संस्कृत-वाङ्मय में वर्णित सामाजिक जीवन-दर्शन (महाभारत के परिप्रेक्ष्य में)   5/5 (2)

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प्रवीण शर्मा

शोधच्छात्र

संस्कृत विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली

ई संकेत : praveensharmaarya@gmail.com

 

साहित्य समाज का दर्पण होता है। महाभारत नीति-दर्शन का भण्डार है। धर्मनीति, राजनीति , लोकनीति और व्यवहार नीति आदि सभी प्रकार की नीतियां उपलब्ध हैं। महाभारत भारतीय संस्कृति का सागर है। उसमें वर्णित विषयों की इतनी अधिकता और विविधता है कि यह कथन प्रचलित हो गया- ‘यन्न भारते तन्न भारते’ अर्थात् जो महाभारत में नहीं वह भारत में कहीं नहीं मिलेगा।Mahabharat Research

एक लाख श्लोकों वाले महाभारत में बहुत सी गूढ बातें हैं। ऐसे विषद गम्भीर और गूढ़ ग्रन्थ में अनेक विषयों की विस्तृत उपस्थापना हुई है, जिनमें से एक विषय नीति सम्बन्धी है। इसमें भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, विदुर व स्वयं कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के नीति सम्बन्धी विचार तथा अन्य अनेक  ऋषि मुनि राजा और महापुरुषों के नैतिक मूल्य परक वर्णन एवं आख्यान विपुल विस्तार वाली हैं। महाभारत की प्रतिष्ठा भारतीय संस्कृति के प्रतिपादक ग्रन्थों में अनुपम है। यह एक उपजीव्य महाप्रबन्धात्मक काव्य होने पर भी मूलतः इतिहास संज्ञा से अभिहित किया गया है। इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास ने स्वयं इसे इतिहासोत्तम बतलाया है। जिसका आश्रय लेकर कवि की प्रतिभा नए-नए काव्यों की गीतिकाव्यों तथा महाकाव्यों की और नए नए रूपकों की संघटना में कृतार्थ हुई है। इतना ही नहीं, यह एक साथ एक-कालावच्छेदेन अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, कामशास्त्र तथा मोक्ष शास्त्र है, इसकी तुलना इस वैचित्र्य के कारण किसी भी अन्य ग्रन्थ से हो ही नहीं सकती। फलतः यह अपनी विषिष्टता की दृष्टि से एकदम बेजोड़ है, अन्ततः  अनुपमेय है। इस ग्रन्थ में मानव जीवन को सफल बनाने के लिए अनेक नैतिक मूल्यों की चर्चा हुई है। भगवान् कृष्णद्वैपायन के अनुसार सबका मूल, सत्य और अहिंसा है। इसे हम ऐसा भी कह सकते हैं कि सम्पूर्ण मानवीय गुणों का आधार सत्य और अहिंसा है। सम्पूर्ण गुणों का धागा सत्य और अहिंसा से बँधा हुआ है। इतना ही नहीं ये दोनों गुण भी अन्योन्याश्रित हैं। एक दूसरे के बिना दोनों गुणों की सम्भावना भी नहीं है। महाभारत काल तक यज्ञों में हिंसा का अभाव था । महाराज युधिष्ठिर द्वारा किये गए राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञ में तथा दुर्योधन द्वारा किए गये यज्ञों में भी हिंसा का उल्लेख नहीं है। यज्ञों में हिंसा का प्रचलन महाभारत काल के पश्चात् बढता चला गया। बौद्ध काल तक यह काफी बढ चुका था। यह दो-तीन हजार वर्ष का समय भारतीय संस्कृति का अन्धकार युग माना जाता है।[1] आज हम देखते हैं कि समाज की दशा उत्तरोतर विकृत होती जा रही है। लोग अनन्त दुःखों, क्लेशों और विघ्नों का शिकार हो रहे हैं। परस्पर विरोधी स्वार्थों से प्रत्येक जाति दुःखी है। मन, वचन और क्रिया में समन्वय दिखायी देने वाला सद् मनोवृत्ति, सद्वचन और सत्कर्म दुर्लभ हो गए हैं। व्यष्टि-समष्टि का स्वस्थ ऐक्य भ्रष्टाचारों से क्षत-विक्षत हो रहा है। युद्ध विभीषिका प्रत्येक क्षण सामने दिखायी देता है। प्रीति, करुणा, सहानुभूति और न्यायतत्परता अन्तिम साँस ले रही है। पोषक और रक्षक तत्त्व कलह से दूर बने हुए हैं। घातक तत्त्व संसार को ग्रसने के लिए तत्पर बैठे हैं। सत्य की ओर किसी का ध्यान नहीं है और धर्म मरणासन्न अवस्था में है। मनुष्यों के क्रियाकलाप अत्यधिक भयावह होते जा रहे हैं। विशेषतः ज्ञान, अधिकार, धन और श्रम कलह के क्षेत्र बने हुए हैं। ऐसी दशा में नैतिक आचरण से ही संसार को सुखी और शान्त बनाया जा सकता है। इससे समाज के क्रियाकलाप सर्वतोभद्र किए जा सकते हैं। आज के दुखी और मरणोन्मुख संसार की एक ही सदौषधि है नैतिक मूल्यों का पालन। अतः महाभारत से नैतिक आचरण के कुछ ऐसे निर्देश प्राप्त किए जा सकते हैं जो वर्तमान में अत्यन्त प्रासंगिक और उपादेय हैं।

