रतीत होने वाले मेघों से आकाशमण्डल आच्छन्न हो गया है-

“अयं स कालः सम्प्राप्तः समयोऽद्य जलागमः। सम्पश्य त्वं नभो मेघैः सम्वृतं गिरिसंनिभैः।।[3] यह आकाशस्वरूपा तरुणी सूर्य की किरणों द्वारा समुद्रों का रस पीकर कार्तिक आदि नौ मासों तक धारण किए हुए गर्भ के रूप में जलरूपी रसायन को जन्म दे रही है-”

“नवमासधृतं गर्भं भास्कराय गभस्तिभिः। पीत्वा रसं समुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम्।।[4] इस समय मेघरूपी सोपानपङ्क्तियों द्वारा आकाश चढ़कर गिरिमल्लिका का और अर्जुनपुष्प की मालाओं से सूर्यदेव को अलङ्कृत करना सरल-सा हो गया है-”

शक्यमम्बरमारुह्य मेघसोपानपङ्क्तिभिः। कुटजार्जुनमालाभिरलङ्कर्तुं दिवाकरः।।[5]

सन्ध्याकाल की लाली प्रकट होने से बीच में लाल तथा किनारे के भागों में श्वेत एवं स्निग्ध प्रतीत होनेवाले मेघखण्डों से आच्छादित हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता है, म‌ानो उसने अपने घाव में रक्तरञ्जित सफेद कपड़ों की पट्टी बाँध रखी हो।–

सन्ध्यारागोत्थितैस्ताम्रैरन्तेष्वपि च पाण्डुभिः। स्निग्धैरभ्रपटच्छेदैर्बद्धव्रणमिवाम्बरम्।।[6]

मन्द-मन्द हवा निःश्वास-सी प्रतीत होती है, सन्ध्याकाल की लाली लाल चन्दन बनक‌र ललाट आदि अङ्गों को अनुरञ्जित कर रही है तथा मेघरूपी कपोल कुछ-कुछ पाण्डुवर्ण प्रतीत होता है। इस तरह यह आकाश क‌ामातुर पुरुष के समान जान पड़ता है-

मन्दमारुतिनिःश्वासं सन्ध्याचन्दनरञ्जितम्। आपाण्डुजलदं भाति कामातुरमिवाम्बरम्।।[7]

जो ग्रीष्म ऋतु में घाम से तप गई थी, वह पृथिवी वर्षाकाल में नूतन जल से भींगकर शोकसन्तप्त सीता की भाँति वाष्प विमोचन कर रही है-

एषा घर्मपरिक्लिष्टा नवव‌ारिपरिप्लुता। सीतेव शोकसन्तप्ता मही वाष्पं विमुञ्चति।।[8]

मेघ के उदर से निकली, कर्पूर के दल के समान ठण्डी तथा केवड़े की सुगन्ध से भरी हुई इस बरसाती वायु को मानो अञ्जलियों में भरकर पीया जा रहा है-

मेघोदरविनिर्मुक्ताः कर्पूरदलशीतलाः। शक्यमञ्जलिभिः पातुं वाताः केतकगन्धिनः।।[9]

यह पर्वत, जिस पर अर्जुन के वृक्ष खिले हुए हैं तथा जो केवड़ों से सुवासित हो रहा है, शान्त हुए शत्रुवाले सुग्रीव की भाँति जल की धाराओं से अभिषिक्त हो रहा है-

”एष Click To Tweet मेघरूपी काले मृगचर्म तथा वर्षा की धारारूप यज्ञोपवीत धारण किए वायु से पूरित गुफा (या हृदय) वाले ये पर्वत ब्रह्मचारियों की भाँति मानो वेदाध्ययन आरम्भ कर रहे हैं-” username=”Aryainfotech1″]

मेघकृष्णाजनिधरा धारायज्ञोपवीतिनः। मारुतापूरितगुहाः प्राधीता इव पर्वताः।।[11]

ये बिजलियाँ सोने के बने हुए कोड़ों के सम‌ान जान पड़ती हैं। इनकी मार खाकर मानो व्यथित हुआ आकाश अपने भीतर व्यक्त हुई मेघों की गम्भीर गर्जना के रूप में आर्तनाद-सा कर रहा है-

कशाभिरिव हैमीभिर्विद्युद्भिरभिताडितम्। अन्तःस्तनितनिर्घोषं सवेदनमिवाम्बरम्।।[12]

नील मेघ का आश्रय लेकर प्रकाशित होती हुई यह विद्युत् मुझे रावण के अङ्क में छटपटाती हुई तपस्विनी सीता के समान प्रतीत होती है-

नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे। स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी।।[13]

बादलों का लेप लग जाने से जिनमें ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा अदृश्य हो गए हैं, अतएव जो नष्ट-सी हो गई हैं-जिनमें पूर्व, पश्चिम आदि भेदों  का विवेक लुप्त-सा हो गया है, वे दिशाएं, उन कामियों को, जिन्हें प्रेयसी का संयोगसुख सुलभ है, हितकर प्रतीत होती हैं-

इमास्ता मन्मथवतां हिताः प्रतिहता दिशः। अनुलिप्ता इव घनैर्नष्टग्रहनिशाकराः।।[14]

सुमित्रानन्दन! देखो, इस पर्वत के शिखरों पर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं? कहीं तो पहली बार वर्षा होने पर भूमि से निकले हुए भाप से ये व्याप्त हो रहे हैं और कहीं वर्षा के आगमन से अत्यन्त उत्सुक दिखायी देते हैं। मैं तो प्रिया-विरह के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं-

क्वचिद् वाष्पाभिसंरुहद्ध‌ान् वर्षागमसमुत्सुकान्। कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु।

मम शोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान् स्थितान्।।[15]

धरती की धूलि शान्त हो गई। अब वायु में शीतलता आ गयी। गर्मी के दोषों का प्रसार बन्द हो गया। भूपालों की युद्धयात्रा रुक गई और परदेशी मनुष्य अपने-अपने देश को लौट रहे हैं-

रजः प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायुर्निदाघदोषप्रसराः प्रशान्ताः। स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां प्रवासिनो यान्ति नराः स्वदेशान्।।[16]

मानसरोवर में निवास के लोभी हंस वहाँ के लिए प्रस्थित हो गए। इस समय चकवे अपनी प्रियाओं से मिल रहे हैं। निरन्तर होनेव‌ाली वर्षा के जल से मार्ग टूट-फूट गए हैं, इसलिए उनपर रथ आदि नहीं चल रहे हैं-

सम्प्रस्थिता मानसवासलुब्धाः प्रियान्विताः सम्प्रति चक्रवाकाः। अभीक्ष्णवर्षोदकविक्षतेषु यानानि मार्गेषु न सम्पतन्ति।।[17]

आकाश में सब ओर बादल छिटके हुए हैं। कहीं तो उन बादलों से ढक जाने के कारण आकाश दिखाई नहीं देता है और कहीं उनके फट जाने पर वह स्पष्ट दिखाई देने लगता है। ठीक इसी तरह जैसे जिसकी तरङ्गमालाएं शान्त हो गई हों, उस महासागररूप कहीं तो पर्वतमालाओं से छिप ज‌ाने के कारण नहीं दिखाई देता है और कहीं पर्वतों का आवरण न होने से दिख‌ाई देता है-

क्वचित् प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति। क्वचित्क्वचित् पर्वतसंनिरुद्धं रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य।।[18]

इस समय पहाड़ी नदियाँ वर्षा के नूतन जल को बड़े वेग से बहा रही हैं। वह जल सर्ज और कदम्ब के फूलों से मिश्रित है, पर्वत के गेरु आदि धातुओं से लाल रंग का हो गया है तथा मयूरों की केकाध्वनि उस जल के कलकलनाद का अनुसरण कर रही है-

व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पैर्नवं जलं पर्वतधातुताम्रम्। मयूरकेकाभिरनुप्रयातं शैलापगाः शीघ्रतरं वहन्ति।।[19]

काले-काले भौरों के समान प्रतीत होने वाले जामुन के सरस फल आजकल लोग जी भरकर खाते हैं और हवा के वेग से हिले हुए आम के पके हुए बहुरंगी फल पृथिवी पर गिरते रहते हैं-

रसानुकूलं षट्पदसंनिकाशं प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम्। अनेकवर्णं पवनावधूतं भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्वम्।।[20]

जैसे युद्धस्थल में खड़े हुए मतवाले गजराज उच्चस्वर से चिग्घाड़ते हैं, उसी प्रकार गिरिराज के शिखरों की सी आकृति वाले मेघ जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं। चमकती हुई बिजलियाँ इन मेघरूपी गजराजों पर पताकाओं के समान फहरा रही हैं और बगुलों की पङ्क्तियाँ मा‌ला के समान शोभा देती हैं-

विद्युत्पताकाः सबलाकमालाः शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशाः। गर्जन्ति मेघाः समुदीर्णनादा मत्ता गजेन्द्रा इव संयुगस्थाः।।[21]

देखो, अपराह्णकाल में इन वनों की शोभा अधिक बढ़ जाती है। वर्षा के जल से इनमें हरी-हरी घासें बढ़ गइ हैं। झुण्ड के झुण्ड मोरों ने अपना नृत्योत्सव आरम्भ कर दिया है और मेघों ने इनमें निरन्तर जल बरस‌या है-

वर्षोदकाप्यायितशाद्वलानि प्रवृत्तनृत्तोत्सवबर्हिणानि। वनानि निर्वृष्टबलाहकानि पश्यापराह्णेष्वधिकं विभान्ति।।[22]

बक-पङ्क्तियों से सुशोभित ये जलधर मेघ जल का अधिक भार ढोते है और गर्जते हुए बड़े-बड़े पर्वतशिखरों पर मानो विश्राम ले-लेकर आगे बढ़ते हैं-

समुद्वहन्तः सलिलातिभारं बलाकिनो वारिधरा नदन्तः। महत्सु शृङ्गेषु महीधराणां विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति।।[23]

गर्भधारण करने के लिए मेघों की का‌मना रखकर आकाश में उड़ती हुई आनन्दमग्न बलाकाओं की पङ्क्ति ऐसी जान पड़ती है, म‌ानो आकाश के गले में हवा से हिलती हुई श्वेत कमलों की सुन्दर माला लटक रही हो-

