अठारहवीं शताब्दी में संत और समाज एक विश्लेषण 3/5 (2)

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    विकास मलिक (शोधकर्ता)

    जाम़िया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय

     नई दिल्ली

     

     अठारहवीं शताब्दी में इतने सारे बदलाव हो रहे थे कि कोई भी पहलु इससे अछुता नहीं था, फिर चाहे वो राजनीति हो, समाज हो, धर्म हो या फिर व्यापार ही क्योँ ना हो। हर क्षेत्र में बदलाव महसूस किया जा सकता है। इसी समय धर्म में भी काफी कुछ बदलाव देखे जा सकते है जो पिछली शताब्दी में दिखलाई नहीं पड़ते। काफी सारे सम्प्रदायों का उदय हुआ जो अपने आपको निर्गुण और सगुण भक्ति से जोड़ कर देखते है। ये सम्प्रदाय अपने आपको किसी एक संत से जोड़ कर, अपने आपको उनका अनुसरण करने वाला बताने की कोशिश करते नज़र आते हैं।

    इसी शताब्दी में दो ऐसे राज्यों का भी उदय हुआ जिन्होंने ब्राह्मण धर्म और उसकी सामाजिक व्यवस्थाओं को मान्यता देते हुए बाकि विचारों पर पाबंदी लगाने की कोशिश की, ये दो राज्य थे मराठा राज्य और राजपूताना में जयपुर राज्य। इन दोनों राज्यों ने काफी ऐसे कदम उठाये जिसमें निर्गुण भक्ति करने वाले संतो को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। गरीबदास जो निर्गुण भक्ति से जुड़े हुए थे और उन पर इन पाबंदियो का क्या असर हुआ, और एक निर्गुण संत का ऐसी स्थिति में क्या महत्व होता है इन सब सवालो का जवाब इस शोध लेख में जानने का प्रयास करूँगा।

    अठारहवीं शताब्दी में संत की परिभाषा काफी कुछ मायनों में बदलने लगी थी। अब संत सिर्फ़ वे नहीं थे जो घर-बार छोड़ कर जंगल में जाकर तपस्या करके भगवान की अराधना में लीन रहते हो बल्कि घर पर रहकर समाज का हिस्सा बन कर भी भगवान की भक्ति की जा सकती है, ऐसे संत भी मिलते हैं, गरीबदास भी उन्हीं में से एक हैं।

    संत कौन हैं?

    सबसे पहले सवाल ये खड़ा होता है कि संत किसको कहा जाये? इसी सवाल का जवाब देते हुए परशुराम चतुर्वेदी ने लिखा है कि एक संत वो होता है जो बुद्धिमान हो, पवित्र हो और एकेश्वरवाद में विश्वास रखता हो। क्षेत्रए भाषा में संत का मतलब भक्त, साधु तथा महात्मा का पर्यायवाची समझा जाता है।[1] एक संत को माना जाता है कि पक्षपात रहित होना चाहिये, इसके साथ-साथ वह भगवान में ध्यान लगाने वाला तथा सांसारिक मोह-माया का परित्याग करने वाला माना गया है।[2]

    चौदहवीं शताब्दी से उत्तर और मध्य भारत में जो धार्मिक कवितायें लिखते व सुनाते आ रहे हैं उनको संत या कवि संत माना जाता है | ऐसा माना जाता है कि संत-परंपरा मूलतः सम्प्रदाय  विहीन थी, पर बहुत सारे संतो को किसी न किसी सम्प्रदाय का संस्थापक मान लिया गया, पर यह धारणा बाद के समय यानि कि सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में प्रचालन में आई।[3] यह साफ है कि संत के बारे में निर्गुण और सगुण भक्ति में सामाजिक  मान्यताओं को लेकर एक साफ अंतर दिखाई देता है। निर्गुण भक्ति में एक संत को सामाजिक मान्यताओं को तोड़ते हुए तथा पाखंडवाद पर हमला करते हुए दिखाया गया है। वही सगुण भक्ति में जाति व्यवस्था को सही सिद्ध करने पर जोर दिया जाता रहा है। शेर्लोट वाडेविल का मानना है कि ज्यादातर संत समाज के सबसे निचले तबके यानि शुद्र वर्ण से आते हैं। जिनमें मुख्यतः ग़रीब, अछूत और औरतें शामिल हैं। जिनको वेदों को पढ़ने का अधिकार नहीं था। संस्कृत उनके लिए एक विदेशी भाषा के समान थी जिसकी जगह उन्होंने क्षेत्रिए भाषा में ही अपने आपको व्यक्त करना शुरु किया। सामन्यता इसी को संत आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण कारण माना गया।