महाभारत में साक्षात् योगेश्वर कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में जो उपदेश दिया वह समस्त संसार के कल्याण हेतु है। उनका यही संदेश है कि सभी प्राणियों में सभी परमात्मा की भावना करें और सबके साथ मित्रता का व्यवहार करें। कृष्ण कहते हैं जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सब के साथ मैत्री भाव रखता है, सब पर करुणा करता है, ममता और अहंकार से रहित होता है, सुख-दुःख में समबुद्धि रखता है, क्षमाशील है, वह भक्त मुझे प्रिय है। इस प्रकार की हितकारी बातें कृष्ण द्वारा उपदिष्ट हैं। वस्तुतः महाभारत भारतीय संस्कृति का दस्तावेज है। धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, जीवन-मरण आदि समस्त जीवन की झांकियाँ उसमें दिखायी देती हैं। भाईयों का परस्पर प्रेम कैसे होना चाहिए यह पाण्डव और कौरव दोनों से ही अनुकरणीय़ है। मैत्री धर्म क्या होता है भला कर्ण से अधिक कौन बता सकता है। दानवीर कर्ण का चरित्र भी अद्भुत और श्लाघनीय है।

महाभारत की सर्वाधिक विशेषता यह है कि उसमें वर्णित समस्त पात्र चाहे वह सत्य की ओर हो अथवा असत्य की ओर, स्वयं में एक अद्भुत चरित्र संजोये हुए है। तभी तो कौरव का साथ देने वाला कर्ण भी इतिहास में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सफल , हुआ है। द्रोणाचार्य, भीष्मपितामह आदि ऐसे पात्र हैं जो कौरव दल की ओर होने के बाद भी हमारी अथवा यों कहें कि सहृदयों की प्रशंसा के ही पात्र बनते हैं।

महाभारत से विभिन्न नैतिक मूल्य यथा- संतोष, मधुर वचन, सौहार्द, श्रद्धा, प्रतिज्ञा-पालन, त्याग, अतिथि-सत्कार, सेवाभाव, सदाचार, आत्मसंयम, शरणागत रक्षा, न्याय, उद्योग, सहिष्णुता, भक्ति, सत्य, अहिंसा, उपदेश आदि को आत्मसात् किया जा सकता है।

संतोष :  वैसे तो सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय में इस गुण की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है किन्तु महाभारत में संतोष की छाया कुछ अधिक प्रतिबिम्बित हुयी है ऐसा मेरा मन्तव्य है। दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि आदि कुछ पात्रों को छोड़कर बाकी सभी पात्र कम-ज्यादा उपर्युक्त गुण से युक्त दिखायी देते हैं। महाराह युद्धिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, विदुर, कर्ण, कुन्ती, गान्धारी, भीष्म, आचार्य द्रोण और कृष्ण के विचारों में यह गुण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूर्णतः प्रतिफलित होता है। कौरव सभा में हुए महान् तिरस्कार और अपमान को सहकर वनवास और अज्ञातवास के असह्य कष्ट को भोगकर वे युधिष्ठिर युद्ध टालने के लिए केवल पांच गावं लेकर शान्ति स्थापित करना चाहते हैं। तो इससे उनका संतोष गुण प्रतिफलित होता है। व्यास ने इस सन्दर्भ में कहा है –

संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।

कुतः तद्धनलुब्धानां इतश्चेतश्चधावताम्॥

मधुरवचन:   मानव को सदा ही सत्य और प्रिय भाषी होना चाहिए कभी भी अप्रिय सत्य नहीं कहना चाहिए वस्तुतः यही सनातन धर्म है कि हम मधुर वचनों का प्रयोग करें। मधुर वचन का अर्थ असत्य वचन नहीं हैं।[2] महाभारत में यह मधुर वचन शंखनाद में अन्तर्निहित होता प्रतीत होता है जब द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा के मरण का पता चलाता है युधिष्ठिर द्वारा।[3] यह मधुर वचन यद्यपि इतिहास में पाण्डवों के विरुद्ध भी प्रश्न खडा करता है।

सौहार्द :      कालिदास ने रधुवंश में लवकुशादि भाइयों के सौहार्द और परस्पर प्रेम का दिग्दर्शन कराते हुए संकेत किया है – ‘सौहार्दमेषां हि कुलानुसारी’। महाभारत में भी हमें पाण्डुपुत्रों एवं श्रीकृष्ण के मध्य यही निश्छल प्रेम सर्वत्र दिखाई देता है। सुख दुःख, सम्पत्ति, विपत्ति, सभी में पाण्डव सदा एकमन रहे। अपने प्राणस्वरूप जीवन रक्षक ममेरे भाई माधव के प्रति उनका स्नेह जीवन पर्यन्त निश्छल रहा। यह सौहार्द अपने चरम पर दिखाई देता है जब कृष्ण पुनः आगमन का आश्वासन देकर बडी कठिनाई से पाण्डवों को विदा करते हैं। द्वारिका जाते हुए कृष्ण का रथ जब तक दिखाई देता रहा पाण्डव एकटक उनकी ओर देखते रहे । प्राणपति केशव के अदृश्य होते ही पाण्डव निर्जीव हो गये उनके प्राण तो कृष्ण में ही वसते हैं उनका हृदय पुण्डरीकाक्ष्य अपने साथ ही ले गया।[4]

श्रद्धा ;       

विना गंग विना गीताम् विना रामायणीकथाम्।

कालिदासं विना कीदृक् भारते भारती यथा।

महाभारत में प्रारम्भ से अन्त तक केवल भारतीय संस्कृति की मूर्ति ही निराकार रूप से अन्तर्प्रवाहित है। पौरव राज्य सभा में पौरवों द्वारा अपमानित द्रौपदी प्रतिषोध की अग्नि में जलती हुई युधिष्ठिर को तेरह वर्ष के बन्धन को तोडकर युद्ध को प्रेरित करती है परन्तु युधिष्ठिर के तटस्थ रहने पर द्रौपदी युधिष्ठिर की बुद्धि, धर्म एवं ईश्वर के न्याय पर आक्षेप प्रारम्भ करती है इस पर उसे कुन्तिनन्दन आश्वस्त करते हैं कि – ‘हे पांचाली तुमने जो कुछ कहा है वह नीति युक्त और सुन्दर है, किन्तु शायद अज्ञानतावश तुमने नास्तिकता का प्रतिपालन किया है। याज्ञसेनी मैं कर्मों के फल की इच्छा रखकर उनका अनुष्ठान नहीं करता किन्तु देना धर्म है इसलिए दान देता हूं और यज्ञ करना धर्म है। इसलिए श्रद्धावश यज्ञ करता हूं। केवल परमात्मा में मन लगाकर कर्म करना ही श्रेष्ठ है अश्रद्धा युक्त कर्म निन्दनीय है।[5] ईश्वर और धर्म पर पूर्ण श्रद्धा ही मनुष्य के कल्याण का एकमात्र मार्ग है।’ गीता में कहा गया है – धर्म और ईश्वर में श्रद्धा रखने वला पुरुष ही यथार्थ ज्ञान और शान्ति का अधिकारी हो सकता है –