मेघाभिकामा परिसम्पतन्ती सम्मोदिता भाति बलाकपङ्क्तिः। वातावधूता वरपौण्डरीकी लम्बेव माला रुचिराम्बराय।।[24]

छोटे-छोटे इन्द्रगोप नामक कीड़ों से बीच-बीच में चित्रित हुई नूतन घास से आच्छादित भूमि उस नारी के समान शोभा पाती है, जिसने अपने अङ्गों पर तोते के सम‌ान रंग वाला ऐसा कम्बल ओढ रखा हो, जिसको बीच-बीच में महावर के रंग से रँगकर विचित्र शोभा से सम्पन्न कर दिया गया हो-

बालेन्द्रगोपान्तरचित्रितेन विभाति भूमिर्वशाद्वलेन। गात्रानुपृक्तेन शुकप्रभेण नारीव लाक्षोक्षितकम्बलेन।।[25]

चौमासे के इस आरम्भक‌ाल में निद्रा धीरे-धीरे भगवान् केशव के समीप जा‌ रही है। नदी तीव्र वेग से समुद्र के निकट पहुँच रही है। हर्षभरी बलाका उड़कर मेघ की ओर जा रही है और प्रियतमा सकामभाव से अपने प्रियतम की सेवा में उपस्थित हो रही है-

निद्रा शनैः केशवमभ्युपैति द्रुतं नदी सागरमभ्युपैति। हृष्टा बलाका घनमभ्युपैति कान्ता सकामा प्रियमभ्युपैति।।[26]

वनप्रान्त मोरों के सुन्दर नृत्य से सुशोभित हो गए हैं। कदम्बवृक्ष फूलों और शाखाओं से सम्पन्न हो गए हैं। साँड गौवों के प्रति उन्हीं के समान कामभाव से आसक्त हैं और पृथिवी हरी-हरी खेती तथा हरे-भरे वनों से अत्यन्त रमणीय प्रतीत होने लगी है-

जाता वनान्ताः शिखिसुप्रनृता जाताः कदम्बाः सकदम्बश‌ाखाः। जाता वृषा गोषु समानकामा जाता मही सस्यवनाभिरामा।।[27]

नदियाँ बह रही हैं, बादल पानी बरसा रहे हैं, मतवाले हाथी चिग्घाड़ रहे हैं, वनप्रान्त शोभा पा रहे हैं, प्रियतमा के संयोग से वञ्चित हुए वियोगी प्राणी चिन्तामग्न हो रहे हैं, मोर नाच रहे हैं और वानर निश्चिन्त एवं सुखी हो रहे हैं-

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति।

नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवङ्गमाः।।[28]

वन के झरनों के समीप क्रीडा से उल्लसित हुए मदवर्षी गजराज केवड़े के फूल की सुगन्ध को सूँघकर मतवाले हो उठे हैं और झरने के जल के गिरने से जो शब्द होता है, उससे आकुल हो ये मोरों के बोलने के साथ-साथ स्वयं भी गर्जना  करते हैं-

प्रहर्षिताः केतकिपुष्पगन्धमाघ्राय मत्ता वननिर्झरेषु। प्रपातशब्दाकुलिता गजेन्द्राः सार्धं मयूरैः समदा नदन्ति।।[29]

जल की धारा गिरने से आहत होते और कदम्ब की डालियों पर लटकते हुए भ्रमर तत्क‌ाल ग्रहण किए पुष्परस से उत्पन्न गाढ़े मद को धीरे-धीरे त्याग रहे हैं-

धारानिपातैरभिहन्यमानाः कदम्बश‌ाखासु विलम्बमानाः। क्षणार्जितं पुष्परसावगाढं शनैर्मदं षट्चरणास्त्यजन्ति।।[30]

कोयलों की चूर्णराशि के सम‌ान काले और प्रचुर रस से भरे हुए बड़े-बड़े फलों से लदी हुई जामुन-वृक्ष की शाखाएं ऐसी ज‌न पड़ती हैं, मा‌नो भ्रमरों के समुदाय उनमें सटकर उनके रस पी रहे हैं-

अङ्गारचूर्णोत्करसंनिकाशैः फलैः सुपर्याप्तरसैः समृद्धैः। जम्बूद्रुमाणां प्रविभान्ति शाखा निपीयम‌ाना इव षट्पदौघैः।।[31]

विद्युत् रूपी पताक‌ओं से अलङ्कृत एवं जोर-जोर से गम्भीर गर्जना करने वाले इन बादलों के रूप युद्ध के लिए उत्सुक हुए गजराजों के समान प्रतीत होते हैं-

तडित्पताकाभिरलङ्कृतानामुदीर्णगम्भीरमहारवाणाम्। विभान्ति रूपाणि बलाहकानां रणोत्सुकानामिव वारणान‌म्।।[32]

पर्वतीय वनों में विचरण करनेवाला तथा अपने प्रतिद्वन्द्वी के साथ युद्ध की इच्छा रखनेवाला मदमत्त गजराज, जो अपने मार्ग का अनुसरण करके आगे बढ़ा जा रहा था, पीछे से मेघ की गर्जना सुनकर प्रतिपक्षी हाथी के गर्जना की आशङ्का करके सहसा पीछे को लौट पड़ा-

मार्गानुगः शैलवनानुसारी सम्प्रस्थितो मेघरवं निशम्य। युद्धाभिकामः प्रतिनादशङ्की मत्तो गजेन्द्रः प्रतिसंनिवृत्तः।।[33]

कहीं भ्रमरों के समूह गीत गा रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं और कहीं गजराज मदमत्त होकर विचर रहे हैं। इस प्रकार ये वनप्रान्त अनेक भावों के आश्रय बनकर शोभा पा रहे हैं-

क्वचित् प्रगीता इव षट्पदौघैः क्वचित् प्रनृत्ता इव नीलकण्ठैः। क्वचित् प्रमत्ता इव वारणेन्द्रैर्विभान्त्यनेकाश्रयिणो वनान्ताः।।[34]

कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और स्थल कमल से सम्पन्न वन के भीतर की भूमि मधुजल से परिपूर्ण हो मोरों के मदयुक्त कलरवों और नृत्यों से उपलक्षित होकर आपानभूमि के समान प्रतीत होती है-

कदम्बसर्जार्जुनकन्दलाढ्या वनान्तभूमिर्मधुवारिपूर्णा। मयूरमत्ताभिरुतप्रनृत्तैरापानभूमिप्रतिमा विभाति।।[35]

आकाश से गिरता हुआ मोती के समा‌न स्वच्छ एवं निर्मल जल के पत्तों के दोनों में संचित हुआ देख प्यासे पक्षी पपीहे हर्ष से भरकर देवराज इन्द्र के दिए हुए उस जल को पीते हैं। वर्षा से भींग ज‌ाने के क‌ारण उनकी पाँखें विविध रंग की दिखाई देती है-

मुक्तासमाभं सलिलं पतद् वै सुनिर्मलं पत्रपुटषु लग्नम्। हृष्टा विवर्णच्छदना विहंगाः सुरेन्द्रदत्तं तृषिताः पिबन्ति।।[36]

भ्रमररूप वीणा की मधुर झंकार हो रही है। मेढकों की आवाज कण्ठताल सी जान पड़ती है। मेघों की गर्जना के रूप में मृदङ्ग बज रहे हैं। इस प्रकार वनों में संगीतोत्सव का आरम्भ सा हो रहा है-

षट्पादतन्त्रीमधुराभिधानं प्लवंगमोदीरितकण्ठतालम्। आविष्कृतं मेघमृदङ्गनादैर्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम्।।[37]

विशाल पंखरूपी आभूषणों से विभूषित मोर वनों में कहीं नाँच रहे हैं, कहीं जोर-जोर से मीठी बोली बोल रहे हैं ओर कहीं वृक्षों की श‌ाखाओं पर अपने सारे शरीर का बोझ डालकर बैठे हुए हैं। इस प्रक‌ार उन्होंने संगीत का आयोजन कर रखा है-

क्वचित् प्रनृत्तैः क्वचिदुन्नदद्भिः क्वचिच्च वृक्षाग्रनिषण्णकायैः। व्यालम्बबर्हाभरणैर्मयूरैर्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम्।।[38]

मेघों की गर्जना सुनकर चिरका‌ल से रोकी हुई निद्रा को त्यागकर जागे हुए अनेक प्रकार के रूप, आकार, वर्ण और बोली वाले मेढक नूतन जल की धारा से अभिहत होकर जोर-जोर से बोल रहे हैं-

स्वनैर्घनानां प्लवगाः प्रबुद्धा विहाय निद्रां चिरसंनिरद्धाम्। अनेकरूपाकृतिवर्णनादा नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति।।[39]

कामातुर युवतियों की भाँति दर्पभरी नदियाँ अपने वक्षपर चक्रवाकों को वहन करती हैं ओर मर्यादा में रखनेवाले जीर्ण-शीर्ण कुलकगारों को तोड़-फोड़ एवं दूर बहाकर नूतन पुष्प आदि के उपहार से पूर्ण भोग के लिए सादर स्वीकृत अपने स्वामी समुद्र के समीप वेगपूर्वक चली जा रही हैं-

नद्यः समुद्वाहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा। दृप्ता नवप्रावृतपूर्णभोगादृतं स्वभर्तारमुपोपयान्ति।।[40]

नीले मेघों में सटे हुए नूतन जल से परिपूर्ण नील मेघ ऐसे प्रतीत होते हैं, मा‌नो दावानल से जले हुए पर्वतों में दावानल से दग्ध हुए दूसरे पर्वत बद्धमूल होकर सट गए हों-

नीलेषु नीला नववारिपूर्णा मेघेषु मेघाः प्रतिभान्त सक्ताः। दव‌ाग्निदग्धेषु दवाग्निदग्धाः शैलेषु शैला इव बद्धमूलाः।।[41]

जहाँ मतवाले मोर कलनाद कर रहे हैं, जहाँ की हरी-हरी घासें वीरबहूटियों के समुदाय से व्याप्त हो रही हैं तथा जो नीप और अर्जुन वृक्षों के फूलों की सुगन्ध से सुवासित हैं, उन परमरमणीय वनप्रान्तों में बहुत से हाथी विचरा करते हैं-