     

    गरीबदास के विचारों पर कबीर और नानक का प्रभाव

    मध्यकाल में कबीर और नानक दो सबसे महत्वपूर्ण संत थे। हर निर्गुण संत पर इनके विचारों का प्रभाव देखा जा सकता है। यहाँ तक कि बाद वाले संत अपने आपको कबीर व नानक से जोड़ कर गर्व महसूस करते थे। गरीबदास, जो कबीर से दो शताब्दी से भी ज्यादा समय के बाद के हैं, वे भी अपने आपको कबीर से जोड़ते है। गरीबदास कबीर को अपना गुरु मानते हैं, तथा इसके साथ-साथ कबीर को एक पथ-प्रेरक और एक महान अवतार के रूप में देखते हैं। गरीबदास पर जो संचरित्र लेखन लिखा गया है वो उनको कबीर का अवतार तक मानता है। गरीबदास की बानी में भीं कबीर के विचारों की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है।

    गरीबदास के विचार कबीर से काफी हद तक मिलते हैं। कबीर की तरह ही वे भी जाति आधारित समाज को एक अभिशाप मानते थे। गरीबदास ने उन सब पहलुओं पर लिखा या कहा जिन पर कबीर ने बोला था। वे हिन्दू व मुस्लिम धर्म के सह-अस्तित्व में विश्वाश रखते थे। गरीबदास हिन्दू व मुसलमानों को एक ही ईश्वर की संतान मानते हैं।[4] तथा जो भेदभाव दोनों के बीच हें वो कृत्रिम है। उनका मानना था कि हिन्दू व मुसलमान दुश्मन नहीं हैं बल्कि संकीर्ण मानसिकता ने दोनों के बीच दुश्मनी पैदा की है। उन्होंने बाहरी आडंबरो की भी निंदा की तथा कहा :

     

    “हिन्दू तुरक कदर नही जाने, रोज़ा ग्यास करे घिगताने|

    दोनू दीन यकीन न आसा, वे पूरब वे पछिम निवासा||

    दोउ दीन का लेखा,उत्तर दक्खिन में हम देखा|

    गरीबदास हम निश्चय जाना, चारों कूट दसो दिस ध्याना ||”[5]

    गरीबदास इस्लाम और सिख धर्म की दान देने की प्रथा से काफी प्रभावित नज़र आते हैं। उनकी नजरो में दान जप, तप, यज्ञ तथा तीर्थ से ज्यादा बड़ा है। एक भक्त को दान जरुर देना चाहिये। गरीबदास ने साधुओं को दान देने से आज़ादी दी है। उनका कहना था कि दान सबसे बड़ा गुण है। गरीबदास उसको काफ़िर कहते है जो दान नही देता।[6] दान देना तब अच्छा है जब उसके बदले में प्राप्ति की कोई इच्छा न हो।[7]

    जिस प्रकार कबीर साधू होकर सन्यास ग्रहण को अच्छा नहीं मानते थे ठीक उसी प्रकार गरीबदास भी घर-बार छोड़ कर सन्यास ग्रहण करने के विरुद्ध थे। वे घर पर रहकर पारिवारिक रिश्तों को निभाते हुए ईश्वर की आराधना करने के पक्ष में थे। वे खुद भी आजीवन परिवार के साथ रहे। उनका कहना था कि:

    पर्वत डूंगर क्यों चढो, बस्ती बस्ती तजो न गाम |

    बन बसती में एकसा, जाके हिरदे राम ||

    जा घर तो करनी नही, काहे खट्या खाहि |

    कीरत मही किसान की, पर घर मांगन जाहि ||[8]

    कबीर और नानक की तरह गरीबदास भी ईश्वर की भक्ति के लिए मंदिर और मस्जिद जाने के विरोधी थे। उनका मानना था की भगवान तो सब जगह और सब दिशाओं में है फिर उनको सिर्फ मंदिर और मस्जिद तथा पूर्व और पश्चिम में ही क्योँ देखा जाये जबकि वो तो दसों दिशाओं में व्याप्त है। उनका कहना था की जो ईश्वर को मंदिर और मस्जिद में ढूंढ रहे हैं वो भ्रम में हैं। इस तरह वे कभी भी ईश्वर तक नही पहुँच सकते।