        श्रद्धावान् लभते ज्ञानं  तत्परः संयतेन्द्रियः।

        ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिं अचिरेणाधिगच्छति॥

वस्तुतः उस परमात्मा में श्रद्धा रखने वाला मनुष्य स्वयं परमात्मामय हो जाता है-

शब्दोमयोयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।

प्रतिज्ञा-पालन:      प्रतिज्ञापालन भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। रामायण और महा भारत दोनों ग्रन्थों में प्रतिज्ञापालन के अनेक अवसर आये हैं। राम ने पिता दशरथ के वचनों का पालन करने के लिए राज्य का त्याग और चौदह वर्ष का वनवास किया। लक्ष्मण ने भी चौदह वर्ष तक भाई के साथ वन भटकने और सेवारत रहने की प्रतिज्ञा ली। महाभारत तो प्रतिज्ञाओं का भण्डार है – आचार्य द्रोण की पांचाल राज को पराजित करने की प्रतिज्ञा, शकुनि की पाण्डवों को नष्ट करने की प्रतिज्ञा, भीष्म की जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्यब्रत एवं राजा न बनने की प्रतिज्ञा, भीम की दुर्योधन एवं दुःशासन के वध की प्रतिज्ञा, कर्ण की अर्जुन वध की प्रतिज्ञा, अर्जुन की जयद्रथवध की प्रतिज्ञा, कृष्ण की शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा आदि सभी प्रतिज्ञावचन हैं। जिनके पालन हेतु प्रतिज्ञाकर्ताओं ने अपने प्राणों की भी परवाह न की। गीता में भी कृष्ण की प्रतिज्ञा स्थान स्थान पर मुखरित हुई है। धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए प्रत्येक युग में अवतार लेने की प्रतिज्ञा की गयी है –

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

कृष्ण की दूसरी प्रतिज्ञा है – न हि कल्याणकृत्कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति। श्रद्धा और विश्वास के साथ धर्म के पथ में प्रवृत्त किसी मनुष्य का पतन नहीं हो सकता। कल्याणपथ में प्रवृत्त जो भी व्यक्ति समस्त कर्मों को मुझे सौंप कर पूर्णरूप से मेरा आश्रय लेते हैं मैं संसार सागर से शीघ्र ही उनका उद्धार करता हूं –

        ये तु सर्व कर्माणि मयि सन्यस्य मत्परः।

        अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

        तेषामहं समुद्धर्ता मृत्यु संसारसागरात्।

भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेषितचेतषाम्॥

 

त्याग :                तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा की परम्परा का निर्वहन करने वाली भारतीय संस्कृति में त्याग का विशेष महत्व है।  विना त्याग और बलिदान के कोई भी स्वयं को इतिहास में अंकित नहीं करा सकता। ईसावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र ही त्याग की भावना को प्रशस्त करता है –

        ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चजगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

महाभारत में भी त्याग का अनुपम आदर्श प्रस्तुत हुआ है। महाभारत युद्ध में अपने कुल का एवं क्षत्रियों का भयंकर विनाश देखकर महाराजा युधिष्ठिर के शोक का आरपार नहीं था। कृष्ण, व्यास,अर्जुन आदि ने सान्त्वना देकर उनका शोक दूर करने का अथक प्रयास किया, किन्तु वे शासन सूत्र सम्भालने के लिए तैयार न हुए। अर्जुन ने अर्थ के महत्त्व का प्रतिपादन किया, परन्तु युधिष्ठिर बारम्बार अर्थ के त्याग का ही महत्व प्रतिपादित किया। उन्होने कहा – पार्थ तुम जो यह मानते है कि धन से बढकर कोई वस्तु नहीं है तथा निर्धन को स्वर्ग सुख और धन की प्राप्ति नहीं हो सकती, यह उचित नहीं । पार्थ वास्तव में सन्तोष ही सबसे बडा सुख और स्वर्ग है। जिस वीतराग महात्मा  के हृदय में सन्तोष की सम्यक् प्रतिष्ठा होती है वही उत्तम सिद्धि को प्राप्त करता है।[6]