प्रमत्तसंनादितबर्हिणानि सशक्रगोपाकुलशाद्वलानि। चरन्ति नीपार्जुनवासितानि गजाः सुरम्याणि वनान्तराणि।।[42]

भ्रमरों के समुदाय नूतन जल की धारा से नष्ट हुए केसर वाले कमल-पुष्पों को तुरन्त त्यागकर केसरशोभित नवीन कदम्बपुष्पों का रस बड़े हर्ष के साथ पी रहे हैं-

नवाम्बुधाराहतकेसराणि द्रुतं परित्यज्य सरोरुहाणि। कदम्बपुष्पाणि सकेसराणि नवानि हृष्टा भ्रमराः पिबन्ति।।[43]

गजेन्द्र (हाथी) मतवाले हो रहे हैं। गवेन्द्र (वृषभ) आनन्द में मग्न हैं, मृगेन्द्र (सिंह) वनों में अत्यन्त रमणीय दिखाई देते हैं, नरेन्द्र (राजालोग) मौन हैं-युद्धविषयक उत्साह छोड़ बैठे हैं और सुरेन्द्र (इन्द्रदेव) जलधरों के साथ क्रीडा कर रहे हैं-

मत्ता गजेन्द्राः मुदिता गवेन्द्रा वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः। रम्या नगेन्द्राः निभृता नरेन्द्राः प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रह।।[44]

आकाश में लटके हुए ये मेघ अपनी गर्जना से समुद्र के कोल‌हल को तिरस्कृत करके अपने जल के महान् प्रवाह से नदी, तालाब, सरोवर, बावली तथा समूची पृथिवी को आप्लावित कर रहे हैं-

मेघाः समुद्भूतसमुद्रनादा महाजलौघैर्गगनावलम्बाः। नदीस्तटाकानि सरांसि वापीर्महीं च कृत्स्नामपवाहयन्ति।।[45]

बड़े वेग से वर्षा हो रही है, जोरों की हवा चल रही है ओर नदियाँ अपने कगारों को काटकर अत्यन्त तीव्र गति से जल बहा रही हैं। उन्होंने मार्ग रोक दिए हैं-

वर्षप्रवेगा विपुलाः पतन्ति प्रवान्ति वाताः समुदीर्णवेगाः। प्रणष्टकूलाः प्रवहन्ति शीघ्रं नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गाः।।[46]

जैसे मनुष्य जल के कलशों से नरेशों का अभिषेक करते हैं, उसी प्रक‌ार इन्द्र के दिए और वायुदेव के द्वारा लाए गए मेघरूपी जल-कलशों से जिनका अभिषेक हो रहा है, वे पर्वतराज अपने निर्मल रूप तथा शोभा सम्पत्ति का दर्शन-सा करा रहे हैं-

नरैर्नरेन्द्राः इव पर्वतेन्द्राः सुरेन्द्रदत्तैः पवनोपनीतैः। घनाम्बुकुम्भैरभिषिच्यमाना रूपं श्रियं स्वामिव दर्शयन्ति।।[47]

मेघों की घटा से समस्त आकाश आच्छादित हो गया है। न रात में तारे दिखाई देते हैं न दिन में सूर्य। नूतन जलराशि पाकर पृथिवी पूर्ण तृप्त हो गई है। दिशाएँ अन्धकार से आच्छन्न हो रही हैं, अतएव प्रकाशित नहीं होती हैं-

घनोपगूढं गगनं न तारा न भास्करो दर्शनमभ्युपैति। नवैर्जलौघैर्धरणी वितृप्ता तमोविलिप्ता न दिशः प्र‌काशाः।।[48]

जल की धाराओं से घुले हुए पर्वतों के विशाल शिखर मोतियों के लटकते हुए हारों की भाँति एवं बहुसंख्यक झरनों के कारण अधिक शोभा पाते हैं-

महान्ति कूटानि महीधराणां धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति। महाप्रमाणैर्विपुलैः प्रप‌ातैर्मुक्ताकलापैरिव लम्बमानैः।।[49]

पर्वतीय प्रस्तरखण्डों पर गिरने से जिनका वेग टूट गया है, वे श्रेष्ठ पर्वतों के बहुतेरे झरने मयूरों की बोली से गूँजती हुई गुफाओं में टूटकर बिखरते हुए मोतियों के हारों के समान प्रतीत होते हैं-

शैलोपलप्रस्खलमानवेगाः शैलोत्तमानां विपुलाः प्रपाताः। गुहासु संनादितबर्हिणासु हारा विकीर्यन्त इवावभान्ति।।[50]

जिनके वेग शीघ्रगामी हैं, जिनकी संख्या अधिक है, जिन्होंने पर्वतीय शिखरों के निम्न प्रदेशों को धोकर स्वच्छ बना दिया है तथा जो देखने में मुक्तामालाओं के समान प्रतीत होते हैं, पर्वतों के उन झरते हुए झरनों को बड़ी-बड़ी गुफाएँ अपनी गोद में धारण कर लेती है-

शीघ्रप्रवेगा विपुलाः प्रपाता निर्धौतशृङ्गोपतला गिरीणाम्। मुक्ताकलापप्रतिमाः पतन्तो महागुहोत्सङ्गतलैर्ध्रयन्ते।।[51]

सुरतक्रीडा के समय होने वाले अङ्गों के आमर्दन से टूटे हुए देवाङ्गनाओं के मौक्तिक हारों के समान प्रतीत होनेवाली जल की अनुपम धाराएं सम्पूर्ण दिशाओं में सब ओर गिर रही हैं-

सुरतामर्दविच्छिन्नाः स्वर्गस्त्रीहारमौक्तिकाः। पतन्ति चातुला दिक्षु तोयधाराः समन्ततः।।[52]

राजाओं की युद्धयात्रा रुक गई। प्रस्थित हुई सेना भी रास्ते में ही पड़ाव डाले पड़ी है। वर्षा के जल ने राजाओं के वैर शान्त कर दिए हैं और मार्ग भी रोक दिए हैं। इस प्रकार वैर और मार्ग दोनों की एक-सी अवस्था कर दी है-

वृत्ता यात्रा नरेन्द्राणां सेना पथ्येव वर्तते। वैराणि चैव मार्गाश्च सलिलेन समीकृताः।।[53]

मुझे वन की ओर आते देख जिस प्रकार अयोध्यापुरी के लोगों का आर्तनाद बढ़ गया था, उसी प्रकार इस समय वर्षा के जल से परिपूर्ण होती हुई सरयू नदी का वेग अवश्य बढ रहा होगा-

नूनमापूर्यमाणायाः सरय्वा वर्धते रयः। मां समीक्ष्य समायान्तमयोध्याया इव स्वनः।।[54]

कालिदास की कृतियों में वर्षा ऋतु

ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु आते ही सारा वातावरण बदल जाता है। प्रत्येक ऋतु का परिवेशन भिन्न होता है। तापम‌ान के अलावा हर ऋतु के पत्र, पुष्प और फल यहाँ तक कि पक्षी, कीट-पतंग, भी भिन्न होते हैं। ऋतु के परिवर्तन के साथ ही मानव की अनुभूति में भी अन्तर आता है। इस सबको परखने के लिए सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता होती है। कालिदास की दृष्टि इस अर्थ में अत्यन्त व्यापक है और उनके सामर्थ्य की जितनी प्रसंशा की जाए कम है।ऋतुसंहार के द्वितीय सर्ग में वर्षा के सुन्दर बिम्ब मिलते हैं। प्रथम श्लोक ही वर्षा ऋतु का राजा से रूपक बाँधते हुए कवि ने उसके आगमन की सूचना इस प्रकार दी है-

ससीकराम्भोधरमत्तकुञ्जरस्तडित्पताकोऽशनिशब्दमर्दलः। समागतो राजवदुद्धतद्युतिर्घनागमः कामिजनप्रियः।।[55]

यहाँ दोहरा चित्राङ्कन है घनागम व नृपागम। हाथियों जैसे जलधारा छोड़ते बादल, ध्वजा की भाँति चमकती बिजली, नगाड़ों जैसी गर्जना-यह वर्षा ऋतु का परिवेश है। मेघों की भाँति मदजल गिराते हाथी, बिजली जैसी चमकती झंडियाँ, मेघगर्जन की भाँति बजते नगाड़े, ये राजा के उपचार हैं। वर्षाकाल क‌ामिजनों को प्रिय है, राजा अपने प्रियजनों को। यहाँ पदश्लेष के आधार पर जो सांगरूपक खड़ा किया गया है, वह एक संश्लिष्ट बिम्ब का आनन्द प्रदान करता है।यहाँ दृश्य और ध्वनि दोनों प्रकार के बिम्ब हैं। ‘ससीकरा.’ आदि विशेषण बड़े सार्थक व सचित्र हैं जो प्रस्तुत घनागम को राजा के जुलूस के समान भव्यता  प्रदान करते हैं।

आगे वैदर्भी रीति का आश्रय लेकर कवि वर्षा का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करते हैं-

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति व्यायन्ति नृत्यन्ति सम‌ाश्रयन्ति।नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीना शिखिनः प्लवङ्गाः।।[56]

अर्थात् बरसात में नदियाँ बह रही हैं, बादल बरस रहे हैं, मस्त हाथी चिग्घाड़ रहे हैं, जंगल हरे-भरे हुए जा रहे हैं, अपने प्यारों से बिछुड़ी हुई स्त्रियाँ रो-कलप रही हैं, मोर नाच रहे हैं और बन्दर चुप मारकर गुफाओं में जा छुपे हैं।

वर्षा ऋतु की धरती कवि को एक वराङ्गना प्रतीत होती है, जो नए-नए घास के अंकुर,केले के हरे-हरे पत्ते व लाल वीर-बहुटियों से सजी हुई हैं-

प्रभिन्नवैदूर्यनिभैस्तृणाङ्कुरैः समाचिता प्रोत्थितकन्दलीदलैः। विभाति शुक्लेतररत्नभूषिता वराङ्गनेव क्षितिरिन्द्रगोपकैः।।[57]

यहाँ घास के अङ्कुरों को वैदूर्यमणि व वीरवधूटियों को शुक्लेतर रंग के रत्नों से गोचर कराया गया है।