    हिन्दू हदीरे पुजही, मुसलम पूजे गोर |

    दोऊ दीन धोखे पड़े, पापी कठिन कठोर ||

    हिन्दू तो देवल बंधे, मुसलम बंधे मसीत |

    साहिब दर पोहंचे नही, चीनी भरम की भीत ||

    सथ दल दोनू दीन की, भली बिगूती बात |

    में मेरी के कारने, खाई जम की लात ||

    सत दल दोनू दीन की, दरगह में नही साख |

    बिना बंदगी भूत हें, क्या कोड़ी धज लाख ||[9]

    कबीर की तरह गरीबदास ने भी मूर्ति पूजा के विरुद्ध अपने तर्कों को रखा। उनका कहना था कि एक पत्थर की मूर्ति को फूल अर्पित करना कौनसी समझदारी है। एक पत्थर को पूजने से भगवान प्रसन्न नही होंगे। एक मूर्ति जो एक कारीगर द्वारा बनाते समय उसके हाथों  द्वारा छिनी और हतोड़े का प्रयोग करके बनाई गई हो उसको कैसे भगवान माना जा सकता है, चाहे वो सोने और चांदी की ही क्योँ न हो। कभी-कभी तो गरीबदास, कबीर और नानक से भी ज्यादा कठोर शब्दों में समाजिक कुरीतियों पर हमला करते नज़र आते हैं। जैसे :

    कहा पाहन फूल चढ़ावे | जड़ जुनी घंट बजावे ||

    याहा जड़ पूजा नहि कीजे | जासे पारब्रह्मा नहि रीझे ||

    एक घडी ठठेरा बीना | तन टंकी चीतन कीना ||

    जे सोने का सालिगराम | सो क्या आवे तुम्हरे कामा ||

    जे चांदी का बी होई | तेरी भूख बिडारे सोई ||

    कहा पाहन पूजे पाढा | जेसे छेली गली थन काढा ||[10]

    अठारहवीं शताब्दी में हिन्दू धर्म पर पाखंडवाद हावी होने लग गया। हर वो संत जो निर्गुण विचारधारा से प्रभावित था उसने खुलकर पाखंडवाद का विरोध किया। गरीबदास भी उन्ही संतो में से एक थे जिन्होंने ब्राह्मणों की सर्वोच्ता को मानने से इंकार कर दिया। इतिहासकारों ने काफी तथ्य की खोज की जो ये साबित करते है कि मराठा और राजपूत राज्य जाति व्यवस्था को तोड़ने और उसके खिलाफ बोलने वालो को दंड देते थे। इतिहासकार ऐ. आर. कुलकर्णी का मानना है कि जाति व्यवस्था मराठा काल में अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थी। कुलकर्णी ऐसे काफी सारे तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं जो ये साबित करते है कि पेशवा ने जातीय व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कुछ संस्थाओ का भी निर्माण किया जैसे ब्रह्म सभा और धर्मं सभा इत्यादि।[11]

    ऐसे ही तथ्य राजस्थान के जयपुर राज्य के बारे में मिलते हैं। अठारहवीं शताब्दी में जयपुर राज्य पर सवाई राजा जयसिंह (1688-1743 AD) का शासन था जो अपने समय के उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजाओं में से एक था। जयसिंह ने भी वैदिक पूजा पद्धति लागू करने की कोशिश की। जिसके चलते उसने कुछ धार्मिक सम्प्रदायों जैसे वैरागी, संयासी तथा रामानंदी पर पाबंदी लगा दी।[12] वैरागी जो हथियार लेकर चलते थे, उन पर पाबंदी लगा दी गई तथा वैरागियोँ तथा नागाओं की आपसी लड़ाई पर भी पाबंदी लगा दी गई।[13] गरीबदास जो जयपुर राज्य में तो नहीं थे पर उससे ज्यादा दूर भी नहीं थे, फिर भी खुल कर पाखंडवाद और सामाजिक ऊँच-निच पर खुल कर बोलते नज़र आते हैं जहाँ पर राज्य से डर बिल्कुल नज़र नहीं आता। जैसे :