सदाचार :    सदाचार का भाव है सज्जनों का आचार, विचार और व्यवहार। मनु ने धर्मशास्त्र में धर्म के चार चरणों में सदाचार को एक चरण माना है –

वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।

        एतश्चतुर्विधं प्राहुः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्॥

महाभारत में कृष्णद्वैपायन ने प्रायः सज्जनों के आचार विचार के अन्तर्गत धर्म का सूक्ष्म रूप प्रस्तुत किया है। यह क्रम सम्पूर्ण महाभारत में व्याप्त है। वनपर्व के अन्तर्गत युधिष्ठिर और मार्कण्डेय के संवाद में कौशिक ब्राह्मण और धर्मव्याध की बडी सुन्दर कथा आई है जिसमें कौशिक ब्रह्मण द्वारा सदाचार के विषय में जिज्ञासा प्रकट करने पर धर्मव्याध ने उसका वर्णन किया है। यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन और सत्य भाषण ये पांच वस्तुएं सज्जनों के आचार में सदा देखी जाती हैं।[7]

अतिथिसत्कार:

सर्वदेवमयोऽतिथिः कहकर भारतीय संस्कृति में अतिथि को बहुत ऊंचा सम्मान दिया गया है। किसी दीन, दुःखी, अपरिचित व्यक्ति की जब हम आत्मीयता और स्नेह से सेवा करते हैं वहीं पर मानवता की प्रतिमा साकार हो उठती है। विदुर द्वारा श्रीकृष्ण का आतिथ्य महाभारत में अतिथि सत्कार का प्रकृष्ट उदाहरण है।

इसप्रकार हम देखते हैं कि पग पग पर महाभारत मानवमात्र के कल्याण हेतु उपदेश करता है।  सम्पूर्ण गीता सदाचार तथा कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करने वाला प्रेरक स्रोत है। कर्म को प्रत्येक मानव का अधिकार बताकर फल प्राप्ति की चिन्ता से उसे निवृत्त करता हुआ यह महाभारत कालजयी रचना है। कर्मेण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन की महनीय शिक्षा से ओत-प्रोत यह ग्रन्थ प्रत्येक मानव को प्रेम, सौहार्द, दया, त्याग एवं कल्याण की प्रेरणा देता है। वास्तव में सत्य ही कहा गया है- यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न क्वचित्। महाभारत एक त्रैकालिक ग्रन्थ है जो प्रत्येक परिस्थिति में प्रासंगिक है। आज के युग में महाभारत से बहुत कुछ सीखा जा सकता है जो न केवल व्यक्ति मात्र के लिए अपितु समष्टि हेतु भी उपादेय है।

 

[1]           जगत्नारायण दुबे, महाभारत में भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्य,

[2]  सत्यं वदेत् प्रियं वदेत् न वदेत् सत्यमप्रियम्।

प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म सनातनः।

[3]  अश्वत्थामा हतोहतः  नरो वा कुञ्जरो वा।

[4]  मनोभिरनुजग्मुश्ते कृष्णं प्रीति समन्वयात्।

अतृप्तमनसामेव तेषां केशव दर्शने॥

क्षिप्रमन्दर्दर्ध शौरिः चक्षुषां प्रियदर्शनः।

अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसा। महाभारत सभापर्व २/२७,२८

[5]  धर्मं चरामि सुश्रोणिः न धर्मफलकारणात्।

धर्म एव मनः कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम्॥ महाभारत वनपर्व ३१/०४

[6]  सन्तोषो वैस्वर्गतमः सन्तोषः परमं सुखम्।

तुष्टेर्न किञ्चित्परमं सा सम्यक् परितिष्ठति।

विनीत क्रोध हर्षस्य सततं सिद्धिरुत्तमा।

[7]  यज्ञोदानं तपो वेदाः सत्यं च द्विजसत्तमा।

पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु सर्वदा॥ महाभारत वनपर्व २०७/६२

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