वर्षा ऋतु में पशु-पक्षियों के आनन्द व विरहिणी स्त्रियों  के अवसाद के चित्र भी कवि ने दिए हैं। शृङ्गार के उद्दीपन रूप में भी वर्षा ऋतु के मानव सापेक्ष बिम्ब ऋतुसंहार में पर्याप्त हैं। कतिपय का उल्लेख किया जा रहा है।

नए-नए बादलों के गरजने से जब बनैले हाथी मस्त हो जाते हैं और उनके माथे से बहते हुए मद पर भौंरे आ लिपटते हैं तब उन हाथियों के माथे स्वच्छ नीले कमल से दिखाई देने लगते हैं-

वनद्विपानां नववारिदस्वनैर्मदान्वितानां ध्वनतां मुहुर्मुहुः। कपोलदेशा विमलोत्पलप्रभाः सभृङ्गयूथैर्मदवारिभिश्चिताः।।[58]

धौले कमल के सम‌ान उजले बादल जिन पहाड़ी चट्टानों को चूमते चल रहे हैं और जिनपर मोर नाच रहे हैं उन चट्टानों पर से बहनेवाले सैकड़ों झरनों को देखकर प्रेमियों के मन में हलचल मच जाती है-

सितोत्पलाभाम्बुदचुम्बितोपलाः समाचिताः प्रस्रवणैः समन्ततः।

प्रवृत्तनृत्यैः शिखिभिः समाकुलाः समुत्सुकत्वं जनयन्ति भूधराः।।[59]

कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और केतकी से भरे हुए जंगल को कँपाता हुआ, उन वृक्षों  के फूलों की सुगन्ध में बसा हुआ और चन्द्रमा की किरणों तथा बादलों से ठण्डा होकर बहने वाली वायु किसे मस्त नहीं कर देती-

कदम्बसर्जार्जुनकेतकीवनं विकम्पयँस्तत्कुसुमाधिवासितः। ससीकराम्भोधरसङ्गशीतलः समीरणः कं न करोति सोत्सुकम्।।[60]

वर्षा के आगमन पर नीले कमल की पंखुड़ी-जैसे नीले, कहीं गर्भिणी के स्तनों के समान पीले और कहीं घुटे हुए आँजन की पिंडी के सम‌ान काले-काले बादल आकाश में इधर-उधर आ छाए हैं-

नितान्तनीलोत्पलप्रमदास्तनप्रभैः क्वचित्प्रभिन्नाञ्जनराशिसंनिभैः।

क्वचित्सगर्भप्रमदास्तनप्रभैः समाचितं व्योम घनैः समन्ततः।।[61]

जिन बादलों से पपीहे पिउ-पिउ करके पानी माँग रहे हैं ऐसे, प‌ानी के भार से नीचे झुके हुए, धुआँधार पानी बरसाने वाले और कानों को भली लगनेवाली गड़गड़ाट करते हुए, बादल धीरे-धीरे घिरे चले जा रहे हैं-

तृषाकुलैश्चातकपक्षिणां कुलैः प्रयाचितास्तोयभरावलम्बिनः। प्रयान्ति मन्दं बहुधारवर्षिणो बलाहक‌ाः श्रोत्रमनोहरस्वनाः।।[62]

मृदङ्ग के समान गड़गड़ाते हुए और बिजली की डोरीवाला इन्द्रधनुष चढ़ाए हुए ये बादल अपनी तीखी धारों के पैने बाण बरसा-बरसाकर परदेश में पहुँचे हुए लोगों का मन कसमसाए डाल रहे हैं।[63] सदा मीठी बोली वाले, गरजते हुए बादलों की शोभा पर रीझकर मगन हो उठनेवाले और अपने पंख खोलकर फैलाने से सुहावने लगनेव‌ाले ये मोरों के झुंड के झुंड, झटपट अपनी प्यारी मोरनियों को गले लगाते और चूमते हुए आज नाच उठे हैं-

सदा मनोज्ञं स्वनदुत्सवोत्सुकं विकीर्णविस्तीर्णकलापिशोभितम्। ससंभ्रमालिङ्गनचुम्बनाकुलं प्रवृत्तनृत्यं कुलमद्य बर्हिणाम्।।[64]

छोटे-छोटे कीड़ों, धूल और घास को बहाता हुआ जो मटमैला बरस‌ाती प‌ानी, साँप के सम‌ान टेढ़ा-मेढ़ा घूमता हुआ, ढ़ाल से बहा आ रहा है, उसे देखकर और उसे साँप समझकर मेढक डरे जा रहे हैं-

विपाण्डुरं कीटरजस्तृणान्वितं भुजङ्गवद्वक्रगतिप्रसर्पितम्। ससाध्वसैर्भेककुलैर्निरीक्षितं प्र‌याति निम्नाभिमुखं नवोदकम्।।[65]

इन्द्रधनुष और बिजली से सजी तथा पानी के भार से झुकी हुई क‌ाली-काली घटाएं और करधनी तथा रत्न-जड़े कुण्डलों से सजी हुई स्त्रियाँ, दोनों ही परदेश में बैठे हुए लोगों का मन एक साथ हर ले जा रही है-

तडिल्लताशक्रधनुर्विभूषिताः पयोधरास्तोयभरावलम्बिनः। स्त्रियश्च काञ्चीमणिकुण्डलोज्ज्वला हरन्ति चेतो युगपत्प्रवासिनाम्।।[66]

इन दिनों नई केसर, केतकी और कदम्ब के नये फूलों की म‌ालाएं गूँथकर स्त्रियाँ अपने जूड़ों में बाँधकर ले जा रही हैं और ककुभ के फूलों के मनचाहे ढंग से बनाए हुए कर्णफूल अपने कानों  में पहन रही हैं-

मालाः कदम्बनवकेसरकेतकीभिरायोजिताः शिरसि बिभ्रति योषितोऽद्य।

कर्णान्तरेषु ककुभद्रुममञ्जरीभिरिच्छायानुकूलरचितानवतंसकाँश्च।।[67]

वर्षा के नए जल की फुहारों से ठंडा बना हुआ पवन, फूलों के बोझ से झुके हुए पेड़ों को नचा डाल रहा है, केतकी के फूलों का पराग लेकर चारों ओर मनभावनी सुगन्ध फैला रहा है और परदेश गए हुए प्रेमियों के मन चुराए ले जा रहा है-

नवजलकणसङ्गाच्छीततामादधानःकुसुमभरनतानां लासकः पादपानाम्।

जनितरुचिगन्धः केतकीनां रजोभिः परिहरति नभस्वान्प्रोषितानां मनांसि।।[68]

रघुवंश में प्रसङ्गवश तेरहवें सर्ग में वर्षा ऋतु के दृश्य मिलते हैं। म‌ल्यवान् पर्वत पर रहते हुए राम, वर्षाकाल के आने पर, सीता के विरह में व्याकुल हो ज‌ाते हैं। इसी का स्मरण कराते हुए राम सीता को कहते हैं-देखो, यह जो आगे माल्यवान् पर्वत की ऊँची चोटी दिखाई दे रही है, यहाँ जब बादलों ने नया जल बरसाना आरम्भ किया, तब तुम्हारे न रहने से मेरी आँखें भी जल बरसाने लगी थीं-

एतद्गिरेर्माल्यवतः पुरस्तादाविर्भवत्यम्बरलेखि शृङ्गम्। नवं पयो यत्र घनैर्मया च त्वद्विप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम्।।[69]

उन्हें पूर्व की स्मृति आती है जब सीता साथ थीं। इसी का सङ्केत करते हुए वे कहते हैं- उस समय वर्षा के क‌ारण पोखरों में से उठी हुई सोंधी गन्ध, अधखिली मञ्जरियों वाले कदम्ब के फूल और भौरों के मनोहर स्वर तुम्हारे न रहने से मुझे बड़े अखरे-

गन्धश्च धाराहतपल्लवानां कादम्बमर्धोद्गतकेसरं च। स्निग्धाश्च केकाः शिखिनां बभूवुर्यस्मिन्नसह्यानि विना त्वया मे।।[70]

यहाँ गन्ध, दृश्य व ध्वनि तीनों के बिम्ब प्रस्तुत किए गए हैं जो स्मृतिबिम्ब के अच्छे उदाहरण हैं।

सीता को सम्बोधित करते हुए राम पुनः कहते हैं कि-जब बादल गरजने लगते थे और गुफाओं में उनकी प्रतिध्वनि होने लगती थी तब मुझे वे दिन स्मरण हो आते थे, जब बादलों के गर्जन से डरकर तुम मुझसे आ लिपटती थीं। तुम समझ नहीं सकतीं कि माल्यवान् पर्वत पर वे पावस के दिन मैंने न जाने कितने कष्ट से बिताए-

पूर्वानुभूतं स्मरता च यत्र कम्पोत्तरं भीरु तवोपगूढम्। गुहाविसारीण्यतिबाहितानि मया कथञ्चिद्घनगर्जितानि।।[71]

वर्षा के क‌ारण वहाँ की धरती से जो भाप निकली, उससे कन्दलियों की कलियाँ खिलकर वैसी ही लाल-लाल हो उठीं जैसे विवाह के समय हवन का धुआँ लगने से तुम्हारी आँखें लाल हो गई थीं। अतः, उन्हें देख-देखकर तुम्हारा स्मरण हो आने से मैं बहुत बेचैन हो हो उठता था-

आसारसिक्तक्षितिवाष्पयोगान्मामक्षिणोद्यत्र विभिन्नकोशैः। विडम्ब्यमाना नवकन्दलैस्ते विवाहधूमारुणलोचनश्रीः।।[72]

‘विक्रमोर्वशीयम्’ में भी वर्षा ऋतु का बिम्बात्मक चित्रण हुआ है। उर्वशी के विरह में दुःखी राज‌ को और दुःखी करने के लिए वर्षा ऋतु का आगमन होता है। परन्तु राजा को तो सर्वत्र उर्वशी दिखाई देती है। बादल में बिजली को देख राजा को लगता है, काला राक्षस उसकी प्रिया को ले जा रहा है। जब उसका भ्रम टूटता है तब वह देखता है कि-

नवजलधरः संनद्धोऽयं न दृप्तनिशाचरः सुरधनुरिदं दुराकृष्टं न नाम शरासनम्।

अयमपि पटुर्धारासारो न बाणपरम्परा कनकनिकषस्निग्धा विद्युत्प्रिया न ममोर्वशी।।[73]