     

    जे तू ब्रह्मन ब्रह्मानी जाया, तो आन बाट क्यों न आया |

    ते घाल्या कंध जनेऊ, तू भूल्या बाट बटेऊ ||

    हे सब हाड मांस मल गूदा, यामे को ब्राह्मण को सूदा ||[14]

    गरीबदास की बाणियों में उस समय के ग्रामीण जीवन के बारे में काफी जानकारी उपलब्ध होती जिनकी मदद से अठारहवीं शताब्दी के समाजिक इतिहास लेखन में काफी सहायता मिल सकती है, परन्तु अभी तक किसी इतिहासकार का ध्यान इस तरफ नहीं गया है और जो थोड़ा बहुत लिखा गया हैं अभी तक वो नगण्य के समान है।   ग्रामीण संगठन तथा परिवार के लोगों के काम किस तरह अलग अलग बंटे हुए थे इसके साथ-साथ ये ही नहीं बल्कि शादी किस प्रकार होती थी तथा दुल्हन और दुल्हे किन रिवाजों को निम्भाते थे? इनकी विस्तृत जानकारी गरीबदास की बाणियों में काफी मात्रा में उपलब्ध है।[15]

    इन सब बातों के अलावा भी गरीबदास कुछ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ते नज़र आते हैं जैसे तम्बाकू सेवन। जहांगीर (1605-1628 AD) और गुरु गोविंद सिंह (d. 1707) दोनों ने तम्बाकू पर रोक लगाने की कोशिश की। गरीबदास ने धार्मिक कुरीतियों के साथ-साथ समाजिक कुरीतियों पर भी हमला बोला, वे तम्बाकू का सेवन करने वाले को काफ़िर की संज्ञा देते हुए कहते है कि:

    सुरापान मद मांसाहारी, गमव करे भोगे पर नारी |

    सत्तर जनम कटत हे सीस, साक्षी हे साहिब जगदीश ||[16]

     

    गरीबदास के नये विचार

    ये सब विचार कही ना कही किसी ना किसी से प्रेरक से प्राप्त दिखते हैं जिनमें एक बड़ा योगदान कबीर का नज़र आता है। फिर भी काफी ऐसे विचारों को भी गरीबदास ने प्रचारित किया जो अब तक शायद किसी भी संत ने नहीं किये थे।

    लड़की के पैदा होते ही उसकी हत्या जैसी घिनोनी प्रथा अभी भी हमारे समाज में प्रचलित है। जिसका एक सभ्य समाज में कोई स्थान नही है। ये प्रथा उत्तर भारत में अभी भी प्रचलन में है। गरीबदास जो कि अठारहवीं शताब्दी के संत हैं काफी कठोर शब्दों में इस प्रथा की आलोचना करते हैं तथा जो अपनी बेटी को मरता है उसको काफ़िर की संज्ञा देते हुए कहते है कि:

    वे काफ़िर जो कन्या मारे|[17]

    गरीबदास से पहले किसी संत ने इस तरह की घिनोनी प्रथा के विरुद्ध कुछ कहा हो उसके प्रमाण नहीं मिलते हैं। इस प्रकार गरीबदास पहले संत थे जिन्होंने उन प्रथाओ के खिलाफ बोलना शुरु किया जिन पर बाद में कानून बने और जिसके लिए आधुनिक काल में पढ़े-लिखे लोगों ने लड़ाई लड़ी। अगर हम गरीबदास को राजा राम मोहन रॉय का अग्रगामी कहें तो गलत नहीं होगा।

    गरीबदास एक किसान परिवार में पले-बढे थे इस कारण उन्हें किसान की जंगलो पर निर्भरता की काफी जानकारी थी। जंगल एक तरह से खेती के लिए और आस-पास के पर्यावरण के लिए काफी मददगार होते हैं, ये बात हम काफी अच्छे से जानते हैं। गरीबदास एक तरह से आधुनिक पर्यावरणविद की तरह लगते हैं जब वे जंगल जलाने वाले को ही काफ़िर कह देते हैं:

    काफ़िर जो वनखंड जारे|[18]