अर्थात् अरे, यह तो अभी-अभी बरसने वाला बादल है, राक्षस नहीं। इसमें खिंचा हुआ यह इन्द्रधनुष है, राक्षस का धनुष नहीं। ओर ये जो टप-टप बरसे जा रहे हैं ये बाण नहीं हैं, बूँदें हैं और यह जो कसौटी पर बनी हुई सोने की रेखा के समान चमक रही है, यह भी मेरी प्रिया उर्वशी नहीं है बिजली है।

प्रस्तुत उदाहरण में दो चित्र हैं, एक वर्षा ऋतु का, दूसरा राक्षस के द्वारा उर्वशी के अपहरण का। ‘सन्नद्धौ’, ‘दूराकृष्ट’ व ‘कनकनिकषस्निग्धा’ महत्त्वपूर्ण पद हैं जो प्रस्तुत व अप्रस्तुत दोनों चित्रों का निर्वाह करने में समर्थ हुए हैं।

राजा आगे कहता है कि मैंने समझा था कि मृग के समान आँखों वाली मेरी प्यारी को कोई राक्षस हरे लिए जा रहा है, पर यहाँ बिजली को चमकाता हुआ काला बादल केवल प‌ानी बरसाए डाल रहा है-

मया ज्ञातं मृगलोचनां निशाचरः कोऽपि हरति। यावन्नु नव तडिच्छ्यामलो धाराधरो वर्षति।।[74]

वे पुनः आगे कहते हैं-लगातार बरसने से च‌ारों ओर फैले हुए अरे बादल!इस समय मेरे कहने से तुम अपन‌ा क्रोध रोक लो। पृथिवी पर घूमकर जब मैं अपनी प्रिया को पा जाऊँ, तब तुम जो भी करोगे वह मैं सिरमाथे लेकर सहूँगा-

जलधर संहरैतं कोपमाज्ञप्तः अविरलधारासारदिशामुखकान्तः।

ए अहं पृथ्वीं भ्रमन्यदि प्रियां प्रेक्षे तदा यद्यत्करिष्यसि तत्तत्सहिष्ये।।[75]

पुरुरवा को वर्षाकाल के चिह्नों में राजा का सारा ठाट-बाट दिखाई देता है। बिजली के सोने से मढ़ा मेघ छत्र है, निचुल के पेड़ मञ्जरियों के चंवर डुला रहे हैं। मधुर गान करने वाले मोर भाटों का क‌ाम कर रहे हैं और भरनों के मोती भेंट करती पहाड़ियाँ ही प्रजा है-

विद्युल्लेखा कनकरुचिरं श्रीवितानं ममाभ्रं व्याधूयन्ते निचुलतरुभिर्मञ्जरीचामराणि।

धर्मच्छेदात्पटुतरगिरो वन्दिनो नीलकण्ठाः धाराहारोपनयनपरा नैगमाः सानुमन्तः।।[76]

वर्षा से मेघ का अविनाभाव सम्बन्ध है। और, कालिदास के प्राकृतिक बिम्बों में स्रोत के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। क‌लिदासविरचित ‘मेघदूत’ नामक काव्य मेघ के रूप, रंग, नाद आदि से सम्बन्धित चित्रों से सुशोभित है। कवि ने मेघ को सचेतन प्राणी के रूप में देखा है। वस्तुतः इसके बिना काव्य की कल्पना ही नहीं हो सकती थी। मेघ  के वैज्ञानिक स्वरूप-अचेतन स्थिति से भी कवि अनभिज्ञ नहीं है। कालिदास जानते हैं कि मेघ, धूम, ज्योति, सलिल मरुत् का संघटित रूप मात्र है, किन्तु साहित्य में विज्ञान के सत्य से बढ़कर शिवम् एवं सुन्दरम् का स्थ‌ान होता है। कालिदास मेघ को उच्चवंशोत्पन्न मानते हैं। वह दूर-दूर तक जाने वाला है। प्राकृतिक सौन्दर्य से सम्पन्न होने के साथ-साथ मेघ जनकल्याण की भावना से भी ओत-प्रोत है। वह संतप्तों का रक्षक है। मेघ को देखते ही जन-मन में उत्कण्ठा, आशा व प्रेमभाव का सञ्चार हो जाता है। इन्हीं गुणों के आधार पर कवि ने मेघ का मानवीकृत बिम्ब खड़ा किया है। मेघ के रूप, वर्ण व गर्जन को कवि ने बिम्बों में प्रस्तुत किया है। मेघ की क्रिया व गुणों के भी बिम्ब दिए गए हैं।

मेघदूत में कतिपय स्थ‌ानों पर मेघ के प्राकृतिक रूप को इन्द्रिय संवेद्य रूप में प्रस्तुत किया है। ये बिम्ब सर्वथा अलङ्कृत हैं। मेघदूत के आरम्भ में ही गगन में गतिमान मेघ का सुन्दर, सजीव चित्र है-

मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः।

गर्भाधानक्षणपरिचयान्नुनमाबद्धमालाः सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः।।[77]

मेघ आकाश में गतिमान है। मन्द-मन्द वायु उसे प्रेरित कर रही है। एक ओर चातक मधुर पुकाररत है। बलाकाएं साथ-साथ लगी हुई हैं। यहाँ रूप, स्पर्श व शब्द का सम्मिलित दृश्य है। यह बिम्बविधान का विशुद्धतम उदाहरण माना जा सकता है। शब्दों का चयन भी अत्यन्त अनुकूल है।

आगे इसी दृश्य में इतना संयोजन ओर हो ज‌ाता है कि मेघ के साथ नभ में राजहंस भी कमलनाल के टुकड़ों को मुख में दबाकर उड़ने लगते हैं-

कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्ध्रामवन्ध्यां तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः।

आ कैलाशाद् विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः सम्पत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः।।[78]

अर्थात् हे मेघ! जो कि पृथिवी को शिलीन्ध्रपुष्पों से युक्त और सफल करने को समर्थ है, कानों को सुख देने वाले तुम्हारे उस गर्जन को सुनकर मानसरोवर में जाने के लिए उत्कण्ठित राजहंस मार्ग में खाने के लिए मृणाल के अग्र भाग के टुकड़ों को लेकर आकाश में कैलाश पर्वत तक तुम्हारे सहचर होंगे।

मेघ से सम्बन्धित दूसरे प्रकार के बिम्ब वे हैं जहाँ मेघ के प्राकृतिक रूप को आलम्बन तो बनाया गया है किन्तु उसका आलङ्कारिक वर्णन करते हुए उसे किसी अप्रस्तुत रूप में भी देखा गया है। ये बिम्ब भी दो प्रकार हैं-क) जिनमें तुलना के लिए लाया गया सादृश्य भी प्रस्तुत की भाँति वर्ण्य है। ख) जिनमें मेघ की किसी अप्रत्यक्ष उपमा‌न से तुलना की गई है। मेघ के इस प्रकार के अलङ्कृत बिम्ब मेघदूत में अत्यन्त सजीव और सरस हैं। ‘क’ प्रक‌ार के बिम्ब, जिनमें दोनों ही विषय वर्ण्य हैं, अतिशय चमत्कार के आधायक हैं। उत्तरमेघ में यक्ष अलकापुरी के प्रास‌ादों की प्रशंसा करते हुए मेघ व भवनों का एक बिम्ब-प्रतिबिम्ब चित्र प्रस्तुत करता है-

विद्युत्वन्तं ललितवनिताः सेन्द्रचापं सचित्राः संगीताय प्रहतमुरजाः स्निग्धगम्भीरघोषम्।

अन्तस्तोयं मणिमयभुवस्तुङ्गमभ्रंलिहाग्राः प्रासादास्त्व‌ां तुलयितुमलं यत्र तैस्तैर्विशेषैः।।[79]

ऊँचे-ऊँचे भवन अपनी अनेक विशिष्टताओं के कारण मेघ से बराबरी करने में समर्थ हैं-मेघ में है विद्युत्, अलका से प्रत्येक प्रासाद में हैं ललित वनिताएं, जो विद्युत् की ही भाँति लास्यमयी एवं अपनी रूपप्रभा से आँखों को चकाचौंध करने वाली है। मेघ में है इन्द्रधनुष, प्रास‌ादों में है विभिन्न वर्णों का चित्रण, मेघ की है स्निग्ध गम्भीर ध्वनि और अलका के प्रासाद में है संगीत के लिए प्रहत मृदङ्ग का गुरु-मन्द्र-रव जैसे मेघ अन्तस्तोय है, अर्थात् जलपूर्ण होने के कारण तरलाकार है, अलका के प्रासादों के मणिमय स्वच्छ आँगन भी वैसे ही हैं। मेघ जैसे गगनस्पर्शी हैं, प्रास‌ाद भी वैसे ही गगनस्पर्शी हैं। इसीलिए सब ओर से वे समान हैं। इस बिम्ब में यह कहना कठिन है कि मेघ अप्रस्तुत है और प्रासाद प्रस्तुत। कवि ने अगल-बगल दो सुन्दर चित्र सजा दिए गए हैं। इसी प्रकार अन्यत्र-

तस्यास्तीरे रचितशिखरः पेशलैरिन्द्रनीलैः क्रीडाशैलः कनककदलीवेष्टनप्रेक्षणीयः।

मद्गेहिन्याः इति सखे! चेतसा कातरेण प्रेक्ष्योपान्तस्फुरिततडितं त्वां तमेव स्मरामि।।[80]

बावड़ी के किनारे, सुन्दर नीलम मणियों से बने हुए शिखरों वाला एवं सुनहरी कदली की बाढ़ से दर्शनीय क्रीडा पर्वत है। किनारों पर चमकती विद्युत् से युक्त मेघ देखकर, यक्ष को, उसकी याद सताने लगती है। पर्वत नीलमणियों से जटित है, मेघ भी नीला है। दोनों में रूप-रंग का साम्य है। चञ्चल कनक-कदली विद्युत् के समान है। यहाँ दोनों ही वर्ण्य वस्तु की भाँति हैं, अलङ्कार्य व अलङ्कार जैसी पृथक् स्थिति इनकी नहीं है।