    गरीबदास जो खुद एक किसान परिवार से थे और खेती से ही अपनी आजीविका चलाते थे तो एक फसल का एक किसान की जिंदगी में क्या महत्व होता है उससे वो भलीभांति परिचित थे। लगान पहले से ही काफी लगा हुआ था फिर ऐसे में यदि फसल को कोई नुकसान पहुंचा दे तो उसकी जिंदगी कितनी प्रभावित हो सकती है उसकी सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है। तभी गरीबदास फसल को नुकसान पहुचने वालो को भी काफ़िर कहते है:

    वे काफ़िर जो खेती चोर |[19]

    इस प्रकार गरीबदास जो एक जाट परिवार में पैदा हुए थे, जो कि एक खेतिहर जाति के रूप में विख्यात है इसकी झलक गरीबदास की बाणी में भी देखी जा सकती है कि किस प्रकार उनको दुःख है कि किसी किसान की अगर खेती चोरी हो जाये तो इसे वो सबसे नीचता का काम मानते हैं। ये बाणी उन तथ्यों की और भी इशारा करती है कि शायद इस प्रकार की चोरी समाज में बढ़ गई थी जिसको लेकर गरीबदास को बोलना पड़ा।

    उपरोक्त उदाहरण ये बात साबित करते हैं कि जहाँ पहले के संत सिर्फ धर्म और समाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए अपनी आवाज उठा रहे थे वहीँ अठारहवीं शताब्दी के संत का दायरा बहुत विशाल हो गया था। अब एक संत धर्म और समाजिक कुरीतियों को खत्म करने की वकालत के साथ-साथ एक किसान की समस्या पर भी विचार करता है जो गरीबदास से पहले के किसी संत की बाणियोँ में नज़र नहीं आता। काफ़िर जो इस्लाम धर्म में गैर-मुस्लिम के लिए प्रयोग किया गया है उसका प्रयोग गरीबदास समाज में खराब काम करने वालो के लिए प्रयोग करते हैं। इस प्रकार हम अठारहवीं शताब्दी के संत के महत्व को समझ सकते हैं जो पहले की मात्रा में बढ़ गया है।

    संदर्भ स्रोत

    प्राथमिक स्रोत

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    [1] परसुराम चतुर्वेदी (1952) , “उत्तर भारत की संत परंपरा”, इलाहाबाद, प्रष्ठ 3

    [2] निरबैरी, निहका मता, साई सेंती नेह |

    विषिया सू-न्यारा रहे संतनि को अंग एह ||

    कबीर ग्रंथावली, . प्रष्ठ 50

    [3] शेर्लोट वाडेविल (1987), ‘ Sant Mat: Santism as the Universal Path to Sanctity’, संपादक करीने स्चोमेर और डब्लू. एच. म्क्लेओद . “The Sants: Studies in a Devotional Traditions of India”, दिल्ली,. प्रष्ठ 21

    [4] के. सी. गुप्ता,(2004), Sri Garib Das Haryanas Saints for Humanity, . प्रष्ठ 97

    [5] वही, प्रष्ठ. 61-62

    [6] काफ़िर दान यज्ञ नही करही |

    के. सी. गुप्ता,, Sri Garib Das, . प्रष्ठ 66

    [7] वही

    [8] गरीब ग्रन्थ साहिब, . प्रष्ठ 95 & 138

    [9]  वही, . प्रष्ठ 144

    [10]  वही , प्रष्ठ. 534

    [11] ऐ. आर. कुलकर्णी, (1970), “Social Relations in the Maratha Country in the Medieval Period ”,प्रोसेदिंग्स ऑफ़ दा इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, वॉल्यूम. 32, , प्रष्ठ. 231-268

    [12] वी. एस. भटनागर, (1974), Life and Times of Sawai Jai Singh, इम्पेक्स इंडिया, , प्रष्ठ  337-42

    [13] आर. पी. बहुगुणा , “Conflict and Assimilation in Medieval North India Bhakti: An Alternative Approach”, प्रष्ठ . 36.

    [14] गरीब ग्रंथ साहिब, प्रष्ठ . 644

    [15] लालचंद गुप्ता ‘मंगल’ ’, (2014),भारतीय साहित्य के निर्माता गरीबदास, साहित्य अकादमी, दिल्ली, प्रष्ठ. 25

    [16] रतन सागर, प्रष्ठ . 210

    [17] के. सी. गुप्ता,  Sri Garib Das, प्रष्ठ . 66

    [18] वही., प्रष्ठ. 66

    [19] वही, प्रष्ठ . 66

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