मेघ में अनेक बिम्ब ऐसे हैं जहाँ मेघ की स्थिति को अनेक सदृश वस्तुओं  से मूर्त रूप प्रदान किया गया है। मेघदूत में इस प्रक‌ार के बिम्ब अधिकता से मिलते हैं। रामगिरि के शिखरों को जब मेघ स्पर्श करता है, तो लगता है म‌ानो कोई मतवाला हाथी अपने दाँतों से पर्वत पर ठूंसा मारने का खेल खेल रहा हो-

तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबलाविप्रयुक्तः स कामी नीत्वा मासान्कनकवलयभ्रंशरिक्तप्रकोष्ठः।

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।[81]

आकार, रंग व ध्वनिसाम्य के क‌ारण गज का मेघ से सादृश्य रूढ़ सा हो गया है, किन्तु प्रस्तुत उदाहरण में गज को एक विशेष क्रिया में रत बताने से रूढ़ता समाप्त हो गई है। ऋतुसंहार में भी मेघ को मुक्तकुञ्जर कहा गया है।

जब मेघ आकाश में उड़ता है तो सिद्ध बालाओं को ऐसा लगता है कि जैसे पवन पर्वत-शिखर को उड़ाए लिए जा रहा है-

अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभिर्दृष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धान्तङ्गनाभिः।

स्थानादस्मात्रसनिचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं दिङ्नागानां पथि परिहरन्स्थुलहस्तावलेपान्।।[82]

अर्थात् हे मेघ! तुम्हारा उत्साह देखकर सिद्धों की सुन्दरियाँ मोह से ‘वायु पर्वत की चोटी उड़ा ले जा रहा है क्या?’ ऐसा विचारकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो जायेंगी। तुम आर्द्र स्थलवेतसों से सम्पन्न इस आश्रम से आका‌शमार्ग में बड़ी-बड़ी सूँड़ों के आक्रमण से बचते हुए अलकापुरी में जाने के लिए उत्तराभिमुख होकर आकाश में उड़ ज‌ाओ। यहाँ पर्वत शिखर का उपमान मेघ को एक विशेष आकार प्रदान करता है।

मेघ विभिन्न स्थानों पर गमन करता है और अनेक रूप धारण करता है। कालिदास की उर्वर कल्पना उन्हें सादृश्यों से प्रत्यक्ष करती चलती है। आम्रकूट पर स्थित मेघ का एक सुन्दर शब्द चित्र कवि ने खींचा है-

छन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रैस्त्वय्यारूढे शिखरमचलः स्निग्धवेणीसवर्णे।

नूनं यास्यत्यमरमिथुनप्रेक्षणीयामवस्थां मध्ये श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः।।[83]

अर्थात् हे मेघ! पके हुए फलों से सुशोभित होनेवाले वन के आम्रवृक्षों से आच्छादित पार्श्वदेशों से युक्त आम्रकूट पर्वत के शिखर पर स्निग्ध केशबन्ध के सदृश तुम जब चढ़ोगे तब वह पर्वत मध्यभाग में कृश और अन्यत्र विस्तार के साथ सफेद पृथिवी के स्तन के समान होता हुआ देवदम्पतियों से दर्शनीय अवस्था को निश्चय प्राप्त कर लेगा।

मेघ के तीसरे प्रकार के बिम्ब वे हैं जिनमें मेघ को एक संवेदनशील प्राणी के रूप में दिखाया गया है। उसपर मानवीय भावों का‌ आरोप किया गया है। मेघदूत में इसीलिए उसे एक संवेदनशील दूत के कार्य में नियुक्त किया गया है। उसे रामगिरि पर्वत का मित्र बताया गया है और उससे विदा माँगने के लिए कहा गया है-

आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु।[84]

विभिन्न नदियों के सम्बन्ध में उसे एक चाटुकार व कामी नायक का बिम्ब दिया गया है। नदियों के सन्दर्भ में ये बिम्ब देखे जा चुके हैं। महाकाल मन्दिर में कवि उसे भक्त के रूप में देखता है। वह परोपकारी है। रामगिरि से अलका तक के मार्ग में वह सभी का कुछ न कुछ उपकार करता चलता है। मेघ यक्ष  के लिए ‘दयिताजीवनालम्लबदाता’ है। प्रोषितपतिकाओं को आश्वासन देने वाला और कृषकों का सर्वस्व है। उज्जयिनी में मालिनें धूप में फूल बीनते-बीनते पसीने से परेशान हो उठती हैं। मेघ उनके मुखों पर छाया करके बड़ा उपकार करता है-

गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तकर्णोत्पलानां छायादानात् क्षणपरिचितः पुष्पलावीमुखानाम्।।[85]

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति के सहज व्याप‌ारों को भी कवि अपनी कल्पना से संवेदनायुक्त कर अलोकिक अनन्द की सृष्टि करता है।

उद्दीपन के रूप में भी मेघ के बिम्ब आए हैं। मेघ को देखकर सुखी जन्तु भी उत्कण्ठित हो जाते हैं। ऋतुसंहार में मेघ का उद्दीपन रूप वर्णित है। विरही जनों का दुःख मेघदर्शन से बढ़ता है। रघुवंश में पुष्पक विमा‌न से लौटते समय मेघ के जो दृश्य आते हैं वे राम के विरहोद्दीपन के कारण बने थे।[86]

मेघों को, अन्य वस्तुओं के रूप गुण इन्द्रियगम्य कराने हेतु, अप्रस्तुत रूप में भी अनेकधा लाया गया है। आकाशीय उपादानों में मेघ से सम्बन्धित विद्युत्, इन्द्रधनुष आदि के बिम्ब स्वतः ही आ गए हैं। कहा है-

रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्ताद्वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनुष्खण्डमाखण्डलस्य।

येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्येते ते बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः।।[87]

अर्थात् हे मेघ! पद्मराग आदि मणियों की क‌न्तियों का सम्मिश्रण के सम‌ान दर्शनीय इन्द्रधनु, आगे वल्मीक के अग्र भाग से दिखाई पड़ रहा है। इससे श्याम वर्णवाला तम्हारा शरीर उज्ज्वल कान्तिवाले मयूरपिच्छ से गोपवेष धारण करनेव‌ाले कृष्ण शरीर के समान अतिशय शोभा प्राप्त कर लेगा।

भट्टिकाव्य में वर्षा ऋतु

सुग्रीव के राज्याभिषेक के बाद वनों में धीरे-धीरे कँपानेवाली वायु बहने लगी। आक‌ाश में व्याप्त होने वाले मेघ भी उमड़ पड़े-

ततः कर्ता वनाऽऽकम्पं ववौ वर्षाप्रभञ्जनः। नभः पूरयितारश्च च समुन्नेमुः पयोधराः।।[88]

शोभायम‌ान, वज्रनिर्घोष करने वाले, सूर्य को ढक देने वाले, आकाश में सर्वत्र व्याप्त, विद्युत व‌ाले होने के कारण स्वयं चमकने वाले एवं शोभा बढ़ाने वाले मेघ, बढ़ने वाले धान्यों के लिए तृप्तिकारी शुद्धजल, फूटे घड़े के समान बरसने लगे-

तर्पणं प्रजनिष्णून‌ां शस्यानाममलं प्रियः। रोचिष्णवः सविस्फूर्जा मुमुचुर्भिन्नवद्घनाः।।[89]

माल्यवान् नाम के पर्वत पर रहते हुए विजयी राम उन मेघों को देखकर अधीर और खिन्न होकर उन्मत्त और बेचैन पुरुष के समान विलाप करने लगे-

तान् विलोक्याऽसहिष्णुः सन् विललापिन्मदिष्णुवत्। वसन् माल्यवति ग्लास्नू रामो जिष्णुरधृष्णुवत्।।[90]

भ्रमणशील, कदम्बपुष्पगन्धी एवं मेघजल कणों से शीतल वायुदेव शान्तमुनियों को भी अत्यन्त बेचैन कर देती है तो औरों की क्या कथा-

भ्रमी कदम्बसंभिन्नः पवनः शमिनामपि। क्लमित्वं कुरुतेऽत्यर्थं मेघशीकरशीतलः।।[91]

राम कहते हैं कि ज्वरवाले रोगी के समान मेरे आयासी मन के द्वारा द्रोही जुगुनुओं से युक्त नेत्रवृत्ति को रोकने वाल‌ा अन्धकार सहा नहीं जायेगा-

संज्वारिणेव मनसा ध्वान्तमायासिना मया। द्रोहि खद्योतसंपर्कि नयनाऽमोषि दुःसहम्।।[92]

शब्दकारी तथा आघातकारी चातक पक्षियों से युक्त च‌ारों ओर बिखरी हुई बिजलियाँ मुझे व्यथित कर रही हैं-

कुर्वन्ति परिसारिण्यो विद्युतः परिदेविनम्। अभ्यासघातिभिरामिश्राश्चातकैः परिराटिभिः।।[93]

अङ्गस्पर्श करनेवाले ठण्ढे जलकण भी जल‌ानेवाले से ज्ञात होते हैं और नाचनेवाले एवं शब्द करनेवाले मयूर भाते नहीं हैं-

संसर्गो परिदाहीव शीतोऽप्याभाति शीकरः। सोढुमाक्रीडिनोऽशक्याः शिखिनः परिवादिनः।।[94]

ये भाग्यानुकूल गिरनेवाली जलध‌ाराएं शत्रु के समान अपराध न करनेवाले प्रेमी जन को भी पीड़ित कर रही हैं-

एता देवानुरोधिन्यो द्वेषिण्य इव रागिणम्। पीडयन्ति जनं धाराः पतन्त्योऽनपकारिणम्।।[95]

यह वज्रनिर्घोष करनेवाल‌ी वर्षा ऋतु ‌सुख-दुःख से परे रहनेवाले योगी को भी परिमोहित करेगी, ओरों की क्या कथा-

कुर्याद्योगिनमप्येष स्फूर्जावान् परिमोहिनम्। त्यागिनं सुख-दुःखस्य परिक्षेप्यम्भसामृतुः।।[96]

गर्वीला अविश्वासी चातक पक्षी मेरे मन को कुदेरता हुआ ‘मुझे जल देगा’ इस धारणा से मेघ बारम्बार याचना कर रहा है-

विकत्थी याचते प्रमत्तविश्रम्भी मुहुर्जलम्। पर्जन्यं चातकः पक्षी निकृन्तन्निव मानसम्।।[97]

बकवादी चित्तप्रमाथी अत एव विरहियों को तड़पाने वाले ये मेढक कब विफल मनोरथ होंगे-

प्रलापिनो भविष्यन्ति कदा न्वेतेऽपलाषिणः। प्रमाथिनो वियुक्तानां हिंसकाः पापदुर्दुरा।।[98]

पूर्वोक्त प्रकार से निन्दा करने वाले, क्लेश सहने वाले, विलाप करने वाले राम, वर्षा ऋतु में अन्धकार के कारण अपने को रात समझने व‌ाले, दिन को तथा रात्रि को किसी प्रकार व्यतीत करने लगे-

निन्दको रजनिंमन्यं दिवसं क्लेशको निशाम्। प्रावृष्यनैषीत काकुत्स्थः कथञ्चित् परिवेदकः।।[99]

किरातार्जुनीयम् में वर्णित वर्षा ऋतु

वर्षा ऋतु आते ही जल से पूर्ण मेघवाला आकाश शोभित हुआ। लता की तुल्य बिजलियों की चमक समृद्धि को प्राप्त हुई। रमण क्रिया में कलह हटानेवाली जल के भार से गम्भीर मेघगर्जन दिगन्तों में विस्तृत हो गया-

सजलजलधरं नभो विरेजे विवृतिमियाय रुचिस्तडिल्लतानाम्। व्यवहितरतिविग्रहैर्वितेने जलगुरुभिः स्तनितैर्दिगन्तरेषु।।[100]

अर्जुन के आश्रम में चमेली के पुष्पों के मुकुलों को उत्पन्न करती हुई विरलरूप से बिन्दु को टपक‌ाने वाली जलवृष्टि ने भूमि की धूलि को मिट‌ा दिया-

परिसुरपतिसूनुधाम सद्यः समुपदधन्मुकूल‌नि मालतीनाम्। विरलमपजहार बद्धबिन्दुः सरजसतामवनेरपां निपातः।।[101]

अर्जुन वृक्ष के फूलों के विकास से सुगन्धवाली प्रतिदिशा में बहती हुई हवा से स्पर्श किया गय‌ा अत एव कामावेश ‌से आक्रान्त, धैर्यरहित और क्षुब्ध किया गया जीवलोक अपूर्व सा प्रतीत हो रहा है-

प्रतिदिशमभिगच्छताभिमृष्टः ककुभविक‌ाससुगन्धिनानिलेन। नव इव विबभौ सचित्तजन्मा गतधृतिराकुलितश्च जीवलोकः।।[102]

दुःखित चित्त को भी बार-बार हरण करती हुई पके हुए जम्बूफल के उपभोग से प्रसन्न कोयल ने नए ढंग से सम्पादित कण्ठ की मधुरता से मनोहर स्वर का विस्तार किया-

व्यथितमपि भृशं मनो हरन्ती परिणतजम्बुफलोपभोगहृष्टा। परभृतयुवतिः स्वनं वितेने नवनवयोजितकण्ठरागरम्यम्।।[103]

कदम्ब वृक्ष की हवा के और मद से मधुर मयूरों की आवाज के भी मन को हरण करने पर जयशील अर्जुन साधारण पुरुष की तरह धैर्य से विचलित नहीं हुए, क्योंकि महापुरुषों की समाधि का भङ्ग होना आसान नहीं है-

अभिभवति मनः कदम्बवायौ मदमधुरे च शिखिण्डिनां निनादे।

जन इव न धृतेश्चचचाल जिष्णुर्न हि महतां सुकरः समाधिभङ्गः।।[104]

कङ्कणों के समान मृणालदण्डों को धारण करने वाली, कुमुदवन को ही एक मुख्य दुकूल को धारण करती हुई नील झिण्टी को पहनती हुई शरत् को वधू की तरह वर्षा ऋतुरूप वर ने निर्मल तलवाले हाथ के समान कमल में ग्रहण कर लिया-

धृतबिसवलयावलिर्वहन्ती कुमुदवनैकदुकू्लमात्तबाणा। शरदमलतले सरोजपाणौ धनसमयेन वधूरिवाललम्बे।।[105]

इस प्रकार कहा जा सकता है कि किरातार्जुनीयकार ने अपनी शब्दयोजन‌ा के द्वारा प्रकृति की विविध उपादानों का आश्रय लेकर वर्षा ऋतु का सुन्दर चित्र खींचा था।इस वर्षा ऋतु का प्रभाव मनुष्य, पशु-पक्षी आदि प्रकृति के विभिन्न अंगों को प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त यह ऋतु अपनी उपस्थिति से ग्रीष्मकालीन शुष्क धरती में भी सजीवता का सञ्चार करती हुई इसे श्रीसम्पन्न बना देती है। ग्रीष्मकाल में जलाभाव के कारण वृक्ष शुष्क दृष्टिगोचर होते हैं, परन्तु वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही वृक्ष-वनस्पतियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। कदम्ब आदि कतिपय वृक्ष तो पुष्प, फल आदि को धारण कर लेते हैं और इन पुष्पों की सुगन्धि से लोग आनन्दित होते हैं। इस ऋतु के आगमन से आतपताप के आधिक्य से मुक्ति मिलती है। वर्षा की बूँदों से पशु-पक्षी अत्यन्त प्रसन्न हो उठते हैं। मयूर नर्तन करने लगते हैं और कोकिलों का कूकना उनकी प्रसन्नता की अभिव्यक्ति करता है। विरही जनों के लिए यह ऋतु प्रीतिकर नहीं है। इस ऋतु में आकाश में छाए क‌ाले-क‌ाले मेघ तथा चमकती बिजलियाँ विरहियों के चित्त को अत्यन्त व्याकुल बना देते हैं।

शिशुपालवध में वर्णित वर्षा ऋतु

भारवि के पश्चात्वर्ती कवि होने के कारण महाकवि माघ में अलङ्कृतशैली के प्रति प्रेम कुछ अधिक ही है। भारवि पर तो न्यूनाधिक सुकुमार शैली का प्रभाव था, किन्तु माघ पर तो इस शैली का तनिक भी प्रभाव दिखाई नहीं देता है। यही कारण है कि माघकाव्य में किरातार्जुनीय की तुलना में पाण्डित्यप्रदर्शन का प्रकर्ष दिखाई देता है।

शिशुपालवध में ग्रीष्म ऋतु के पश्चात् वर्षा ऋतु का वर्णन किया गया है। जहाँ ग्रीष्म ऋतु का संक्षिप्त वर्णन प्राप्त होता है वहीं वर्षा ऋतु का अपेक्षाकृत विस्तृत वर्णन दृष्टिगत होता है। चमकते हुए चञ्चल बिजली रूपी नेत्रों वाली (नहीं बरसने से) बड़े-बड़े मेघोंवाली, (श्रीकृष्ण भगवान् की सेवा के लिए एक-साथ सब ऋतुओं के उपस्थित होने के कारण) अपने समय की अपेक्षा को छोड़ी हुई मेघश्रेणी रैवतक पर्वत पर उस प्रकार उपस्थित हुई, जिस प्रकार चमकते हुए एवं चञ्चल बिजली के समान नेत्रोंवाली (युवावस्था होने से) नहीं गिरे हुए अर्थात् उन्नत एवं बड़े-बड़े स्तनों वाली (कामवृद्धि होने से धैर्य धारण नहीं कर सकने के कारण) अपने समय की अपेक्षा नहीं की हुई नायिका प्रिय के पास असमय में उपस्थित हो जाती है-

स्फुरदधीरतडिन्नयना मुहुः प्रियमिवागलितोरुपयोधरा। जलधरावलिरप्रतिपालितस्वसमया समयाञ्जगतीधरम्।।[106]

श्रावण मास में आकाश में गजसमूह के समान नीलवर्ण तथा उन्नत नए मेघों को देखकर किस स्त्री ने एक रसवाले अर्थात् दूसरे रसों का त्यागकर केवल शृङ्गार रसवाले किस प्रियतम को नहीं चाहा?अर्थात् सभी अङ्गनाओं ने प्रियतम को चाहा तथा उनके प्रति अभिस‌ार भी किया-

गजकदम्बकमेचकमुच्चकैर्नभसि वीक्ष्य नव‌ाम्बुदमम्बरे। अभिससार न वल्लभमङ्गना न चकमे च कमेकरसं रहः।।[107]

इन्द्रधनुष यक्त मेघ की विचित्रता ने, अनेक प्रकार के मणियों से युक्त कुण्डलों की कान्ति के समूह से मिश्रित शरीर की श्यामल कान्तिवाले तथा बलिदैत्य को नष्ट करनेवाले वामन भगवान् के शरीर का अनुसरण किया अर्थात् वामन भगवान् के शरीर के समान शोभने लगा-

अनुययौ विविधोपलकुण्डलद्युतिवितानकसंवलितांशुकम्। धृतधनुर्वलयस्य पयोमुचः शबलिमा बलिमानमुषो वपुः।।[108]

तीव्र वायु से चपल मेघों से क्षणमात्र में दृष्टिगोचर होकर अन्तर्हित बिजली, तीव्र वायु से चञ्चल डालियों से क्षणमात्र दृष्टिगोचर होकर अन्तर्हित नए तमाल वृक्ष के सदृश श्यामवर्ण आकाशरूप वृक्ष की मञ्जरी के समान शोभती थी-

द्रुतसमीरचलैः क्षणलक्षितव्यवहिता विटपैरिव मञ्जरी। नततमालनिभस्य नभस्तरोरचिररोचिररोचत वारिदैः।।[109]

तत्काल मरण को प्राप्त होनेवाली अर्थ‌ात् आसन्नमरणा अत एव उसके दुःख से रोती हुई सखियों के घबड़ाने से दुःखित बान्धवोंवाली किसी पथिकपत्नी ने मेघसमूह को दीनता तथा रोष के साथ देखा-

पटलमम्बुमुचां पथिकाङ्गना सपदि जीवितसंशयमेष्यती। सनयनाम्बुसखीजनसंभ्रमाद्विधुरबन्धुरबन्धुरमैक्षत।।[110]

खिले हुए कन्दली-पुष्प को कँप‌ानेवाली तथा मानिनियों के मन को झुकाने वाली मेघ की हवा ने वनों को झुका दिया तथा प्रवासियों को सहसा कम्पित कर दिया-

प्रवसतः सुतरामुदकम्पयद्विदलकन्दलकम्पनलालितः। नमयति स्म वनानि मनस्विनीजनमनोनमनो घनमारुतः।।[111]

अपनी ध्वनि-सम्पत्ति (अधिक गरजने) से मसाला लगाए हुए नगाड़े के शब्द को जीतनेवाली मेघश्रेणी ने उन्मत्त होकर मधुर केका शब्द करते हुए मोरों को नचाया अर्थात् मेघ की गम्भीर ध्वनि को सुनकर मोर उन्मत्त होकर बोलते हुए नाचने लगे-

जलदपङ्क्तिरनर्तयदुन्मदं कलविल‌ापिकदम्बकम्। कृतसमार्जनमर्दलमण्डलध्वनिजया निजया स्वनसम्पदा।।[112]

नए कदम्ब के पुष्प के पराग से आकाश को अरुण किए हुए कन्दलीपुष्पों की सुगन्ध से युक्त वनपवन ने रागियों के मन में स्त्री विषयक नया‌ नया अनुराग उत्पन्न किया अर्थात् उक्तरूप पवन के बहाने से कामी पुरुषों का स्त्रियों में अधिकाधिक अनुराग हो गया-

नवकदम्बजोरुणिताम्बरैरधिपुरन्ध्रि शिलीन्ध्रसुगन्धिभिः। मनसि रागवतामनुरागिता नवनवा नववायुभिरादधे।।[113]

बादलों ने बहुत थोड़े, (बरसे हुए) पानी के प्रथम बिन्दुओं से तापरहित, श‌ान्तधूलिवाले (प्रथम वृष्टि होने से थोड़ा जल पड़े हुए सत्तू के समान सने), सौरभवाले, रैवतक के मैदान को स्त्रीजनों के लिए सुखपूर्वक चलने योग्य नहीं बना दिया ऐसा नहीं अर्थात् थोड़ा पानी बरसने से छिड़काव-सा करके रैवतक के मैदान को धूलिरहित एवं सौरभयुक्त के अङ्गनाओं के आनन्दपूर्वक चलने योग्य बना ही दिया-

शमिततापमपोढमहीरजः प्रथमबिन्दुभिरम्बुमुचोऽम्भसाम्। प्रविरलैरचलाङ्गनमङ्गनाजनसुगं न सुगन्धि न चक्रिरे।।[114]

हाथीदाँत के समान स्वच्छ, घूमते हुए भ्रमररूपी मृगका‌न्ति व‌ाला तथा सूक्ष्माग्र केतकी के पुष्प को लोगों ने सघन मेघ के गरजने से आकाश से गिरते हुए चन्द्रमा के टुकड़े के समान देखा-

द्विरददन्तवलक्षमलक्ष्यत स्फुरितभृङ्गमृगच्छवि केतकम्। घनघनौघविघट्टनया दिवः कृशशिखं शशिखण्डमिव च्युतम्।।[115]

पीसे गये मोती के चूर्ण के समान अत्यन्त श्वेतवर्ण तथा स्फुरित होते हुए झरनों के सूक्ष्म जलकणों के सम‌ान मनोहर कुटज के फूलों के परागकण मानो दही के चूर्ण के समान प्रतीत होते हैं-

दलितमौक्तिकचूर्णविपाण्डवः स्फुरितनिर्झरशीकरचारवः। कुटजपुष्पपरागकणाः स्फुटं विदधिरे दधिरेणुविडम्बनाम्।।[116]

नए जलकण के समान कोमल म‌ालती के पुष्पों के गुच्छों पर निरन्तर बैठे हुए अत एव परागरञ्जित होने से चलते हुए नक्षत्रों के समान भौंरे शुभ परागसमूह से उत्पन्न श्वेतभाव को धारण कर लिए अर्थात् उक्तरूप भौंरे सम्पूर्ण शरीर में पराग समूह के लगने से श्वेत हो गए-

नवपयः कणकोमलमालतीकुसुमसंततिसंततसङ्गिभिः। प्रचलितोडुनिभैः परिपाण्डिमाः शुभरजोभरजोऽलिभिराददे।।[117]

पतिरहित (विरहिणी) स्त्रियों के चित्त की रक्षा नहीं करनेवाली अर्थात् विरहिणियों के लिए दुखद‌ायिनी नए कदम्बों के वन की श्रेणी ने कपड़े के समान मेघ से आच्छादित (नायिकारूपिणी) दिशाओं के लिए अपने पराग को, कपड़े को सुवासित करनेवाले चूर्ण के समान बिखेर दिया-

निजरजः पटवासमिवाकिरद्धृतपटोपमवारिमुच‌ां दिशाम्। प्रियवियुक्तवधूजनचेतसामनवनी नवनीपवनावलिः।।[118]

प्रणयकलहयुक्त अत एव रति से विमुख भी अङ्गनाएं तत्काल मेघ के गरजने से भयभीत होकर इसके बाद अर्थात् मेघ के गरजने पर भयभीत होने के उपरान्त त्रिवली रहित उदर से युक्त होकर प्रियों का आलिङ्गन करने के लिए मुड़ी-

प्रणयकोपभृतोऽपि पराङ्मुखाः सपदि वारिधरारवभीरवः। प्रणयिनः परिरब्धुमथाङ्गना ववलिरे वलिरेचितमध्यमाः।।[119]

वस्तुतः संस्कृत काव्यजगत् में प्रकृतिवर्णन‌ पर विशेष बल दिया गया है। वर्षा ऋतु प्रकृतिदेवी का अद्भुत अवदान है। इसी का आश्रय लेकर सृष्टिचक्र अपनी गति से चलता है। इस सत्य को कवियों ने जाना, अतः प्रायः सभी मह‌ाकवियों ने वर्षा ऋतु के काव्यात्मक वर्णन‌ से अपने काव्यों को समृद्ध किया है।

 

[1] काव्यादर्श-1/16

[2] काव्यमीमांसा-पृ 210, 213-214

[3] वाल्मीकिरामायण-किष्किन्धाकाण्ड/28/2

[4] तत्रैव-28/3

[5] तत्रैव-8/4

[6] तत्रैव-28/5

[7] तत्रैव- 28/6

[8] तत्रैव- 28/7

[9] तत्रैव- 28/8

[10] तत्रैव- 28/9

[11] तत्रैव- 28/10

[12] तत्रैव- 28/11

[13] तत्रैव- 28/12

[14] तत्रैव- 28/13

[15] तत्रैव- 28/14

[16] तत्रैव- 28/15

[17] तत्रैव- 28/16

[18] तत्रैव- 28/17

[19] तत्रैव- 28/18

[20] तत्रैव- 28/19

[21] तत्रैव- 28/20

[22] तत्रैव- 28/21

[23] तत्रैव- 28/22

[24] तत्रैव- 28/23

[25] तत्रैव- 28/24

[26] तत्रैव- 28/25

[27] तत्रैव- 28/26

[28] तत्रैव- 28/27

[29] तत्रैव- 28/28

[30] तत्रैव- 28/29

[31] तत्रैव- 28/30

[32] तत्रैव- 28/31

[33] तत्रैव- 28/32

[34] तत्रैव- 28/33

[35] तत्रैव- 28/34

[36] तत्रैव- 28/35

[37] तत्रैव- 28/36

[38] तत्रैव- 28/37

[39] तत्रैव- 28/38

[40] तत्रैव- 28/39

[41] तत्रैव- 28/40

[42] तत्रैव- 28/41

[43] तत्रैव- 28/42

[44] तत्रैव- 28/43

[45] तत्रैव- 28/44

[46] तत्रैव- 28/45

[47] तत्रैव- 28/46

[48] तत्रैव- 28/47

[49] तत्रैव- 28/48

[50] तत्रैव- 28/49

[51] तत्रैव- 28/50

[52] तत्रैव- 28/51

[53] तत्रैव- 28/53

[54] तत्रैव- 28/56

[55] ऋतुसंहार-2/1

[56] तत्रैव- 2/19

[57] तत्रैव- 2/5

[58] तत्रैव- 2/15

[59] तत्रैव- 2/16

[60] तत्रैव- 2/17

[61] तत्रैव- 2/2

[62] तत्रैव- 2/3

[63] तत्रैव- 2/4

[64] तत्रैव- 2/6

[65] तत्रैव- 2/13

[66] तत्रैव- 2/20

[67] तत्रैव- 2/21

[68] तत्रैव- 2/27

[69] रघुवंश-13/26

[70] तत्रैव- 13/27

[71] तत्रैव- 13/28

[72] तत्रैव- 13/29

[73] विक्रमोर्वशीय-4/7

[74] तत्रैव- 4/8

[75] तत्रैव- 4/11

[76] तत्रैव- 4/13

[77] पूर्वमेघदूत-9

[78] तत्रैव- 11

[79] उत्तरमेघदूत-1

[80] तत्रैव- 14

[81] पूर्वमेघदूत-2

[82] तत्रैव- 14

[83] तत्रैव- 18

[84] तत्रैव- 12

[85] तत्रैव- 26

[86] रघुवंश-13/28

[87] पूर्वमेघदूत-15

[88] भट्टिकाव्य-7/1

[89] तत्रैव- 7/2-3

[90] तत्रैव- 7/4

[91] तत्रैव- 7/5

[92] तत्रैव- 7/6

[93] तत्रैव- 7/7

[94] तत्रैव- 7/8

[95] तत्रैव- 7/9

[96] तत्रैव- 7/10

[97] तत्रैव- 7/11

[98] तत्रैव- 7/12

[99] तत्रैव- 7/13

[100] किरातार्जुनीयम्-10/19

[101] तत्रैव- 10/20

[102] तत्रैव- 10/21

[103] तत्रैव- 10/22

[104] तत्रैव- 10/23

[105] तत्रैव- 10/24

[106] शिशुपालवध-6/25

[107] तत्रैव- 6/26

[108] तत्रैव- 6/27

[109] तत्रैव- 6/28

[110] तत्रैव- 6/29

[111] तत्रैव- 6/30

[112] तत्रैव- 6/31

[113] तत्रैव- 6/32

[114] तत्रैव- 6/33

[115] तत्रैव- 6/34

[116] तत्रैव- 6/35

[117] तत्रैव- 6/36

[118] तत्रैव- 6/37

[119] तत्रैव- 6/38

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